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अपने ही घर में बेगानी 'मैरीकॉम'

Mon, 22 Sep 2014 12:06 AM IST
कृपाशंकर चौबे
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मणिपुर में उग्रवादी संगठन के हिंदी फिल्मों के प्रदर्शन पर मनाही वाले पुराने रुख पर कायम रहने से मैरीकॉम फिल्म वहां रिलीज नहीं हो पाई। पांच बार महिला विश्व बॉक्सिंग चैंपियन रहीं मैरीकॉम के जीवन पर आधारित यह फिल्म इस महीने की शुरुआत में पूरे देश में रिलीज हुई है। मैरीकॉम के गृह प्रदेश मणिपुर में इस फिल्म के प्रदर्शन पर लगी रोक को लेकर जो बहस चल रही है, वह एकांगी है। जो लोग हिंदी सिनेमा को शक्तिशाली संचार माध्यम बताते हुए इस पर रोक को अभिव्यक्ति की आजादी पर कुठाराघात की संज्ञा दे रहे हैं, वे अब तक क्यों खामोश थे?
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सच यह है कि मणिपुर में हिंदी फिल्मों तथा हिंदी टीवी चैनलों पर पिछले चौदह साल से रोक लगी हुई है। मणिपुर में रिवोल्यूशनरी पीपुल्स फ्रंट नामक विद्रोही संगठन ने राज्य में 2000 के उसी सितंबर महीने में यह रोक लगाई थी, जिसमें हिंदी दिवस, हिंदी सप्ताह और हिंदी माह मनाया जाता है। मणिपुर में तभी से वह प्रतिबंध लागू है, किंतु इस दौरान मणिपुर की या केंद्र की सरकारों ने अथवा हिंदी फिल्म उद्योग अथवा हिंदी चैनलों के मालिकों ने इस प्रतिबंध को हटाने का कोई प्रयास किया क्या?

फ्रंट का आरोप है कि हिंदी फिल्मों की पहचान भारत सरकार की तरह है। भारत सरकार मणिपुर से भेदभाव करती है और उग्रवादियों के उठाए मुद्दों की उपेक्षा करती है। इस आरोप पर बहस चलाने की जहमत किसी ने आज तक की क्या? फ्रंट से संबद्ध अलगाववादियों की राय में हिंदी की मसाला फिल्में मणिपुर के सामाजिक मूल्यों के खिलाफ हैं। मणिपुर के लोग मैरीकॉम फिल्म में भी भेदभाव का आरोप लगाते हैं, क्योंकि इसमें मैरीकॉम की केंद्रीय भूमिका में मणिपुर अथवा पूर्वोत्तर की किसी अभिनेत्री को नहीं लिया गया है। मणिपुर में क्या अभिनेत्रियों की कमी है? यह आरोप गले नहीं उतरता, क्योंकि किस फिल्म में किसे मौका मिलेगा, यह फिल्मकार का विशेषाधिकार है। हां, यह फिल्म मुख्यधारा से जुड़ने का निमित्त अवश्य बन सकती थी।
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खुद मैरीकॉम मानती हैं कि खेल ही सबको प्यार में बांध सकता है। यह फिल्म अलग-थलग रहे देश के पूर्वोत्तर राज्यों की जनता को देश की मुख्यधारा से जोड़ने में मददगार साबित हो सकती थी। इसीलिए मैरीकॉम ने इस फिल्म को मणिपुर में दिखाने के लिए अपने स्तर पर पूरी कोशिश की। उन्होंने अपने राज्य के मंत्रियों के सामने यह मसला उठाया था, लेकिन मंत्रियों ने हस्तक्षेप करने का साहस नहीं दिखाया। मैरीकॉम के बहाने राज्य सरकार को भी एक अवसर मिला था और अलगावादियों के फिल्म न प्रदर्शित करने वाले कड़े रुख में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए वह ठोस पहल कर सकती थी, किंतु मुख्यमंत्री ओकराम इबोबी सिंह तक ने इस मसले पर रहस्यमय चुप्पी ओढ़े रखी। जो व्यक्ति राज्य की सत्ता में हैट्रिक लगा चुका है और लगातार बारह साल से मणिपुर का मुख्यमंत्री है, उसने भी इस मामले में हस्तक्षेप क्यों नहीं किया, जबकि उसके पास यथेष्ठ बहुमत है और उसके सामने राज्य में कोई राजनीतिक चुनौती भी नहीं है।

असल में मणिपुर में हिंदी फिल्मों तथा हिंदी टीवी चैनलों पर रोक प्रकारांतर से मणिपुरी अस्मिता से जुड़ा मामला है। इस सवाल पर राज्य में सक्रिय सात उग्रवादी संगठनों की समन्वय समिति भी एक राय रखती है। मणिपुर में हमेशा स्थानीय मुद्दे हावी रहते हैं। वहां के लोगों का कहना है कि मैरीकॉम फिल्म का प्रदर्शन न होने देने पर जो लोग आवाज उठा रहे हैं, वे मणिपुर की ही एक दूसरी बेटी इरोम शर्मिला चानू के संघर्ष पर क्यों मौन हैं? इरोम शर्मिला पूर्वोत्तर से सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम को हटाने की मांग को लेकर उसी साल से अनशनरत हैं, जिस साल मणिपुर में हिंदी फिल्मों तथा हिंदी टीवी चैनलों पर प्रतिबंध लगा था। इरोम शर्मिला चौदह साल से अनशनरत हैं। दिल्ली के लिए चौदह साल बाद भी इरोम की मांग अनसुनी क्यों है? उनके संघर्ष ने पूरी दुनिया का ध्यान मणिपुर में नाइंसाफी की तरफ खींचा है। इरोम की आवाज नहीं सुनकर दिल्ली ने क्या अहिंसा के रास्ते चलनेवाले लोकतांत्रिक आंदोलन के प्रति उदासीनता नहीं प्रदर्शित की है? दो नवंबर, 2000 को मणिपुर के मालोम में सुरक्षा बलों ने सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून की आड़ लेकर दस बेगुनाहों को मार डाला था। उस घटना ने इरोम को इस कदर विचलित किया कि वह आमरण अनशन पर बैठ गईं।

सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून की आड़ में पूर्वोत्तर में तैनात सशस्त्र बलों के जवान निर्दोष लोगों के साथ गुलामों जैसा बर्ताव करते हैं। इस कानून के तहत सिर्फ संदेह के आधार पर सुरक्षा बल किसी पर भी गोली चला सकते हैं, किसी के घर छापेमारी कर सकते हैं। इसके खिलाफ आवाज उठाकर इरोम ने दुनिया को दिखा दिया है कि नैतिक सवाल उठाने की उनमें कितनी बड़ी क्षमता है। उनका संग्राम यह बोध कराने में सफल रहा है कि भेदभाव, अनुदारता और उपेक्षा ही पूर्वोत्तर में अस्मिताओं की टकराहट की जमीन तैयार करती रही है। इसी का नतीजा मैरीकॉम के प्रदर्शन पर मणिपुर में प्रतिबंध के रूप में सामने आया है।
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