फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स

मंथन: एक अकेली जीत की शक्ति... विपक्षी एकता अब कांग्रेस को एक तरफ रखकर नहीं सोच सकती

यशवंत व्यास
Updated Sun, 14 May 2023 07:24 AM IST

सार

अब विपक्षी एकता के लिए नई आत्मविश्वासी कांग्रेस को एक तरफ रखकर देखना उनके लिए संभव नहीं होगा, जो अपने-अपने स्तर पर खुद को नेतृत्व के दावेदार बताते रहे हैं। दूसरे, कांग्रेस में क्षत्रपों की शक्ति को भी नया आकार मिल गया है। 'ग्रैंड ओल्ड पार्टी' इसे कैसे अपने परंपरागत हाईकमान वाले ढांचे से संतुलित करेगी, यह देखने की बात होगी।
विज्ञापन
विज्ञापन
मल्लिकार्जुन खरगे और राहुल गांधी। - फोटो : Social Media


आज भी घोर आदर्शवादी व्याख्यान ठोंकने वाले राजनीति के पटवारी जब अपना इंच-टेप लेकर बैठते हैं, तब पूरी मुस्लिम आबादी को एक 'चंक' मानते हैं और हिंदू मतदाताओं में जातियों के अलग-अलग 'चंक' से उनको मिलाकर 'जिताऊ उम्मीदवार' की संभावनाएं तय करते हैं। भ्रष्टाचार, गरीबी, शोषण और विकास इस फिल्म के आइटम नंबर मात्र रह जाते हैं। नरेंद्र मोदी की भाजपा ने इस मसाले का सत्य समझते हुए जब अपने कोर एजेंडे 'अखिल हिंदुत्व' को धार दी, तो जातियों के सत्य पर भी समांतर काम किया। उन वर्गों की तलाश की गई, जिनकी हैसियत शोषितों-वंचितों की राजनीति के पारंपरिक खेल में हाशिये की रह गई थी। यह जानते हुए, कि अखिल भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का जादू सिर्फ पुकार या त्रिपुण्ड से नहीं चल सकता, जमीनी आंकड़ों की जोड़ से चुनावी जीत का आधार तैयार किया गया। जाहिर है, इसके लिए धरातल पर वोट के गणित के साथ निरंतर फैलती बेचैनी, आर्थिक उथल-पुथल, विभिन्न स्तरों पर चल रहे आंतरिक संघर्ष, दमित होते रहने की प्रच्छन्न भावनाएं -सबको एक समन्वित शक्ति में तब्दील करते हुए विकासवादी और भ्रष्टाचार-विहीन शासक की छवि का निर्माण अनिवार्य था। इसके बिना राष्ट्रवाद का उत्तरीय नहीं फहरा सकता। इसी के लिए नरेंद्र मोदी 24 x 7 राजनीति करते हैं और खुद को झोंके रहते हैं।


विपक्ष इस आक्रमण से काफी समय तक हतप्रभ रहा। उसके पास आंधी में बिखरा हुआ मनोबल था। अपनी-अपनी काराएं थीं। कर्नाटक की जीत से उसे एक आश्वस्ति मिली है। वह धीरे-धीरे अपने हितों के लिए मूर्च्छा से उबरने लगा है। उसका ध्यान उन फांकों पर फिर से गया है, जिनसे वह पारंपरिक अंतर्विरोधों को शक्ति बना सकता है। रामायण मेले तो वह भी कर सकता है और उन्हीं उद्योगपतियों को वह भी प्रोजेक्ट दे सकता है, जिनके खिलाफ बोलता है, और यह करने में कोई द्वैध नहीं है, इसे राजनीतिक तौर पर अच्छी तरह समझ लिया गया है। ध्रुवीकरण अब एक सच्चाई है, जिसे दबे -छुपे सबने स्वीकार कर लिया है। यह जिन्न लगातार भूखा रहता है और सिर मांगता रहता है। किसी को इसे बोतल में बंद करने की जल्दी नहीं है। जनता बनाम राजनीति के संकट, सपने, इच्छाएं और संतोष-वही तात्कालिक और सनातन रहने वाले हैं। अब आप देखते हैं कि हिमाचल की समस्या पुरानी पेंशन के खाते में ही सिमट गई। पंजाब बिना विचारधारा के आप को समर्पित हो गया।


हिंदुत्व के नारे और राष्ट्रवादी सत्ता के संबंध क्या होते हैं, यह महाराष्ट्र में सबने देखा, जहां दूध और नींबू भी साथ घुलने को तैयार मिले। सत्य और सिद्धांत की बात एक मुद्रा है। सत्य की स्थापना इसमें है कि आप संख्याओं को कैसे पक्ष में कर सकते हैं। इसलिए कर्नाटक में टीपू सुल्तान और बजरंगबली बेहद उपयोगी मुहावरे हो गए। वहां जीत-हार की व्याख्या करने वाले अभी भी सबसे पहले सत्ता के भ्रष्टाचार या स्थानीय नेतृत्व की नाकामी की बात उतनी नहीं कर रहे, जितनी देवेगौड़ा के शक्ति-संचय या शक्ति-क्षय की।


कहा जा रहा है कि कुमारस्वामी ने अपने उम्मीदवारों से जब साफ कह दिया कि हमारे पास चुनाव खर्च के पैसे नहीं हैं, तो दस से ज्यादा लोगों ने टिकट लौटा दिए थे। जबकि सर्वगुण संपन्न डीके शिवकुमार के चलते कांग्रेस आश्वस्त थी। पूछा जा रहा है कि भाजपा के वोटर तो वहीं रहे, उसका वोट प्रतिशत वही रहा, पर जेडीएस का मुसलमान वोटर भाजपा को हराने के लिए कांग्रेस के साथ कितना गया? वोक्कालिगा और लिंगायतों का कितना हिस्सा कहां गया है? भाजपा से पार्टी छोड़कर जाने वाले कैसे जीत रहे हैं? कई सक्रिय धनपति राजनेताओं ने अपना रास्ता कैसे बना लिया है? 'संप्रभु राज्य','भारत जोड़ो','चालीस प्रतिशत' या 'सिंगल इंजन'- किसे ज्यादा सेलिब्रेट किया जाए? यानी राजनीतिक जीवन-मरण के प्रश्न उसी स्थायी टेक पर आकर खड़े हो गए हैं।


इससे अलग राजनीतिक सच्चाई यह है कि अब विपक्षी एकता के लिए नई आत्मविश्वासी कांग्रेस को एक तरफ रखकर देखना उनके लिए संभव नहीं होगा, जो अपने-अपने स्तर पर खुद को नेतृत्व के दावेदार बताते रहे हैं। लेकिन यह भी उतना ही सही है कि जब तक कांग्रेस लोकसभा में सौ सीटें पार नहीं करती, विपक्ष में सीधे उसके नेतृत्व का स्वीकार शायद ही मुमकिन है। दूसरे, कांग्रेस में क्षत्रपों की शक्ति को भी नया आकार मिल गया है। कांग्रेस शासित राज्यों में दो-दो नेताओं के संकट सर्वज्ञात हैं। ग्रैंड ओल्ड पार्टी इसे कैसे अपने परंपरागत हाईकमान वाले ढांचे से संतुलित करेगी, यह देखने की बात होगी।


यूपी के मेयर चुनावों में अपनी भारी जीत की खबर साथ-साथ सुन रही भाजपा के लिए चुनौती ज्यादा बड़ी, और अलग तरह की है। उनके रणनीतिज्ञ सोच रहे हैं कि सांगठनिक ढांचा और स्थानीय नेतृत्व सिर्फ मोदी की छवि से कैसे पार पाएगा?
विज्ञापन


थोड़ा सत्ता-विरोधी माहौल, थोड़ा अंतर्विरोध, थोड़ी महत्वाकांक्षाएं और भरपूर तेजी- यही तो राजनीतिक खेल के मूल कारक हैं। तभी एक बड़े राजनेता ने साफ कहा था, भ्रष्टाचार और अराजकता तो अब आभूषण हो चले हैं। व्यवस्था समय के साथ इससे लड़ती रहेगी। असली बात यह है कि सही वक्त पर आप चीजों को अपने पक्ष में कैसे करते हैं। 

विज्ञापन
विज्ञापन
Next