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वर्चस्ववाद या लोकतंत्र: धर्म आधारित राजनीति को बौना साबित कर गए कर्नाटक के नतीजे

पी. चिदंबरम
Updated Sun, 14 May 2023 07:16 AM IST

सार

कई राजनीतिक दल एक धर्म या दूसरे धर्म के साथ अपनी पहचान बनाने के लिए एक-दूसरे से होड़ करते दिखते हैं, भले ही उनके नेता धर्मनिरपेक्षता का दावा करते हों। कर्नाटक में हाल ही में संपन्न हुए चुनावों में धर्म आधारित राजनीति में तेजी से गिरावट देखी गई।
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सांकेतिक तस्वीर (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला


गार्सिया के सोशल मीडिया पेजों को खंगालने पर पता चला कि वह एक श्वेत श्रेष्ठतावादी था। वह स्पष्ट रूप से मानता था कि श्वेत रंग की त्वचा लोगों को अश्वेत, भूरी, पीली या मिश्रित रंग की त्वचा वाले लोगों से श्रेष्ठ बनाती है- और इसलिए उनसे घृणा करने का एक कारण है। इस सिद्धांत का समर्थन करने के लिए कोई वैज्ञानिक, विकासवादी, जैविक, शारीरिक, अनुभवजन्य या तर्कसंगत व्याख्या नहीं है कि गोरे लोग किसी भी क्षेत्र में किसी अन्य रंग के लोगों से श्रेष्ठ होते हैं। दुनिया के सर्वश्रेष्ठ एथलीट अश्वेत हैं। दुनिया के सबसे बड़े बैंक का संबंध चीनियों से है। दुनिया की सबसे बड़ी तेल कंपनी अरबों की है। भारतीय कपास, दूध और फिल्मों के सबसे बड़े उत्पादक हैं।

 

नाजीवाद की याद

श्वेत वर्चस्ववाद कोई नई अवधारणा नहीं है। नाजियों ने गोरे जर्मनों को श्रेष्ठ 'मास्टर रेस' (प्रमुख नस्ल) माना और अन्य नस्लों के लोगों- अश्वेत, स्लाव, रोमा, यहूदी और अन्य नस्लीय समूहों को वे- हीन मानते थे।  फासीवादी अति-राष्ट्रवाद पर भरोसा करते थे, लेकिन समय के साथ उन्होंने नस्लवादी विचार को आत्मसात कर लिया और एंटीसेमिटिक यानी यहूदी विरोधी हो गए। द्वितीय विश्वयुद्ध में नाजियों और फासिस्टों को व्यापक रूप से कई नस्लों से संबंधित बलों के गठबंधन ने पराजित किया था।

हमारे पास सिर्फ श्वेत वर्चस्ववाद ही अकेला वर्चस्ववादी सिद्धांत नहीं है। मसलन, धार्मिक वर्चस्ववाद, जातिगत वर्चस्ववाद, भाषायी वर्चस्ववाद और इसी तरह के अन्य वर्चस्ववाद हैं। भारत हर तरह के वर्चस्ववादी सिद्धांत और उनके उप सिद्धांतों का घर है। बसवेश्वर, ज्योतिबा फुले, नारायण गुरु, ईवीआर 'पेरियार' रामास्वामी, बाबासाहेब आंबेडकर और अन्य लोगों ने जाति के खिलाफ लगातार अभियान चलाया। फिर भी जाति का संकट भारत को जकड़ लेता है।


वर्चस्ववादियों को बढ़ावा

धार्मिक वर्चस्ववाद को सनातन धर्म, आरएसएस, भाजपा और अनेक हिंदुत्व संगठनों की मेहरबानी से नया जीवन मिला है। फिर भी, नरेंद्र मोदी सरकार के आने से पहले तक भारतीय राज्य कुल मिलाकर धर्मनिरपेक्ष बना रहा। भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू एक कुलीन ब्राह्मण परिवार में पैदा हुए थे, लेकिन उन्होंने धर्मनिरपेक्षता का प्रचार किया और उसका जमकर समर्थन किया। बीआर आंबेडकर एक दलित के घर पैदा हुए थे, और उन्होंने संविधान तैयार किया जिसमें घोषित किया गया कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य बनेगा। संविधान ने अल्पसंख्यकों और उनके अधिकारों को हिंदुओं के एक संभावित प्रभुत्व या बहिष्कार के खिलाफ संरक्षित किया, जो कि भारी बहुमत में थे- और हैं। कुछ विपथनों को छोड़ दें, तो राज्य और धार्मिक संस्थान 60 से अधिक वर्षों तक एक दूसरे से अलग रहे। मुस्लिम, ईसाई, सिख, जैन, बौद्ध, पारसी, यहूदी और नास्तिक, इन लोगों ने हालांकि सामाजिक जीवन में भेदभाव का सामना किया, मगर उन्होंने राज्य की ताकत के बरक्स खुद को सुरक्षित महसूस किया। राज्य ने धार्मिक अल्पसंख्यकों के विरुद्ध भेदभाव नहीं किया। कहीं भेदभाव हुआ भी तो जजों ने राज्य की कार्रवाई को खारिज किया और धर्मनिरपेक्षता को बरकरार रखा। अधिकांश हिंदू धार्मिक विविधता का सम्मान करते हैं। राजनीतिक दल नियमों से चलते हैं।


भविष्य के संकेत

ये सब अतीत की चीजें लगती हैं। धर्मनिरपेक्षता एक बदनाम शब्द बन गया है। कई राजनीतिक दल एक धर्म या दूसरे धर्म के साथ अपनी पहचान बनाने के लिए एक-दूसरे से होड़ करते दिखते हैं, भले ही उनके नेता धर्मनिरपेक्षता का दावा करते हों। कर्नाटक में हाल ही में संपन्न हुए चुनावों में धर्म आधारित राजनीति में तेजी से गिरावट देखी गई। बाहुबल आधारित राजनीतिक संगठन बजरंग दल जो कि नफरती भाषण और हिंसा में अक्सर लिप्त रहा है, के जिक्र को तोड़-मरोड़कर बजरंग बली (हनुमान भगवान) से जोड़ा गया।


भाजपा ने इस राजनीतिक मुकाबले को भगवान हनुमान के उपासकों और अन्य लोगों के बीच मुकाबले में बदलने की बेताबी से कोशिश की। किसी और ने नहीं, बल्कि माननीय प्रधानमंत्री ने अपने चुनावी भाषणों की शुरुआत और समापन 'जय बजरंग बली' के नारे के साथ किया। भाजपा के प्रचार अभियान ने उस समय खतरनाक मोड़ ले लिया, जब उसने मतदाताओं से वोट डालने से पहले 'जय बजरंग बली' के नारे लगाने की अपील की। यह चुनाव कानूनों का घोर उल्लंघन था और लापरवाह चुनाव आयोग ने इसके बारे में कुछ नहीं किया। कर्नाटक की आबादी में 12.92 फीसदी मुस्लिम और 1.87 फीसदी ईसाई (2011 की जनगणना के मुताबिक) हैं। उन्हें नकारते हुए, भाजपा ने 224 निर्वाचन क्षेत्रों में से किसी में भी मुस्लिम या ईसाई उम्मीदवार नहीं उतारा। भाजपा के नेताओं ने खुले तौर पर कहा 'हमें मुसलमानों का वोट नहीं चाहिए'। उसके अभियान का अनकहा संदेश था, 'गैर-हिंदू से नफरत करो, हिंदू को वोट दो'।
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केंद्र में एक मंत्री श्री सत्यपाल सिंह बघेल ने भाजपा कार्यकर्ताओं के अव्यक्त विचार को यह कहते हुए उजागर कर दिया कि, 'सहिष्णु मुस्लिमों को उंगलियों में गिना जा सकता है... यहां तक कि यह भी एक चाल है। लोग संविधान के मूल ढांचे के बारे में बात करते रहते हैं कि कैसे इससे छेड़छाड़ नहीं की जा सकती। इस राष्ट्र की मूल संरचना 1192 से पहले अखंड भारत हिंदू राष्ट्र की है।' और वह देश के एक ऐसे मंत्री हैं, जिन पर विधि और न्याय की जिम्मेदारी है!


जहां तक मैं जानता हूं, भाजपा के नेतृत्व ने एक बार भी मुस्लिमों की भीड़ हत्या, ईसाइयों के गिरजाघरों पर हुए हमलों, युवा जोड़ों को दी गई धमकियों या निगरानी समूहों की हिंसा की निंदा नहीं की है। धार्मिक वर्चस्ववादी उग्र हो रहे हैं। कर्नाटक के मतदाताओं के पास कबायलीवाद की ओर खतरनाक ढलान से रोकने और लोकतंत्र को धार्मिक श्रेष्ठतावादियों से बचाने का पहला अवसर था। आप जब रविवार को यह कॉलम पढ़ेंगे, तब आपको भविष्य को लेकर कुछ संकेत मिल जाएंगे।

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