भाई साहब, जैसे ही आप आज किसी वाट्स ऐप ग्रुप को ज्वाइन कर लेते हैं, ज्ञान के भंडार से भर जाते हैं। दुनिया भर में क्या चल रहा है, यह पता कर पाना आज मात्र अखबार और खबरिया चैनलों के भरोसे रहकर नहीं हो सकता। मजा यह भी कि जैसे ही कोई नई डेवलपमेंट होती है, सूचना का आदान-प्रदान प्रारंभ हो जाता है, उसे आगे बढाने की रिक्वेस्ट के साथ। चुटकुलों के नीचे तो लिखा रहता है, मार्केट में नया है, आगे बढ़ाओ। खैर, वाट्सेपिया ज्ञान के माध्यम से प्राउड टु बी एन इंडियन का दौर भी बीच-बीच में चलता है, जिससे हमें पता चलता है कि दुनिया की किन-किन बड़ी कंपनियों के सीईओ भारतीय हैं या किस बड़े इंटरनेशनल मिशन में किस भारतीय का कितना योगदान रहा है।
मगर दिक्कत तब आती है, जब इस वाट्स ऐप संदेश के बीच में प्याज का ध्यान आ जाता है। क्या बताएं, पेट्रोल के रेट कम होने का लुत्फ उठाने से पहले ही प्याज की कीमत हमें आंसुओं से भर देती है। कहां हम प्राउड टु बी एन इंडियन के हैंगओवर में रहते हैं, और कहां एकाएक बस का धचका हमें सड़क के बरसाती पानी में उसके टायर के आने का आभास करा देता है। जैसे ही हम भीड़ में खड़े होते हैं, प्राउड पता नहीं, कहां खो जाता है, और बहस बस कुव्यवस्था, महंगाई और अराजकता पर शुरू हो जाती है। बस हो या मार्केट या शापिंग मॉल- सिस्टम को कोसने में न जाने कहां से एकता झलकने लगती है! लगता है, जेनरेशन गैप एक बेमानी मुद्दा है।
अर्थात प्याज के मुद्दे पर फेसबुक, वाट्स ऐप पेट्रोल वाहन और साइकिल वाले एक सुर में महंगाई की बात करते हैं। बड़े से बड़ा ज्ञानी जब जिंदगी की हकीकत से टकराता है, तो सारा ज्ञान धरा रह जाता है। कहने का अर्थ यह है कि लाइट मूड में चल रहे मैसेज भी गंभीर संदेश दे देते हैं। प्राउड तो बहुत होता है हमें अपने इंडियन होने का, पर क्या करें ये प्याज और पेट्रोल उस प्राउड को स्थायी भाव में टिकने नहीं देते।