भारत और पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों के बीच 23 और 24 अगस्त को प्रस्तावित बातचीत के करीब दो सप्ताह पहले ही इस पर संशय के बादल मंडराने लगे थे। इस स्तर की बातचीत का एजेंडा वार्ता का प्रस्ताव करने वाला देश काफी पहले (करीब एक माह) भेज देता है। दूसरा पक्ष भी वार्ता के कुछ सप्ताह पहले वार्ता का एजेंडा और वार्ता के अन्य बिंदुओं को प्रेषित करता है। ताकि दोनों देश मजबूती के साथ न केवल अपना पक्ष रख सकें, बल्कि ठोस समाधान भी सुनिश्चित किया जा सके। पाकिस्तान ने भारत के प्रस्ताव का जवाब 12 अगस्त तक नहीं दिया था। इसके बाद पाकिस्तान ने मीडिया डिप्लोमेसी भी शुरू कर दी।
माना जाता है कि घटनाक्रम पर चीन की निगाह भी थी। चीन और पाकिस्तान सामरिक साझेदारी में तेजी से बढ़ रहे हैं। चीन अफगानिस्तान के साथ ही एशिया, खासकर दक्षिण एशिया को लेकर गंभीर है। ऐसे में अमेरिका की पकड़ जितनी कमजोर होगी, चीन उतना ही मजबूत होगा। इसी नीति पर बीजिंग अपने मोहरे बिछा रहा है, पर यह बात खुलकर सामने आती नहीं।
कूटनीति के जानकारों के मुताबिक, भारत और पाकिस्तान भले ही शिमला समझौता और लाहौर घोषणापत्र के तहत आपसी मुद्दों को वार्ता के जरिये हल करने को बातचीत की टेबल पर आते हैं। लेकिन इसमें किसी भी तरह की मुश्किल आने पर अमेरिका अपने अधिकार का उपयोग करता रहा है। 1999 में कारगिल संघर्ष के बाद अमेरिका की भूमिका बढ़ी है। अमेरिका के लिए यह निजी हित की तरह था कि दोनों देश बातचीत करते रहें। इसी उद्देश्य से अमेरिका ने पाकिस्तान पर बातचीत का दबाव बनाया। सरताज अजीज ने भी दबाव की बात कही थी। संभवत: इसी कारण पाक ने वार्ता की मेज पर आने की हामी तो भर दी, पर मुद्दों पर संशय बनाए रखा। इसी के साथ पाक ने कश्मीर के अलगाववादी धड़े के नेताओं को सरताज अजीज से मिलने का निमंत्रण भी भेजा। जबकि इस्लामाबाद जानता है कि इसी बिना पर भारत ने 25 अगस्त, 2014 को दोनों देशों के विदेश सचिवों की प्रस्तावित वार्ता रद्द कर दी थी।
भारत का स्पष्ट मानना है कि वह पाकिस्तान के साथ सभी मुद्दों पर बातचीत को तैयार है; पर शिमला समझौते और लाहौर समझौते के आधार पर। इसमें तीसरे पक्ष की कोई गुंजाइश नहीं होगी। पाकिस्तान की मजबूरी यह है कि वहां की सरकार को सेना और आईएसआई के दबाव को भी संतुलित करना पड़ता है। इसलिए वह सिर्फ आतंकवाद पर बातचीत से फिसलकर कश्मीर पर गिर पड़ता है। माना जा रहा है कि पाकिस्तान ने अलगाववादी नेताओं से मिलने की जिद अफगानिस्तान में बदल रहे हालात, चीन के साथ बढ़ती नजदीकी और बींजिग से मिल रहे प्रोत्साहन के बल पर की। चीन कभी भी सार्वजनिक मंच पर भारत-पाक के बीच कटुतापूर्ण रिश्तों का पक्षधर नहीं रहा, लेकिन जब भी भारत की तुलना में पाकिस्तान की बात आई, तो उसने इस्लामाबाद का साथ दिया।
बेशक यह वार्ता रद्द होना अमेरिका के लिए जितना निराशा भरा रहा होगा, बीजिंग के चेहरे पर उतनी ही मुस्कान तैरी होगी। हालांकि कठिन से कठिन दौर के बाद फिर वार्ता का माहौल बना है, इसलिए उम्मीद खत्म नहीं हुई है। इसमें सवाल यह भी कि क्या टीम वर्क और होम वर्क में कमी रह गई। देखना यह है कि संयुक्त राष्ट्र आमसभा के दौरान सितंबर में दोनों देश कौन-सी राह पकड़ते हैं।