शादी करने से भी ज्यादा मुश्किल है दूल्हा-दुल्हन से मिलने स्टेज पर जाना। वहां और ज्यादा परेशान हो जाता हूं,जहां लाइन में लगना होता है। वर-वधू और उनके माता-पिता लाइन पर नजर डालते रहते हैं और कई बार हाथ हिलाकर तो मुस्करा कर सांत्वना देने की कोशिश करते हैं कि बस, आपका नंबर आने ही वाला है। ऐसे में आप लाइन तोड़कर भागने का भी नहीं सोच सकते, क्योंकि आप देख लिए गए हैं। वोट डालने भी मैं सिर्फ इसलिए नहीं जाता हूं कि लाइन में लगना पड़ता है, मगर शादियों में इससे बचने का तरीका मुझे तो अभी तक नजर नहीं आया है।
मेरे साथ यह भी दिक्कत हर बार रहती है कि खाना खा लूं या दूल्हा-दुल्हन को पहले स्टेज पर जाकर पेमेंट कर दूं। मेरा एक मित्र तो दस-दस के दस नोट लिफाफे में रखता है। जैसा खाना होता है, उस हिसाब से नोट कम करता जाता है। दिलचस्प तो यह है कि जहां खाना खत्म हो जाता है या बिलकुल ही बेहूदा बना होता है, तो लिफाफा खाली भी कर लेता है। उसका तो नियम है कि खाना पहले...वहीं से तो लिफाफे का वजन तय होता है। बाद में खाने के नुकसान बहुत हैं, मगर मैं ऐसा हर बार चाहकर भी नहीं कर पाता हूं। कभी खाना खराब निकलता है, तो कभी लिफाफा भारी हो जाता है।
स्टेज की तीसरी स्टेज तो बहुत भयावह है, जिसमें आपको वर-वधू और उनके माता-पिता के साथ फोटो सेशन करना होता है। पहले अच्छा था कि फोटोग्राफर सामने होता था और वह ‘स्माइल प्लीज’ कहता था और आप असली-नकली बत्तीसी दिखाकर बरी हो जाते थे, मगर अब तो वीडियो शूटिंग का ऐसा चक्रव्यूह है कि ‘स्माइल’ करते-करते चेहरे पर तनाव आने लगता है और यह पता ही नहीं चलता है कि फोटो खिंचा या नहीं। वह तो अगला रैला जब आकर धक्का मारता है, तभी आपको अपनी भूमिका समाप्त नजर आती है।
यकीन मानिए, आज तक किसी भी शादी की सीडी मैंने पूरी नहीं देखी। पांच मिनट में ही झपकी लग जाती है। एलबम में कितना बढ़िया था कि बगैर देखे आपका गुजारा नहीं था और अपना चेहरा देखने के बाद तेजी से पन्ने पलटना आसान हो जाता था। लड़की के पिता के चेहरे पर भी उतना तनाव नहीं रहता होगा, जितना कि स्टेज पर चढ़ते हुए मेरा चेहरा तन जाया करता है। कई बार तो इसी तने हुए चेहरे को देखकर ही लोग पूछ लेते हैं, ‘क्या आप ही लड़की के पिता हैं?’