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ये किस आदमी की बात करते हैं

Thu, 02 Jan 2014 11:24 AM IST
अजय सेतिया
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आम आदमी राजनीतिक मगरमच्छों के लिए आफत बन गया है। खासकर उन राजनीतिज्ञों के लिए, जिन्होंने 'इंडिया शाइनिंग' को मात देने के लिए ‘आम आदमी' का नारा उछाला था। वक्त ने उन्हीं के सामने आम आदमी पार्टी बना दी। अब दो राजनीतिक दल आम आदमी-आम आदमी खेल रहे हैं।
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पिछले दिनों तब रामराज की याद आ गई, जब भाजपा ने दिल्ली की सत्ता से मुंह मोड़ लिया। दो दलों में पहले आप, पहले आप की लखनवी होड़ लगी थी। जैसे राम भरत को कह रहे हों और भरत राम को। वही हुआ जो राम रचि राखा। पांडवों को वनवास मिल गया और जिन्हें इंद्रप्रस्थ की गद्दी मिलनी थी, उन्हें गद्दी मिल गई। वैसे लाक्षागृह में वही हैं, जो इंद्रप्रस्थ की गद्दी पर हैं।

पर बात रामराज की है, जिसकी परिकल्पना पहले गांधी ने की थी, फिर अन्ना हजारे ने की। अरविंद केजरीवाल रामराज का नाम तो नहीं लेते, पर सपने उन्होंने वैसे ही दिखाए हैं। अयोध्या में जब रामराज रहा होगा, तब वह जरूर स्वर्णिम युग रहा होगा। तभी तो हजारों-लाखों वर्षों से रामराज के सपने दिखाए जाते है। रामराज में जरूर आम आदमी अमन-चैन से रहता होगा। दो वक्त की रोटी की चिंता से वह मुक्त रहा होगा। कपडे़-लत्ते की चिंता उसे नहीं रही होगी। आम आदमी को छत भी नसीब होती होगी। भिखारी तो कोई होगा ही नहीं। पर आज के पैमाने पर आम आदमी कौन है। किसी के लिए ग्रामीण रोजगार योजना में शामिल व्यक्ति आम आदमी है, तो किसी की नजर में बिजली-पानी का बिल भरने वाला आम आदमी है।
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पर सच कुछ और है। आम आदमी वह है, जिसे न इंडिया शाइनिंग वालों ने पहचाना, न ग्रामीण रोजगार योजना वालों ने और न बिजली-पानी का बिल भरने वालों की चिंता करने वालों ने। आम आदमी की सबकी परिभाषा अपने दायरे में सीमित है। पर एक चीज सामान्य है। वह है, आम आदमी का वोटर होना चाहिए। आम आदमी वोट बैंक बनकर रह गया है। जिसका वोट नहीं है, राजनीतिक दलों की निगाह में वह आम आदमी भी नहीं है। जैसे गलियों, बाजारों, चौराहों पर भटकते बच्चे। जैसे आरटीई लागू होने बावजूद भीख मांग रहे, कूड़ा बीन रहे और बालश्रम कर रहे लाखों बच्चे। इनके लिए कोई योजना नहीं। क्योंकि ये मतदाता सूची में शामिल नहीं। क्या किसी जनगणना में इन भिखारियों की गणना की गई? क्या इनका मानवाधिकार नहीं?

असली आम आदमी तो वे हैं, जो ग्रामीण रोजगार योजना में भी शामिल नहीं, जो सड़कों के किनारे झुग्गियां बनाकर रहते हैं। बिजली-पानी का कनेक्शन इन्हें नसीब नहीं। संयुक्त राष्ट्र के प्रोटोकॉल पर दस्तखत किए हैं हमने। ऐसे ही आम आदमियों के बच्चों को संरक्षण का हक दिया है हमने। वायदा किया है कि हर जिले में एक बाल गृह होगा, एक आश्रय गृह होगा। दस्तखत किए इक्कीस साल हो गए, पर अभी देश के आधे जिलों में भी बाल गृह और एक चौथाई जिलों में आश्रय गृह नहीं बने हैं। जिन्हें राजनीतिक दल आम आदमी बता रहे हैं, वे असल में खास आदमी हैं, क्योंकि उसका मतदाता सूची में नाम है, वह ग्रामीण रोजगार योजना का हकदार है और बिजली-पानी का बिल भरने की हैसियत रखता है।

बच्चे अगर वोटर होते, तो किसी प्रदेश का मुख्य सचिव यह नहीं कह पाता कि सर्दी से कोई नहीं मरता। बच्चे अगर वोटर होते, तो हर आपदा के बाद सबसे पहली चिंता बच्चों की होती। उत्तराखंड की आपदा में 1,066 बच्चे प्रभावित हुए। इनमें 777 तो उत्तराखंड के ही हैं। इनमें से 554 तो ऐसे हैं, जिन्होंने मां या पिता का खो दिया। जो इस दुनिया में नहीं रहे, उनकी संख्या भी 504 से ऊपर है। इनमें से 215 उत्तराखंड के ही थे।

वे चार धाम की यात्रा करने नहीं आए थे। वे अत्यंत गरीब परिवारों के बच्चे थे और बेहद गरीब गांवों से आए थे। श्रम विभाग कहता है, वे बाल श्रमिक नहीं थे। तो इतनी ज्यादा तादाद में वे बच्चे वहां क्या कर रहे थे? उनके मां-पिता तो वोटर थे, पर वे बच्चे वोटर नहीं थे। इसलिए उनके लिए न किसी सरकार ने कुछ किया और न ही किसी राजनीतिक दल ने। आपदा की किसी समीक्षा में बच्चे मुद्दा नहीं बनते, क्योंकि वे वोटर नहीं हैं, वे बिजली और पानी का बिल नहीं भरते। फिर राजनीतिक पार्टियां किस आम आदमी की बेहतरी का दम भरती हैं?
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