मेड इन इंडिया इन दिनों सुर्खियों में है। इसे लेकर सरकार के इरादे कितने स्पष्ट हैं, यह मोदी ने अपनी जापान यात्रा के दौरान उद्यमियों को प्रोत्साहित करके जता भी दिया है। प्रधानमंत्री की यह योजना निश्चय ही महत्वाकांक्षी है। भारत के विनिर्माण क्षेत्र को वैश्विक स्तर पर पहचान मिले, इसके लिए जरूरी है कि भारत वैश्विक उत्पादन शृंखला का हिस्सा बने। आधुनिक प्रौद्योगिकी संपन्न दुनिया तक पहुंच बनाने और अपने विनिर्माण क्षेत्र को प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए वैश्विक आपूर्ति शृंखला का हिस्सेदार बनना एक आवश्यक शर्त-सा बन गया है। अपने देश में उत्पादन प्रक्रिया विदेशी निवेश पर अधिक से अधिक निर्भर होती जा रही है। इसलिए यह भी जरूरी है कि हम उन आंतरिक कठिनाइयों को जल्दी दूर करने का प्रयास करें, जो हमारे विनिर्माण क्षेत्र के विकास में बाधक हैं।
हालांकि प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) को आकर्षित करना हमेशा आसान नहीं हो सकता। यह भारत में इसलिए संभव है, क्योंकि यहां सस्ता श्रम और जमीन उपलब्ध है। अमेरिका और अन्य विकसित पश्चिमी यूरोपीय देशों को अधिक से अधिक देशों से धन इसलिए मिलता है, क्योंकि वहां व्यापार के नियमों में पारदर्शिता है और कम लागत में भी व्यापार किए जा सकते हैं। इतना ही नहीं, लचीले श्रम कानूनों और मशीनों से हो रहे अत्यधिक उत्पादन की वजहों से विकसित देशों में मजदूरों की उत्पादकता भी ज्यादा है। इसी तरह वहां की सड़क, बंदरगाह, बिजली ग्रिड, दूरसंचार और बैंक जैसे बुनियादी ढांचे कारोबारी माहौल को बेहतर बनाते हैं।
बहरहाल, वैश्विक आपूर्ति नेटवर्क का लाभ उठाने के लिए नीतिगत स्तर पर जरूरी है कि इन बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा किया जाए। इन क्षेत्रों में भारत निचले पायदान पर है। कंपनियां सरकारी निर्देशों, नियमों और प्रक्रियाओं में उलझकर रह जाती हैं, जिससे उत्पादन लागत बढ़ती है। विश्व बैंक ने अपनी डुइंग बिजनेस रिपोर्ट, 2014 में भारत को 189 देशों की सूची में 134वें स्थान पर रखा है। व्यापार के लिए सुविधा मुहैया कराने के मामले में हमारे देश की हालत चीन (96वां स्थान), श्रीलंका (85वां स्थान), बांग्लादेश (130वां स्थान) और पाकिस्तान (110वां स्थान) जैसे देशों से भी बदतर है। पिछले वर्ष वर्ल्ड इकोनोमिक फोरम ने भी अपनी वैश्विक प्रतिस्पर्धा सूचकांक रिपोर्ट में भारत को 84वें स्थान पर रखा था। वह रिपोर्ट 144 देशों का अध्ययन कर तैयार की गई थी, जिसमें प्रतिस्पर्धा को बुनियादी ढांचे के विकास के संदर्भ में मापा गया था। वैश्विक स्तर के बुनियादी ढांचे के निर्माण के लिए सरकार को निजी क्षेत्रों से निवेश की जरूरत होगी। मगर बुनियादी ढांचे में निवेश के संदर्भ में भारत में निजी क्षेत्र का योगदान महज 36 प्रतिशत है, जबकि भारत की तुलना में चार गुना ज्यादा सकल घरेलू उत्पादन (जीडीपी) होने के बावजूद चीन में यह 48 फीसदी है।
विकास को गति देने में बेहतर बुनियादी ढांचा कितना मददगार हो सकता है, इसका ज्वलंत उदाहरण है, स्वर्णिम चतुर्भुज योजना। यह योजना अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में एनडीए सरकार ने 2001 में शुरू की थी। इसका उद्देश्य था, चारों महानगरों दिल्ली, कोलकाता, चेन्नई और मुंबई को चार अथवा छह लेन वाली सड़कों से जोड़ना। भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण के अनुसार, जनवरी, 2013 तक इस योजना का 99.71 फीसदी हिस्सा पूरा हो गया था। सड़कों के बनने से कितनी मदद मिलती है, इसका अंदाजा कानपुर से कोलकाता तक की यात्रा से लगाया जा सकता है, जिसकी अवधि 48 घंटे से घटकर 36 घंटे रह गई है।
बेहतर निवेश के लिए देश में व्यापार लागत कम करने की भी जरूरत है। यहां व्यापार लागत का अर्थ माल ढुलाई और समय में लगने वाला खर्च, जानकारी इकट्ठा करने में लगा खर्च, अनुबंध लागू होने का खर्च और बंदरगाहों के माध्यम से भेजे जाने वाले माल के लिए अपर्याप्त व्यवस्था तथा कस्टम दस्तावेजों के अकुशल निपटान जैसी व्यापार सुविधाओं की कमी से है। पिछले वर्ष की ट्रेडिंग एक्रॉस बोर्डर की रिपोर्ट बताती है कि 189 देशों की सूची में भारत 132वें स्थान पर है। बांग्लादेश, नेपाल, पाकिस्तान और श्रीलंका जैसे देश भी हमसे बेहतर स्थिति में हैं, जो इस सूची में क्रमशः 130वें, 177वें, 91वें और 51वें स्थान पर हैं। अपने यहां आलम यह है कि माल लेकर जाने वाले ट्रकों को कई चौकियों से गुजरना होता है और टोल टैक्स अथवा चुंगी भुगतान के लिए उसे हर राज्य की सीमा पर रुकना पड़ता है। इस मामले में दक्षिण-पूर्वी देश और जापान भारत से कहीं ज्यादा बेहतर हैं। उम्मीद करनी चाहिए कि उनकी मदद से अपने यहां व्यापार लागत कम करने की दिशा में प्रयास होंगे।
भारत में विदेशी निवेश का प्रवाह कम है, तो इसकी एक वजह पूर्ववर्ती सरकार की टैक्स बदलने की प्रक्रिया भी है। मार्च, 2012 के बाद अनगिनत ऐसे मामले सामने आए, जिसने निवेश के अनुकूल देश के रूप में भारत की छवि कमजोर की है। वोडाफोन मामला, 2जी लाइसेंस निरस्त होना, वर्ष 2012 में गार (सामान्य कर परिवर्जन-रोधी नियम) की शुरुआत, पॉस्को स्टील प्लांट मामला, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा हाल ही में 218 कोयला खदानों के आवंटन को अवैध बताना जैसे अनेक उदाहरण हमारे सामने हैं। ऐसे में, सरकार द्वारा यह सुनिश्चित करने की जरूरत है कि वह कर कानूनों में बदलाव पहले से लागू करने के पक्ष में नहीं है। ऐसा आश्वासन देश में निवेश की स्थिति बेहतर करने में मदद करेगा।
गवर्नेंस के मामले में यह आवश्यक है कि अदालती मामलों का जल्दी निपटारा हो। अपने देश में दस लाख की आबादी पर महज 10.5 जज ही हैं। चूंकि निचली अदालत से उच्च और सर्वोच्च न्यायालयों में अपील करने की प्रक्रिया सरल है, इसलिए अदालतों में मुकदमों की संख्या तेजी से बढ़ती जा रही है। लंबित मुकदमों की बड़ी वजह यह है।
यह अच्छी बात है कि मौजूदा एनडीए सरकार लालफीताशाही खत्म करने का इरादा दिखा रही है। अगर मेड इन इंडिया ब्रांड को जल्दी ही सच्चाई में बदलना है, तो बेहतर बदलाव के लिए जरूरी सभी कदमों पर तत्काल अमल करना जरूरी है।
(लेखक महिंद्रा इकोले सेंट्रले से जुड़े हैं)