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दंगा पुराना ड्रोन नया

Sun, 30 Nov 2014 08:12 PM IST
सहीराम
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जी, दंगे होते नहीं, किए जाते हैं, इसके बहाने चाहे कितने ही पुराने हों। वही आस्था स्थलों को अपवित्र करने वाले, वही दो धर्मों के बच्चों के बीच प्रेम प्रसंग वाले, वही साइकिल टकराने पर बच्चों के झगड़े वाले। इन्हें अति प्राचीन बहाने भी मान सकते हैं। तो दंगों के बहाने चाहे कितने ही प्राचीन हों, पर इस बार दंगों में ड्रोन नया था। जी माफ करना, यह गुरु द्रोण वाला ड्रोन नहीं है। यह तो समझो, एक बच्चा लड़ाकू या टोही विमान है, एक नन्हा सा हेलीकॉप्टर। यह एक उड़ने वाले खिलौने टाइप की चीज होती है, पर कहते हैं कि बड़े काम की चीज है।
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दंगों के बहाने सौ तो क्या, हजारों बार आजमाए गए होंगे। कसौटी पर हमेशा खरे उतरनेवाले ये बहाने कभी फेल नहीं होते, हर बार नए होकर आते हैं। पर इस बार ड्रोन नया था। अफगानिस्तान और इराक में इसे खूब आजमाया गया है, हो सकता है, छत्तीसगढ़ में माओवादियों की टोह लेने के लिए भी इसका इस्तेमाल किया गया हो, पर दिल्ली में इसे पहली बार आजमाया जा रहा था। देखिए, दंगे पुरानी स्टाइल में ही हो रहे थे, बिल्कुल पाषाणकालीन ढंग से। ईंटों और पत्थरों का इस्तेमाल हो रहा था, लूटपाट की जा रही थी, आगजनी हुई हो, तो भी कोई नई बात नहीं। दंगों की यह तकनीक भी तो पुरानी ही है। हो सकता है, चाकू-छुरे भी चल गए हों। यह थोड़ी पाषाणकालीन तकनीक से आगे बढ़ी हुई चीज है। इसे आप मध्ययुगीन कह सकते हैं। पर ड्रोन की तकनीक नई थी।

दंगाइयों की मानसिकता, उनकी सोच मध्ययुगीन तो हमेशा ही रहती है। हो सकता है, पुलिस वालों की सोच भी पुरानी हो, और नेताओं की, हो सकती है, उससे भी पुरानी हो। पर दंगों से निपटने के लिए ड्रोन उड़ाने की तकनीक नई थी। हालांकि इसका इस्तेमाल किया गया छतों पर इकट्ठा किए गए ईंट-पत्थरों की टोह लेने के लिए। हमारे यहां पाषाणकालीन दंगा तकनीक से लड़ने के लिए इसका इस्तेमाल किया गया। कम से कम दंगों में ड्रोन के बहाने से ही सही, हम इक्कीसवीं सदी वाले तो हो गए।
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