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बदलाव की शुरुआत हो चुकी है

Sun, 30 Nov 2014 08:00 PM IST
राजीव चंद्रशेखर
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पिछले दशक में गंवाए हुए कई अवसरों के बाद अब लगने लगा है कि भारत फिर से चल पड़ा है। यह बात थोड़ी अतिशयोक्तिपूर्ण अवश्य लगती है, लेकिन लंबे समय से भारत को एक साकार रूप देने में लगी ऊर्जा अब गतिमान लगती है। कुछ साल पहले तक किसने यह सोचा होगा कि देश का राजनीतिक गणित डर के साये से निकलकर वायदों एवं आशावादी राजनीति में परिवर्तित हो जाएगा।
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इस आशावादी ऊर्जा एवं दूरदर्शिता के जीते-जागते प्रतीक हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं। पिछले एक दशक में पैदा हुए इस संदेह से, कि देश का असली शासक कौन है और किसके हाथ में देश की बागडोर है, निजात पाकर अंतत: देश को अब एक ऐसा प्रधानमंत्री मिला है, जिसे कोई भी काम करने में किसी किस्म का संकोच नहीं है। आखिरकार इस देश को ऐसी सरकार एवं ऐसा प्रधानमंत्री मिला है, जो 'सर्वाधिक शासन' (मैक्सिमम गवर्नमेंट) में विश्वास रखता है।

प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी की सबसे खास बात यह है कि इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए, इस देश की रूपरेखा बदलने हेतु एवं इस बदलाव का उन्माद लाने के लिए वह आम जनता को ही उसमें शामिल कर रहे हैं। यह सचमुच एक सशक्त कदम है, क्योंकि जब वह स्वच्छ भारत, राष्ट्रीय एकता या सरकारी वेबसाइट द्वारा सुशासन लाने जैसे किसी अन्य अभियान में अपने साथ लोगों को शामिल कर लेते हैं, तो किसी प्रकार की सियासी या अन्य कोई भी ताकत उन्हें इस विचार को मूर्त रूप देने से नहीं रोक सकती। विगत जुलाई में बजट पर हुई चर्चा के दौरान मैंने प्रधानमंत्री के संज्ञान में लाने के लिए पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन का एक कथन उद्धृत किया था, जिसमें उन्होंने कहा था, 'दुनिया में हर किसी को यह अवसर नहीं मिलता कि वह देश की अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करे, ताकि देश का कोई व्यक्ति पीछे न छूट जाए। यह एक शानदार अवसर है और साथ ही एक महती जिम्मेदारी भी।'
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इस साल सरकार बनने के तुरंत बाद जो बजट पेश हुआ, वह यथास्थिति वाला रहा, जिससे विकास की राह पर अपनी नीतियों को लागू करने के लिए अर्थव्यस्था को स्थिर रखने के अपने उद्देश्य को सरकार हासिल कर सकी। आर्थिक संरचना को नया रूप देने में सरकार को सोच-विचार कर कुछ कठोर निर्णय लेने पड़े : जैसे, गैस के दाम, श्रम सुधार, कोयला आवंटन, पीएसयू बैकिंग/एनपीए सुधार आदि। बेशक धीरे-धीरे इन सारे निर्णयों से उस जड़ जमाए हुए पूंजीवाद का नाश होगा, जिसने पिछली सरकार के शासनकाल में देश को पीछे ले जाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी थी। ‘मेक इन इंडिया’ अभियान से हमारी आगामी आर्थिक योजना को आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी। इससे करारोपण, श्रम, आपूर्ति संरचना, परिवहन, लॉजिस्टिक्स में परिवर्तन देखने को मिलेंगे। निवेश लाकर अब हम रोजगार के नए अवसर पैदा कर सकेंगे।

नई सरकार ने पहले छह महीनों में अंतरराष्ट्रीय राजनीति के मोर्चे पर भी संतोषजनक काम किया है। सरकारी प्रशासन ने अपने पड़ोसियों के साथ विदेश नीतियों के सुदृढ़ करने के लिए जो समय-सीमा निश्चित की, उस आधार पर प्रधानमंत्री ने चीन, जापान, जर्मनी एवं अमेरिका के साथ अपने आर्थिक संबंध स्थापित करने की नींव रख दी है।

अपने पहले असली बजट तक पहुंचने से पूर्व नरेंद्र मोदी सरकार की यह कार्यकारी शुरुआत है। अर्थव्यवस्था उनकी प्राथमिकता होनी ही चाहिए। भारतीय अर्थव्यवस्था में आधारभूत परिवर्तन आवश्यक है। रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन और सीईए अरविंद सुब्रमण्यम जैसे लोगों की टीम का नेतृत्व करनेवाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एवं वित्त मंत्री अरुण जेटली निश्चित रूप से देश की नई रूपरेखा तय करेंगे और भारतीय अर्थव्यवस्था को और विकसित करेंगे। इसके साथ ही सरकारी योजनाओं से सिर्फ पूंजीवादी दोस्तों को लाभ पहुंचाने के बजाय देश के आम नागरिकों को फायदा पहुंचाने के लिए एक प्रतियोगी वातावरण तैयार करने में भी वे सफल होंगे।

हमारी अर्थव्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए एक तरफ तो यह जरूरी है कि हम भारी मात्रा में निवेश आमंत्रित करें। इससे पहले की सरकारें हमारी असली योजनाओं एवं नियामक प्रक्रियाओं को पूरा करने में विफल रही हैं। इस दिशा में नरेंद्र मोदी की सरकार अब नए-नए पैमाने स्थापित करेगी।

दशकों से अपने शहर की बदहाली पर हर एक शहरी भारतीय शर्म महसूस कर रहा है। स्मार्ट सिटी परियोजना के साथ प्रधानमंत्री मोदी की सरकार शहरों के नए रूप में बदलने को लेकर वचनबद्ध है। सरकार और राजनीति में बदलाव लाकर आर्थिक एवं संरचनात्मक परिवर्तन लाया जा सकता है। भारतीय प्रशासनिक सेवा में टेक्नोक्रैट लोगों को आकर्षित करने के प्रधानमंत्री के बयान को इस ओर एक प्रारंभिक कदम के रूप में देखा जा सकता है। इसी तरह राजनीति में अपराधीकरण को दूर करने के लिए चुने गए आपराधिक प्रवृति के प्रतिनिधियों के विरुद्ध त्वरित कार्रवाई एक महत्वपूर्ण पहल है।

वर्षों से उपेक्षित पड़े एवं भ्रष्टाचार के दलदल में फंसे इस देश की पुनर्संरचना करना कोई आसान काम नहीं है। इसके लिए ठोस इच्छाशक्ति चाहिए। सुखद है कि इस दिशा में सरकार ने अपने कदम बढ़ा दिए हैं। लिहाजा देश की स्थिति बदलने की उम्मीद पैदा होती है। जॉन एफ कैनेडी की महत्वपूर्ण टिप्पणी है, सच्चाई से कोसों दूर रहने वाले किसी भी अविश्वासी एवं स्वार्थी व्यक्ति, जिसकी सोच ही संकुचित हो, उससे इस विश्व की परेशानियां कदापि भी नहीं सुलझ सकतीं। हमें ऐसे व्यक्ति की जरूरत है, जो बड़े सपने देखे, जो पहले कभी किसी ने न देखे हों, न दिखाए हों।' हमारे यहां ऐसे सपने दिखाए भी जा रहे हैं, और उसे साकार करने की दिशा में बढ़ा भी जा रहा है।
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(लेखक राज्यसभा सांसद हैं)
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