अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा तीन दिवसीय सरकारी यात्रा पर आज नई दिल्ली पहुंचेंगे। भारत के गणतंत्र दिवस समारोह में विशेष अतिथि के तौर पर शामिल होने वाले वह अमेरिका के पहले राष्ट्रपति होंगे। महज चार साल के अंतराल पर किसी अमेरिकी राष्ट्रपति की दूसरी भारत की यात्रा से जुड़ी खबरें भारत के अखबारों और मीडिया जगत में तो खूब देखने को मिल रही है। उनके दौरे को लेकर भारत की मीडिया के साथ-साथ वहां के कूटनीतिक और राजनीतिक हलकों में भी मोदी-ओबामा की मुलाकात के परिणाम को लेकर कई कयास भी लगाए जा रहे हैं। मगर अमेरिकी मीडिया में इस यात्रा को लेकर कोई उत्साह नहीं दिख रहा है।
अमेरिकी समाचार पत्रों में मध्य एशिया, आतंकवाद, आईएस, यमन में आतंकवादियों का कब्जा, तथा सऊदी के राजा की मौत को ही प्रमुखता से जगह दी जा रही है। हाल ही में ओबामा ने अपने 'स्टेट ऑफ द यूनियन स्पीच' में न तो अपनी भारत यात्रा का जिक्र किया और न ही कोई उम्मीद जताई। 'वॉल स्ट्रीट जनरल' के एक आलेख में लिखा गया है कि इस दौरे पर वार्ता तो अच्छी होगी, लेकिन सार्थक नतीजे कम ही निकलकर सामने आएंगे।
भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब अमेरिका की यात्रा पर आए थे, तो यहां बसे भारतीयों में काफी उत्साह देखने को मिला था। पर अमेरिका में बसे उन्हीं भारतीयों को ओबामा की यात्रा से कोई खास उम्मीदें नहीं हैं। हां, भारत और अमेरिका के व्यापारी, खासकर गुजराती व्यवसायी (जिनका अमेरिका में अच्छा-खासा कारोबार है) समुदाय को इस यात्रा से काफी उम्मीदें हैं। जहां तक आम अमेरिकियों की बात है, तो अमूमन जैसा होता है, ऐसे मामलों में उनकी जानकारी थोड़ी संकुचित रहती है, अनेक लोगों को तो भारत की राजनीतिक दशा-दिशा की ठीक-ठाक जानकारी भी नहीं रहती।
रही बात अमेरिकी संसद (कांग्रेस) की, तो वहां भी ओबामा की स्थिति ठीक नहीं है। हाल के मध्यावधि चुनाव में उनकी डेमोक्रेटिक पार्टी को जोरदार झटका देते हुए रिपब्लिकन पार्टी ने सीनेट में बहुमत हासिल कर लिया और प्रतिनिधि सभा में अपने बहुमत में इजाफा कर लिया। इन नतीजों से ओबामा के कार्यकाल के बचे आखिरी दो साल मुश्किल भरे हो गए हैं। ओबामा की नीतियों को अमेरिका में कड़े विरोध का सामना करना पड़ रहा है, जैसे कि मुफ्त शिक्षा, ओबामा केयर और इमिग्रेशन बिल आदि। इन सब के बावजूद ओबामा की भारत यात्रा को पूरी तरह से नजर अंदाज नहीं किया जा सकता, खासकर मोदी और ओबामा की मुलाकात को।
एक लेम डक राष्ट्रपति अपने शेष कार्यकाल विदेशी नीतियों व दौरों पर व्यतीत करने में लगाते हैं और उस लिहाज से ओबामा का भारत पर ध्यान देना समझ आता है। खासकर चीन के बढ़ते प्रभाव से, भारत से और नजदीकी संबंध अमेरिका के हित में हैं। पिछले कुछ समय से दोनों नेताओं के बीच गर्मजोशी और अच्छा तालमेल देखने को मिला है। ओबामा अमेरिकी इतिहास में अपना नाम दर्ज करवा चुके हैं, तथा मोदी वैश्विक पटल पर अपना व्यक्तित्व उभारना चाहते हैं।
कॉरपोरेट दिग्गजों को उम्मीद है कि राष्ट्रपति ओबामा भारतीय बाजारों में अमेरिकी कंपनियों के समक्ष मौजूद बाधाओं को दूर करने और अमेरिकी कंपनियों की घरेलू बाजार में अधिक पहुंच बनाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को प्रोत्साहित करेंगे। अमेरिकी कंपनियां भारत सरकार के कुछ प्रमुख कार्यक्रमों जैसे मेक इन इंडिया, स्मार्ट शहर, स्वच्छ भारत अभियान और नवीकरणीय ऊर्जा, विशेष रूप से सौर ऊर्जा में बड़े स्तर पर साझेदारी करने के लिए उत्सुक हैं। इसी तरह से भारतीय शहरों -बंगलूरू, हैदराबाद, पुणे, गुड़गांव और चेन्नई में प्रमुख कंपनियों के सीईओ अमेरिका में आउटसोर्सिग कारोबार में भारतीय आईटी कंपनियों के समक्ष समस्याओं के समाधान के लिए मोदी की तरफ देख रहे हैं। भारत और अमेरिका वैश्विक साझीदार हैं और इस नई ऊर्जा, नई उम्मीदों का फायदा उठाते हुए भारत-अमेरिका संबंधों को प्रगाढ़ करना चाहिए।
इस लिहाज से रक्षा, वाणिज्य और ऊर्जा क्षेत्र में कुछ समझौते की उम्मीद की जा सकती है। दोनों देश यह जरूर चाहेंगे कि उनके बीच व्यापारिक संबंध और मजबूत हों। अमेरिका की कोशिश होगी कि भारत अपने बाजार को अमेरिकी कंपनियों के लिए थोड़ा और खोले। इसके साथ-साथ अटके कार्बन उत्सर्जन, न्यूक्लियर डील आदि मुद्दों पर भी प्रगति की उम्मीद जताई जा रही है। अमेरिका दक्षिण-पूर्व एशिया में चीन के बढ़ते प्रभाव से भी चिंतित है और उस पर लगाम लगाने के लिए भारत से बेहतर और कोई साझीदार नहीं हो सकता। चीन को पछाड़ने के लिए भारत को भी अमेरिका के साथ की जरुरत है।
लेखक शिकागो स्थित स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।