भाई, यह तो हद है। और कुछ हाथ नहीं आया, तो लोगों ने झूठा प्रचार करना शुरू कर दिया कि अच्छे दिन अब नहीं आ रहे। अब तो खुद पीएम जी ने कह दिया है कि अच्छे दिनों का अपॉइंटमेंट कैंसल। पहले बुरे दिन आएंगे। कड़वी दवाओं के दिन। कड़वे दिन भी दो-चार रोज के मेहमान की तरह नहीं, आकर जम जानेवाले अतिथि की तरह आएंगे। समझ लीजिए कि साल-दो साल का स्टे तो कहीं गया नहीं है। उसके बाद भी अच्छे दिन लाने लायक हालात रहे, तो देखा जाएगा!
खैर! हम तो कहेंगे कि यह प्रधानमंत्री जी की बात को सरासर तोड़ना-मरोड़ना है। कड़वी दवा के दिनों को बुरे दिन ही क्यों मान लिया जाए? कड़वी दवा पीने से मुंह कड़वा भले हो, पर शरीर तो स्वस्थ होगा! रही बात कड़वी दवा लोगों को पसंद न आने की, तो पूर्ण बहुमत की तो जरूरत ही इसलिए थी, जिससे सरकार को पब्लिक की पसंद की परवाह करने की जरूरत नहीं रह जाए। जैसे मां कड़वी दवा पिलाने के लिए बच्चे की पसंद पूछने नहीं जाती, वैसे ही सरकार को भी पब्लिक से पूछने की जरूरत नहीं है।
फिर कड़वी दवा पिलाने की जरूरत आ पड़ने का मतलब यह तो नहीं है कि अच्छे दिन अब नहीं आएंगे। माना कि कड़वी दवा और अच्छे दिन साथ-साथ नहीं चल सकते। पर आगे-पीछे तो चल सकते हैं। आखिर, कड़वी दवा का कोर्स साल-दो साल का ही बताया गया है, जिंदगी भर का नहीं। फिर प्रॉब्लम क्या है? बेशक, अच्छे दिनों का इंतजार करना अच्छा नहीं लगता। पर मजबूरी ही ऐसी आन पड़ी है, तो कोई क्या कर सकता है।
खैर! इतना अधीर होने की जरूरत भी नहीं है। जब पब्लिक ने अच्छे दिन आने का साढ़े छह दशक तक इंतजार कर लिया, तो क्या एक-दो साल और इंतजार नहीं कर सकती? वैसे भी पीएम जी के पास टैम की कोई कमी नहीं है। दस साल तो पहले ही मांग लिया है उन्होंने। उसके बाद भी एकाध एक्सटेंशन कहीं नहीं गया है। वैसे भी उन्होंने अच्छे दिन लाने का वायदा किया था, कब तक ले आएंगे, इसका वायदा नहीं किया था। फिर क्यों घबराना?