घर के बाहर किसी ने भारत माता की जय के नारे लगाए, तो मैं चौंका। बाहर आकर देखा कि तीन-चार युवकों के साथ गोपाल खड़ा था। वह मेरे ही दफ्तर में काम करता था। पर उसका हुलिया एकदम बदला हुआ था, कुर्ता-पायजामा और सिर पर टोपी। मेरे चरण कमलों को स्पर्श करते हुए उसने कहा, सर, मुझे आपके आशीर्वाद की जरूरत है।
मैंने कहा, जब तुम दफ्तर में कामचोरी करते थे, तब भी मेरा आशीर्वाद था तुम्हारे साथ। लेकिन तुमने अपना लिबास कब बदल लिया? रिटायरमेंट के समय तो मैं तुम्हें अच्छा-भला छोड़कर आया था।
वह बोला, लिबास मैंने अभी बदला है। मैं विधायक का चुनाव लड़ रहा हूं।
अब मेरे चौंकने की बारी थी, क्योंकि उसने चुनाव लड़ने की बात कभी बताई नहीं थी। मेरी जिज्ञासा वह ताड़ गया। उसने कहा, मैंने नौकरी छोड़ दी है। मैं देश सेवा करना चाहता हूं।
मैं बोला, देश सेवा कोई बुरा धंधा नहीं है। इसमें हाथ डालोगे, तो कुछ न कुछ बन जाओगे। लेकिन इसमें तो बहुत पैसा चाहिए। पहले निवेश करो, तब कहीं रिटर्न मिलता है।
गोपाल बोला, सर, भ्रष्टाचार और महंगाई ने जीना मुश्किल कर दिया है। अन्ना की प्रेरणा से आज मूल्यों की राजनीति करने निकल पड़ा हूं।
मैंने कहा, राजनीति बिना मूल्य के आज करेगा भी कौन? भ्रष्टाचार और महंगाई के मुद्दे तो ज्वलंत हैं। तुम इसमें गरीबी को भी जोड़ लेते, तो राह आसान हो जाती। मेरा मतलब भय, भ्रष्टाचार और भूख मिटाने से है। यह केंद्र की हमारी नई सरकार के अनुकूल भी है। हमारे प्रधानमंत्री तो अच्छे दिनों के लिए अब अमेरिका निकल पड़े हैं। वहां से कुछ न कुछ वह लाएंगे ही। तुम जैसे लोग उनकी मुहिम को आगे बढ़ाओ, तो अच्छे दिनों को भला कौन रोक सकता है? लेकिन तुम्हारे परिवार का क्या होगा? वे तो तुम्हारे साथ भारत माता की जय करने निकलेंगे नहीं।
गोपाल झिझककर बोला, पहले देश, फिर परिवार। वैसे भी बीवी-बच्चों के लिए पेंशन है। इसलिए मैं चुप नहीं बैठ सकता।