मंगलयान को, जिसे प्यार से मॉम बुलाया जा रहा है, मंगल की कक्षा में सफलतापूर्वक प्रवेश कराकर भारत ने न सिर्फ अपने एशियाई विरोधियों को पटखनी दी, बल्कि पहले प्रयास में और कम बजट में ऐसा करके वह अमेरिका, रूस और यूरोप से भी आगे बढ़ गया है। इस ऐतिहासिक पल का गवाह बनने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इसरो के बंगलूरू स्थित कमांड सेंटर में मौजूद थे। उन्होंने इसे एक ऐसे 'शानदार प्रतीक' की संज्ञा दी, जो बताता है कि राष्ट्र के रूप में भारत कितना सक्षम है।
मंगल अभियान ने साबित किया कि भारत इस तरह के उच्च तकनीकी कोशिशों में सफल हो सकता है और चीन को भी मात दे सकता है। जैसा कि मोदी का कहना है, मंगल तक भारत की पहुंच महज 7.4 करोड़ अमेरिकी डॉलर में ही संभव हुई, जो हॉलीवुड फिल्म ग्रैविटी की लागत से भी कम है। इसी तरह का नासा के अभियान, जो कमोबेश जटिल भी होता है, की लागत 67.1 करोड़ अमेरिकी डॉलर रहती है और उसकी सफलता भी तय नहीं होती। इतना ही नहीं, भारत से पहले कोई देश पहले प्रयास में वहां नहीं पहुंच सका था। वर्ष 2012 में चीन ने एक विफल कोशिश की, जबकि 1999 में जापान को भी इसमें विफलता हाथ लग चुकी है।
मगर बहुमत की ताकत पर, जो एक पीढ़ी में एक बार ही संभव है, संसद पहुंचे मोदी के लिए हमेशा अपनी उपलब्धियां बताने के लिए कुछ न कुछ रहा है। इसरो की यह सफलता भी अब उनकी इन्हीं उपलब्धियों में शामिल होगी, भले ही मंगलयान में उनकी सरकार की भागीदारी न के बराबर ही क्यों न रही हो।
इसरो का बजट हमेशा न सिर्फ छोटा रहा है, बल्कि परमाणु परीक्षणों के कारण वैश्विक प्रतिबंधों को देखते हुए इसे लंबे समय तक अकेले काम करना पड़ा है। 1975 से अब तक इसने पचास से भी अधिक उपग्रह छोड़े हैं, जिनमें विदेशी उपग्रह भी हैं। जिस दौर में कई देशों को खर्चीले होने के कारण अपने अंतरिक्ष अभियानों पर पुनर्विचार करना पड़ा है, उस समय भारत के किफायती अंतरिक्ष अभियान ने दुनिया भर का ध्यान अपनी ओर खींचा। इसरो की सफलता को लंबे समय तक अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में राष्ट्रीय आत्मनिर्भरता के रूप में देखा गया, जिसे प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने बढ़ावा दिया था। हालांकि इस नीति ने भारत को गरीब ही बनाया। हाल तक रक्षा और अन्य क्षेत्रों में तकनीकी रूप से भारत इसलिए अलग-थलग रहा, क्योंकि देश के बड़े हिस्सों में विदेशी निवेश प्रतिबंधित, बुनियादी ढांचा कमजोर और नौकरशाही बदनाम रही। भारत दुनिया में सबसे ज्यादा हथियार खरीदने वाला देश इसलिए बना हुआ है, क्योंकि वह अत्याधुनिक हथियार नहीं बनाता और विदेशी कंपनियों को अपने यहां उद्योग लगाने का मौका भी नहीं देता।
वर्ष 2012 में चीन का मंगल अभियान विफल होने के बाद भारत ने मंगलयान की योजना बनाई। पिछले तीन दशकों में कमोबेश हर क्षेत्र में चीन भारत से आगे निकल गया है, मगर भारतीय वैज्ञानिकों ने मंगल पर पहुंचकर दिखा दिया है कि चीन को मात दी जा सकती है। यह जीत वैसे भी, अच्छे समय पर आई है। लद्दाख में जमे चीनी सैनिकों के खिलाफ यह भारतीय सैनिकों को मनोवैज्ञानिक बढ़त दिलाने में मददगार होगी।