मंदसौर में हुई घटना बहुत ही दुखद, निंदनीय और शर्मनाक है। देश के लिए अन्न उपजाने वाला किसान अगर अपने हक के लिए संघर्ष करते वक्त हिंसा का शिकार हो, तो इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या हो सकता है! आज देश के विभिन्न हिस्सों के किसान आंदोलन की राह पर हैं। जब किसानों को लाभकारी मूल्य तो छोड़िए, लागत मूल्य भी नहीं मिलता है, तो उनमें असंतोष पैदा होता है। जब उन्हें अपनी फसल कोल्ड स्टोरोज में रखने का किराया भी फसल बेचने पर नहीं मिलता, तो वे फसल छोड़ जाते हैं। निराशा में वे अपनी फसल सड़कों पर फेंक देते हैं। ऐसा कोई पहली बार नहीं हुआ है।
जबसे देश में उदारीकरण की नीति लागू हुई, तबसे इस तरह की परेशानियां बढ़ गई हैं और किसान आंदोलन के लिए जब-तब मजबूर होते हैं। लेकिन एक बात ध्यान में रखने की है कि अन्नदाता कभी हत्यारा नहीं होता है। देश भर में किसान आंदलनों से जुड़े रहने के अनुभव के आधार पर मैं यह दावा कर रहा हूं। वह अपने अधिकार के लिए आंदोलन करता है, संघर्ष करता है, नाराज भी होता है, लेकिन कभी हिंसक रास्ता नहीं अपनाता है। मंदसौर में जो हिंसा हुई है, उसके पीछे राजनीतिक साजिश है।
महाराष्ट्र में विदर्भ है, मराठवाड़ा है, लेकिन आंदोलन वहां होता है, जो आर्थिक रूप से समृद्ध क्षेत्र है। मध्य प्रदेश का गुजरात से सटा इलाका मालवा का क्षेत्र, जिसमें मंदसौर, नीमच, रतलाम जैसे जिले आते हैं, वह आर्थिक दृष्टि से काफी संपन्न माना जाता है। क्या पंजाब, बिहार, पश्चिम बंगाल आदि विभिन्न राज्यों के किसानों को उनकी फसलों का उचित मूल्य मिल रहा है? नहीं। तो फिर मंदसौर में ही किसान आंदोलन क्यों हिंसक हो उठा है। जबकि देश भर के किसान नाराज हैं, उनमें भारी गुस्सा है, उन्हें उनकी उपज का वाजिब मूल्य नहीं मिलता है। जिस तरीके से हाल में दालों का मूल्य गिरा है, वह खतरनाक है।
सरकार से मेरा आग्रह है कि वह जिंसों के बिना वजह आयात पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाए। और जो अर्थशास्त्री वर्षों से किसानों को फल और सब्जियां उगाने की सलाह देते रहे हैं, उनसे मैं पूछना चाहता हूं कि क्या हमारे देश में फलों और सब्जियों के संरक्षण के लिए पर्याप्त संख्या में कोल्ड स्टोरेज हैं? क्या फल और सब्जियों की पैकिंग की व्यवस्था है। क्या फल और सब्जियों की उचित मूल्य पर खरीद के लिए मंडियां हैं? अगर नहीं, तो फिर किसानों को ऐसी सलाह क्यों दी जा रही है? किसानों की बाजार में जब तक भागीदारी नहीं होगी, जब तक किसानों की उपभोक्ताओं तक सीधी पहुंच नहीं होगी और बाजार से बिचौलियों को हटाया नहीं जाएगा, तब तक न तो किसानों का भला होगा और न ही उपभोक्ताओं का। दो-तीन रुपये बिकने वाली सब्जी बाजार में कैसे बीस से पच्चीस रुपये हो जाती है? यह दोष नीतियों का है। आज के समय में किसान और उपभोक्ता, दोनों का शोषण हो रहा है, यह सरकार की गलत नीतियों का सबूत है। सरकार को अपनी नीतियों में सुधार करना चाहिए।
किसानों के नाम पर जिस तरह से मंदसौर में पिछले कुछ दिनों में आंदोलन को हिंसक रूप दिया गया, उसमें निश्चित रूप से साजिश है। किसान बहुत मेहनत से पशुओं का पालन करते हैं और फिर उनसे दूध हासिल किया जाता है। उस दूध को सड़क पर बहाने का काम किसान नहीं कर सकते। जिस तरह से अमूल दूध के टैंकर का दूध सड़कों पर बहाया गया, क्या वह टैंकर किसानों ने लाया था? नहीं, यह काम उन लोगों का था, जिन्होंने साजिश के तहत किसानों के आंदोलन को हिंसक रूप दिया। किसानों को इन दंगाइयों से सावधान रहना चाहिए। यह सियासत का खेल है।
किसानों की दुर्दशा के लिए कोई एक सरकार दोषी नहीं है। आजादी के बाद से अब तक की सभी सरकारों ने किसानों के साथ कभी न्याय नहीं किया है। आजादी के बाद देश में तीन लाख से ज्यादा किसानों ने आत्महत्या की है। आज सरकार को यह सोचने की जरूरत है कि किसानों को उसकी फसल का उचित मूल्य कैसे मिलेगा। नीति आयोग में जो लोग बैठे हैं, वे कॉरपोरेट एग्रीकल्चर का एजेंडा चलाना चाहते हैं। प्रधानमंत्री को इन लोगों से सावधान रहना चाहिए। ये लोग किसानों के हित की बात नहीं करने वाले। सरकार भले ही बदल गई है, लेकिन नीति बनाने वाले लोग नहीं बदले हैं। ये टेक्नोलॉजी के नाम पर सरकार को, किसानों को धोखा दे रहे हैं।
हमें ऐसी टेक्नोलॉजी चाहिए, जिससे उत्पादन बढ़े और उत्पादन लागत कम हो। लेकिन ये टेक्नोलॉजी के नाम पर जीएम सरसों की वकालत करते हैं, जो किसानों और पर्यावरण, दोनों के लिए खतरनाक है। वास्तव में नीति आयोग में बैठे लोग बहुराष्ट्रीय कंपनियों के एजेंडे पर काम करते हैं, जिनसे सावधान रहने की जरूरत है। इस देश को किसान केंद्रित नीति की आवश्यकता है।
कहा जा रहा है कि 2022 तक किसानों की आय दोगुनी हो जाएगी, लेकिन यह होगा कैसे? क्या किसानों के लिए गांव-गांव में पर्याप्त कोल्ड स्टोरेज चैन की व्यवस्था हो गई है? क्या किसानों को मोबाइल वैन उपलब्ध करा दिए गए हैं कि वे अपने फल और सब्जियां उपभोक्ताओं तक पहुंचा सकें? हमारे देश में ज्यादातर किसान ऐसे हैं, जिनके पास दो एकड़ से कम भूमि है। उन्हें दो दुधारू पशु चाहिए। जैविक खाद से भूमि की उर्वरता बढ़ाने की जरूरत है।
खेती के लिए पर्याप्त सिंचाई की व्यवस्था चाहिए। बेशक प्रधानमंत्री सिंचाई परियोजना, मिट्टी जांच एवं नीम कोटेड यूरिया जैसी योजनाएं अच्छी हैं, लेकिन सरकार को उन किसानों को भी सब्सिडी देनी चाहिए, जो जैविक खाद से खेती करते हैं। दस गांवों को इकाई मानते हुए एक केंद्र बनाना चाहिए, जिसमें स्थानीय कृषि उत्पादों के प्रसंस्करण, विपणन, संग्रहण और कोल्ड स्टोरेज की व्यवस्था होनी चाहिए। वहीं से कृषि आधारित कुटीर एवं लघु उद्योग विकसित कर रोजगार पैदा किए जा सकते हैं। वहीं से आर्थिक विकास का पहिया आगे बढ़ेगा।
कृषि क्षेत्र को बर्बाद करने के लिए मैं एम एस स्वामीनाथन को भी जिम्मेदार मानता हूं, क्योंकि कॉरपोरेट रासायनिक उर्वरक मॉडल की शुरुआत उन्होंने ही की थी। उन्होंने जिस न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की वकालत की थी, उसका लाभ बहुत कम किसानों को मिलता है। एमएसपी बहुत कम फसलों पर मिलता है। स्वामीनाथन की सिफारिश को लागू भी किया जाए, तो उसका लाभ बहुत कम किसानों को मिलेगा। उत्पादन की लागत कम करने और उपभोक्ताओं तक किसानों की सीधी पहुंच सुनिश्चित करने पर ही किसानों का भला होगा।