सड़क के किनारे उजड़े इन डेरों पर किसी राजनीतिक दल का झंडा नहीं लगता। चुनावों के समय कोई प्रत्याशी इनके पास वोट मांगने नहीं आता। शाम ढलते ही दीयों की टिमटिमाती रोशनी के बीच यहां रोटी सिंकने की गंध आती है। बातों के अलग लहजे और चिल्लाने-डांटने की बेसुरी आवाजें। ईंटों से बने अस्थायी चूल्हे के पास ही इनकी लोहे की एक-दो हल्की चारपाइयां और दो पहियों की भैंसागाड़ी खड़ी होती है, जिसमें इनकी पूरी गृहस्थी समा जाती है। इनके टिकने-ठहरने की जगहें मिट्टी से लिपी-पुती और खूब साफ-सुथरी होती हैं। एक किनारे कोयले से दहकती भट्ठियों में वे लोहे को तपाकर घरेलू कामकाज की चीजें बनाते हैं, जिन्हें पुरुष अपने हुनर से आकार देते हैं और औरतें घन चलाकर उन्हें बनाने-ढालने में मदद करती हैं। यहां श्रम की उत्सवधर्मिता है। इस कठिन काम के बीच इनके बच्चों का लालन-पालन बाधित नहीं होता। देखो न, यहां बैलगाड़ी के नीचे बंधी चादर में लटका एक अबोध बच्चा गहरी नींद में सो रहा है।
ये खानाबदोश जिंदगियां हैं, जो कहीं एक स्थान पर नहीं ठहरतीं। एक जगह रहकर फिर दूसरी अंजान जगहों पर जाकर डेरा जमा लेना इनका स्वभाव है। ये शहर के नितांत उपेक्षित और बहिष्कृत लोग हैं, जो बेहद अस्थिर जीवन जीने को विवश हैं। श्रम से रोटी जुगाड़ते उनके परिवार का नाम किसी मतदाता सूची में नहीं होता। दो पहियों की एक भैंसागाड़ी (या कभी-कभी ऊंटगाड़ी) पर चलते-ढुलते वे यों ही अपनी उम्र के दिन पूरे कर लेते हैं। कोयला जलाने की एक अदद धौंकनी और लोहे का भारी घन जैसे उनके जीने के औजार हैं। वे हर रोज पसीना बहाकर हमारे काम की चीजें बनाते हैं। स्त्रियां भी यहां अपनी खास वेशभूषा में होती हैं, जिनमें खूब घेरदार छींट का चटख रंग का लहंगा, चोली और चुनरी तथा हाथों में विशिष्ट ढंग के कड़े होते हैं। वे अपनी बलिष्ठ भुजाओं से कठिन श्रम करती हैं।
फिर भी हाशिये के इन लोगों के प्रति हमारी धारणा अच्छी नहीं होती। हमारा समाज और सरकारें उन्हें जन्मजात अपराधी मानती हैं। मान लिया गया कि घुमंतू जातियों का पेशा ही अपराध करना है, जबकि कोई जन्म से ही अपराधी नहीं होता। यह हमारे समाज और सरकार का नितांत अप्राकृतिक और असामाजिक निर्णय है। किसी जमाने में ब्रिटिश हुकूमत ने यह निर्धारित कर दिया था कि किसी जाति के व्यक्ति ने यदि कोई अपराध किया, तो उसकी संतानें भी अपराधी मानी जाएंगी। आदतन अपराधी माने जाने वाले इन समूहों को अंततः स्वतंत्र भारत में विमुक्त घोषित किया गया। लेकिन कुछ वर्ष पहले उनके सिरों पर फिर से जन्मजात अपराधी की तलवार लटका दी गई। प्रशासन को इस तरह के आदेश भेज दिए गए कि हाशिये के इन लोगों को अपराधी मानकर चला जाए, इनके डेरों पर निगरानी रखी जाए और जो वकील इनके अपराधिक मुकदमों की पैरवी करते हैं, उन्हें भी सूचीबद्ध किया जाए।
करीब दो दशक पहले गांधीनगर में देश भर की इन गैर अधिसूचित और घुमंतू जातियों का एक सम्मेलन बुलाया गया था। ठीक इसके पहले एक अखिल भारतीय संगठन ‘द नोटिफाइड ऐंड नौमेडिक ट्राइब्स राइट ऐक्शन ग्रुप’ भी बनाया गया था। इस ग्रुप को सरकारों की इस कार्रवाई का पता होना चाहिए, जिसके चलते इन खानाबदोश जनजातियों के साथ होने वाले मानवाधिकार हनन के तौर-तरीके अब तक चालू हैं। किसी भी स्वतंत्र और विकासशील देश के लिए यह लज्जाजनक स्थिति है, जिसमें बदलाव जरूरी है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग भी इस मामले में बहुत सचेत दिखाई नहीं पड़ता। सभ्य समाज के लिए यह कलंक की बात है कि उसके कुछ वाशिंदे सपरिवार सड़कों के किनारे रहते हुए पशुवत जिंदगी जीकर मर जाएं। क्या इन लोगों को एक जिम्मेदार नागरिक और मनुष्य बनाने का हमारा कोई दायित्व नहीं है?
यह सर्वेक्षण किया जाना चाहिए कि इन आदिवासी घुमंतुओं की तकलीफें और जरूरतें क्या हैं। अनेक दशकों से वे जन्मजात अपराधी की श्रेणी में रहकर सांस लेने को अभिशप्त क्यों हैं? इस धरती में इन भटकती जिंदगियों की हिस्सेदारी क्यों नहीं है? यह एक बड़ा सवाल है, जिसे ज्यादा दिनों तक टाला नहीं जा सकता। कहीं ऐसा तो नहीं कि हमने अपनी (अ)भद्र मानसिकता के चलते इन घुमंतुओं को मनुष्य मानने से ही इनकार कर दिया हो!