फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

अपनी जमीन पर नीतीश

Wed, 21 Oct 2015 07:37 PM IST
अजय बोस
विज्ञापन
विज्ञापन
योजनाबद्ध तैयारी या फिर पूर्व प्रदर्शन या फिर इन दोनों ही वजहों से लगातार तीसरे कार्यकाल की उम्मीद रख रहे बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार मतदाताओं के साथ अपना रिश्ता बनाते हुए कुछ असाधारण करते दिख रहे हैं। बिहार विधानसभा के चुनाव अभी जारी हैं। मगर पहले कमजोर माना जा रहा जदयू-राजद-कांग्रेस महागठबंधन अब न केवल मजबूत बनकर उभरा है, बल्कि चुनावी दंगल में बढ़त लेता भी दिख रहा है। इसकी प्रमुख वजह बतौर नेता नीतीश की अच्छी छवि है। वस्तुतः दस वर्ष के कार्यकाल में सत्ता-विरोधी लहर का नदारद रहना ही जदयू के इस नेता की बड़ी पूंजी साबित हो रहा है।
विज्ञापन


देश भर में राज्य विधानसभा चुनावों को कवर करने के अपने 40 साल के अनुभव के दौरान मैंने शायद ही कभी सत्तारूढ़ मुख्यमंत्री के प्रति लोगों में इतना सकारात्मक रुख देखा हो। बिहार में चुनावी माहौल गरमाने के साथ मैंने हाल ही में पटना के उत्तरी व दक्षिणी इलाकों का दौरा किया। सरकारी उदासीनता और कुप्रशासन को लेकर मतदाताओं में चुनाव के समय अमूमन जो नाराजगी रहती है, वह यहां नहीं थी। इसके बजाय धूल भरे गांवों में स्त्री-पुरुष, जवान-बूढ़े, हिंदू-मुसलमान, सवर्ण-दलित नीतीश सरकार की उपलब्धियां गिनाते दिख रहे थे। सड़कों-राजमार्गों की बात हो, स्कूल और अस्पताल की चर्चा हो या फिर ग्रामीण विद्युतीकरण की, नीतीश राज में विकास का पैमाना बनी ये उपलब्धियां लोगों की जुबान पर हैं।

नीतीश की तारीफ सिर्फ वही लोग नहीं कर रहे, जो खुले तौर पर उन्हें वोट देने की बात कर चुके हैं। उनके प्रशंसक वे भी हैं, जो खेद जताते हुए कह चुके हैं कि नीतीश से मुंह मोड़ लेने के सिवा उनके पास कोई विकल्प नहीं बचा था। मतदाताओं का यह अद्भुत वर्ग है, जो नीतीश को पसंद करने के बावजूद उनको वोट नहीं देगा। ज्यादातर अगड़ी जातियों वाला यह वर्ग खुले तौर पर स्वीकार कर चुका है कि भाजपा के साथ होने की वजह से उनके पास कोई विकल्प नहीं बचा है। इसके अलावा अति पिछड़ी जातियों और दलित समुदायों का बड़ा हिस्सा गरीब और वंचित वर्ग के प्रति उदार होने की वजह से नीतीश की तारीफ कर रहा है, मगर लालू प्रसाद यादव के साथ में होने की वजह से इस वर्ग में कुछ चिंताएं भी हैं।
विज्ञापन


सत्तारूढ़ मुख्यमंत्री को मिल रहे समर्थन की वजह सिर्फ सरकार का प्रदर्शन नहीं हो सकता। नीतीश कुमार निस्संदेह कुशल प्रशासक साबित हुए हैं, पर इतने भी नहीं कि उन्हें ऐसी सर्वस्वीकार्यता मिल जाए। ग्रामीण क्षेत्रों, छोटे शहरों और यहां तक कि पटना तक फैले मतदाताओं के बड़े वर्ग की ओर से नीतीश को एक समान तारीफ मिल रही है, जिससे पता चलता है कि लोगों से संवाद बनाने और व्यापक प्रचार अभियानों ने उनकी छवि गढ़ने में अपना काम कर दिखाया है।

चुनाव अभियान शुरू होने के महीनों पहले नीतीश की छवि निर्माण का जो अभियान चालू किया गया था, उसे छिपाने का नीतीश के सहयोगियों की तरफ से कोई प्रयास भी नहीं किया गया है। मुख्यमंत्री के प्रमुख रणनीतिज्ञ प्रशांत किशोर बताते हैं कि पिछले दशक में नीतीश कुमार ने जो भी प्रशासनिक उपलब्धियां हासिल की हैं, उनके प्रचार के लिए इस वर्ष की शुरुआत से ही एक व्यापक और व्यवस्थित प्रचार अभियान चलाया जा रहा है, ताकि उनके लिए ज्यादा से ज्यादा राजनीतिक समर्थन जुटाया जा सके। गौरतलब है कि 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले राष्ट्रीय स्तर पर नरेंद्र मोदी की छवि को सशक्त बनाने में किशोर ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

मुख्यमंत्री आवास पिछले कई महीनों से किशोर का मुख्यालय बना हुआ है। यहीं पर एक विस्तृत संवाद के दौरान वह बताते हैं, 'बिहार में तकरीबन हर व्यक्ति यह स्वीकार करेगा कि नीतीश एक भले इंसान और अच्छे प्रशासक हैं। मगर चुनौती यह थी कि अच्छे प्रशासक की उनकी छवि को आगे बढ़ाते हुए उन्हें एक ऐसे बड़े नेता के तौर पर पेश किया जाए, जिसे बिहार को विकास के पथ पर आगे बढ़ाने के लिए बिहार के लोगों के समर्थन की जरूरत है।' इसी चुनौती से निपटने के लिए चुनाव की तारीख घोषित होने से काफी पहले हर घर तक पहुंचने का अभियान चलाया गया, ताकि लोगों को नीतीश की कल्याणकारी नीतियों और भविष्य की राजनीतिक चुनौतियों के बारे में बताया जा सके।

यह जानते हुए, कि केंद्र में सरकार होने के नाते भाजपा के पास संसाधनों की कोई कमी नहीं है, नीतीश कैंप ने बिहार में मोदी की महारैलियों के शुरू होने से काफी पहले से ही नीतीश के बड़े-बड़े बैनरों और पोस्टरों के साथ अपना प्रचार अभियान शुरू कर दिया। एक स्थानीय कांग्रेस नेता बताते हैं कि पटना और बिहार के दूसरे प्रमुख शहरों में महत्वपूर्ण जगहों पर पोस्टर लगाने का अधिकार महागठबंधन ने काफी पहले से खरीद रखा था। ऐसे में, जब भरपूर पैसे के साथ भाजपा यहां आई, तो उसे होर्डिंग लगाने की जगह ही नहीं मिल पाई।

किशोर बताते हैं कि नीतीश के पोस्टरों में जान-बूझकर लाल रंग का उपयोग किया गया है। अपने अनुभव से वह बताते हैं कि गहरे रंग समाज के गरीब वर्ग को ज्यादा प्रभावित करते हैं। इसके अलावा वे जगहें चुनी गईं, जहां मोदी सभाएं करने वाले थे, और उन्हें नीतीश के बैनरों और पोस्टरों से पाट दिया गया। नीतीश के रणनीतिकार जानते हैं कि मोदी भीड़ खींच सकते हैं, लेकिन अपने घरों की ओर लौटती यह भीड़ जब हर तरफ नीतीश के पोस्टर देखेगी, तो महसूस करेगी कि वह अब भी टक्कर दे रहे हैं। बकौल किशोर, 'पिछले वर्ष लोकसभा चुनाव में मोदी ने हर नेता को पिछाड़ते हुए अपने रणनीतिक चातुर्य से हर किसी को अचंभित कर दिया था। मगर बिहार के इस चुनाव में अपनी जमीन पर लड़ते नीतीश मोदी पर भारी पड़ रहे हैं।'
विज्ञापन


वरिष्ठ पत्रकार और बहनजी-ए पॉलिटिकल बायोग्राफी ऑफ मायावती के लेखक
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें