बुद्ध प्रकाश जा रहा है, राहत पैकेज आ रहा है। यह सरकारी विनम्रता ही है कि वह अरबों-खरबों की इमदाद को इतना घटाकर ऐसे बता रही है, जैसे कोई धन्नासेठ अपनी भव्य अट्टालिका को गरीबखाना कह दे। जैसे कोई छप्पन भोग को रूखा-सूखा भोजन कहने लगे। अतिश्योक्तियों का अपना सौष्ठव होता है। बताया गया है कि जगह-जगह पर लोन मेले लगेंगे। मेले लगेंगे, तो यकीनन झमेले भी होंगे। तब तो तय है कि मुल्क को हेराफेरी में पारंगत नए पोस्टर बॉय जरूर मिलेंगे।
मेला भरेगा, तो दुकान-दुकान पर बच्चों का जी बहलाने के लिए नाना प्रकार के झुनझुने टाइप बाजे और वयस्कों के लिए तमाम तरीके के खाजे रहेंगे। सबको पता है कि आस जब ऊपर से चल पड़ी है, तो वह देर या सवेर नीचे तक जरूर आएगी। रेवड़ियां बंटेगी, तो कमोबेश सबको मिलेंगी। गिलास में रखे रंगीन द्रव के ऊपर तैरते ग्लेशियर एकबारगी पिघलने लगे, तो गले के नीचे ठंडक जरूर उतरेगी। जनरल नॉलेज के मुताबिक, दुनिया की कोई चीज सदैव ऊपर से ऊपर नहीं जाती, अंततः नीचे और नीचे रसातल में जरूर जाती है।
कहते हैं कि न्यूटन के जमाने में एक सेब पेड़ से टूटा था, तो गप्प से उसकी हथेलियों की बाउल में नूतन नियम बन जा गिरा था। वह सेब किसी बाहुबली की ड्योढ़ी में टंगी झल्ली में नहीं जा पहुंचा था। इसी तरह झड़बेरी के बेर जब-जब झड़ते हैं, तब-तब सीधे नीचे धरती पर ही आ टपकते हैं। अभी तक ऐसी कोई सूचना नहीं कि किसी की अलगनी पर सूखने के लिए टंगे कपड़े हवा के झोंके से उड़कर डायरेक्ट अंतरिक्ष में चले गए हों। महानगर से पैदल घर लौटते बुद्धू को यह
बात भलीभांति पता है। किसी बात का अता-पता होने भर से न तो समस्याओं का समाधान होता है और न फरिश्तों की तरह कंधों पर पंख उग आते हैं। वह निरंतर आगे और आगे बढ़ रहा है। बढ़ता ही चला जा रहा है। उसकी बीवी-बच्चे परछाईं की तरह साथ हैं। हर परछाईं की कांख में कोई न कोई गठरी दबी है। जिसकी जैसी सामर्थ्य, उतने वजन की गठरी। हर गठरी में गृहस्थी से जुड़े आवश्यक सामान और महानगरीय जीवन के अस्फुट स्मृति चिह्न हैं। उसका नाम बुद्ध प्रकाश है।