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धर्म और राजनीति का गठजोड़

Thu, 04 Dec 2014 12:49 AM IST
भारत डोगरा
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हाल के रामपाल प्रकरण से एक बार फिर स्पष्ट हो गया है कि ऐसे कथित बाबाओं और संतों की सीमा-रेखा निर्धारित करना कितना जरूरी हो गया है। जब सभी नियम-कानून तोड़कर बाबा हथियार एकत्र करने लगें, कमांडो फोर्स तैयार करने लगें, तो जरूरी है कि उचित समय पर उन्हें उनकी सीमा-रेखा दिखा दी जाए। रामपाल की कहानी धर्म और राजनीति के गठजोड़ से पैदा संकट की कहानी है।
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इस प्रकरण में प्रशासन ने अपना काम किया तो सही, लेकिन काफी देर से। इसी वजह से इतना ज्यादा तनाव पैदा हुआ। बड़ा मुद्दा यह नहीं है कि इसमें कितनी गलती मौजूदा सरकार की थी व कितनी पिछली सरकार की। मूल बात तो यह है कि इस प्रकरण से सबक लेते हुए भविष्य में ऐसी तनावपूर्ण स्थितियां न पैदा होने दी जाए।

कुल मिलाकर पुलिस व प्रशासन ने रामपाल की गिरफ्तारी को अपेक्षाकृत सुलझे हुए तरीके से निभाया। जब कुछ कमांडो सहित लगभग 30,000 अनुयायी एकत्र हो जाएं तथा महिलाओं व बच्चों को ढाल की तरह उपयोग किया जाए, तो जाहिर है कि गिरफ्तारी आसान नहीं थी। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस टकराव में कुछ लोगों की जानें चली गईं और पुलिसकर्मियों सहित कई लोग घायल हो गए।
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राज्य प्रशासन चाहे इसे अपनी बड़ी सफलता माने, पर इसके साथ उसे इस सवाल का सामना करना पड़ेगा कि जिस समय रामपाल के हथियारों का जखीरा एकत्र हो रहा था, उसकी कमांडो फोर्स तैयार की जा रही थी व आश्रम को किला या छावनी बनाने जैसी तैयारियां चल रही थीं, उस समय प्रशासन ने इस तरह की खतरनाक गतिविधियों को रोकने की पहल समय रहते क्यों नहीं की।

यदि प्रशासन को इन गतिविधियों की जानकारी ही नहीं थी, तो यह एक बड़ी प्रशासनिक विफलता है। दूसरी ओर यदि प्रशासन को राजनीतिक दखलंदाजी के कारण ऐसी जानकारी पर समुचित कार्यवाही करने से रोका गया, तो इसकी जानकारी भी लोगों के सामने आनी चाहिए या इस पर समुचित कार्यवाही होनी चाहिए।

हाल के वर्षों में ऐसे अनेक उदाहरण मिल जाएंगे, जहां राजनीतिक संबंधों के आधार पर अनेक बाबाओं व स्वयंभू संतों ने बहुत संपत्ति अर्जित की, सार्वजनिक भूमि पर अवैध कब्जे किए व अपने आश्रमों को अनेक अनैतिक गतिविधियों का अड्डा बनाया। ऐसे कुछ बाबाओं या संतों का साम्राज्य आश्चर्यजनक तेजी से फैला। वे कुछ ही वर्षों में करोड़ों-अरबों रुपयों की संपत्ति के स्वामी बन गए, जिसके लिए उचित टैक्स भी नहीं चुकाया गया। ऐसे तमाम मामले सामने आ चुके हैं, जिससे यह सिद्ध होता है कि हजारों परिवारों व विशेषकर महिलाओं के जीवन को इन आश्रमों व उनके बाबाओं ने बर्बाद किया है।

असल में ऐसे कथित बाबाओं का कारोबार राजनीतिक संरक्षण के बल पर ही फैला। किसी खास वर्ग, समुदाय या पंथ का वोट हासिल करने के लिए राजनेताओं ने इन बाबाओं का सहारा लिया, तो बदले में इन बाबाओं ने उनके राजनीतिक संरक्षण का भी फायदा उठाया। यही वजह है कि ऐसे बाबाओं का साम्राज्य अबाध ढंग से पसरता चला गया।

हमारे समाज में एक ओर सार्थक सुधारों को लेकर काफी खालीपन आया है, तो दूसरी ओर कई तरह के अनिश्चिय तेजी से बढ़े हैं। नशे जैसी कई सामाजिक बुराइयां तेजी से बढ़ी हैं, जिससे लाखों जीवन संकटग्रस्त हुए हैं। ऐसे माहौल में अंधभक्ति व अंधविश्वासों पर आधारित सोच को तेजी से फैलाना कई बाबाओं व आश्रमों के लिए आसान हो गया। हालांकि इस बात से भी इन्कार नहीं किया जा सकता कि आज के समय में भी कई संत ऐसे हैं, जिन्होंने समाज में सार्थक भूमिका निभाई है। नशे की समस्या को कुछ हद तक कम करने में कुछ संतों का भी योगदान है। यही नहीं, कुछ संतों एवं आश्रमों ने समाज के उपेक्षित समुदायों को एकजुट करने और उन्हें समाज की मुख्यधारा में लाने का भी काम किया है।

इन सीमित सार्थक भूमिकाओं को स्वीकार करते हुए भी अंधविश्वासों व अंधभक्ति की आड़ में पल रही अनेक अनैतिकताओं के विरुद्ध आवाज उठाना जरूरी है। लोकतंत्र में सबको अपने विचारों को फैलाने की स्वतंत्रता है, लेकिन साथ ही लोकतांत्रिक मर्यादाओं का पालन करना भी उनके लिए जरूरी है। अंधभक्ति की आड़ में न तो किसी को कानून का उल्लंघन करने दिया जा सकता है, न ऐसा सत्ता केंद्र बनाने दिया जा सकता है, जो लोकतंत्र के लिए खतरा हो। ऐसी स्थिति में उचित कार्यवाही उचित समय पर होनी चाहिए और राजनेताओं को धार्मिक संतों का सहारा लेने से बचना चाहिए।
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