एक समय पाकिस्तान के पत्रकारों को लोकतंत्र के चैंपियन के रूप में देखा गया-यदि वे कभी-कभी दोषपूर्ण सच बताते थे, तो इतने साहसी भी थे कि जनरल परवेज मुशर्रफ के सैन्य शासन को हटाने में उन्होंने मदद की और अंधेरे मुल्क को आईना दिखाने का काम किया। लेकिन टीवी पत्रकार हामिद मीर पर हुए हमले ने लगता है कि सबकुछ बदल दिया है। इस घटना के बाद मुल्क के मीडिया में विभाजनकारी जंग छिड़ गई है।
जियो न्यूज, मीर जहां काम करते हैं, ने अपने चैनल पर प्रसारित खबरों में यह आरोप लगाया है कि मीर पर हुए हमले के पीछे इंटर-सर्विस इंटेलिजेंस (आईएसआई) निदेशालय का हाथ था। आईएसआई के आलोचक भी मानते हैं कि इस हमले के लिए आईएसआई प्रमुख को अपराधी बताना जल्दबाजी था, खासकर ऐसे समय में, जब इस्लामी कट्टरपंथी भी पत्रकारों को निशाना बनाते हैं। लेकिन प्रतिद्वंद्वी चैनलों ने इस विवाद को और तूल दे दिया है। वे न केवल जियो पर हमलावर हो उठे हैं, बल्कि मीर के उद्देश्य पर भी सवाल उठा रहे हैं।
इन आरोप-प्रत्यारोपों ने पाकिस्तान की मीडिया क्रांति के चिंतनीय पहलुओं को उजागर किया है। अपनी व्यावसायिक और व्यक्तिगत शत्रुता के चलते अगर बड़े मीडिया घराने सेना का साथ देते हैं, तो वे इस क्षेत्र को खतरे में डाल सकते है।
इन विवादों से दूर रहने वाले अखबार डॉन के संपादक जफर अब्बास बताते हैं- जिस तरह से यह हुआ है, वह बेहद दुखद है, यदि मीडिया घरानों में परस्पर सौहार्द कायम नहीं हुआ, तो हमने जो प्रेस की आजादी हासिल की है, उसे खो देंगे।
2007 के बाद, जब मुशर्रफ के निष्कासन के लिए सड़कों पर हुए विरोध प्रदर्शनों की कवरेज में मीडिया ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, तभी से पाकिस्तानी समाज में न्यूज मीडिया ताकतवर बनकर उभरा। टेलीविजन न्यूज ने सार्वजनिक बहस को विस्तार दिया और बुराइयों को उजागर किया, लेकिन घटिया रिपोर्टिंग और इस्लामी कट्टरपंथियों को मंच देने के लिए उसकी आलोचना भी की गई। बाजार के विस्फोट ने भी हामिद मीर जैसे प्राइम टाइम टॉक शो के प्रस्तोता को शक्तिशाली शख्सियत बनाया और कुछ थोड़े से नए मीडिया मालिकों की किस्मत को चमकाया। हालांकि रिपोर्टरों के लिए यह समय खतरनाक ही रहा। एमनेस्टी इंटरनेशनल के मुस्तफा कादरी बताते हैं कि 2008 में जबसे लोकतंत्र की बहाली हुई, करीब 34 पत्रकार काम करते हुए मारे गए।
जंग समूह, जियो के मालिक और देश के सबसे बड़े मीडिया समूह और आईएसआई के बीच कुछ समय तक तनाव बना रहा। जंग को मीर शकील-उर-रहमान ने खरीद लिया, जो अपनी दो पत्नियों के साथ दुबई में रहते हैं। वहीं से वह पाकिस्तानी मीडिया साम्राज्य पर तगड़ी पकड़ रखते हैं। पिछले पतझड़ में रहमान को पता चला कि उनके व्यावसायिक और राजनीतिक चैनल को निष्प्रभावी करने के लिए आईएसआई एक नए चैनल बोल को स्पांसर कर रही है। उनके अखबारों ने बोल के बारे में शत्रुतापूर्ण खबरें प्रकाशित करनी शुरू कीं, जिसने प्रतिस्पर्धी मीडिया संगठनों को जियो के खिलाफ खबरें प्रकाशित करने के लिए प्रोत्साहित किया, जिसमें जियो को पाकिस्तान के पुराने शत्रु भारत के प्रति हमदर्दी जताने वाला चैनल बताया गया।
जियो के वरिष्ठ अधिकारियों ने दावा कि उस विवाद ने उनके जीवन को खतरे में डाल दिया। मीर का दावा है कि आईएसआई ने उन्हें चैनल से दूर रहने के लिए लालच दिया और मारने की धमकी दी। मीर पर हमले के बाद यह तनाव सार्वजनिक रूप से भड़क उठा। इस असामान्य खुली चुनौती से आईएसआई नेतृत्व तिलमिलाया हुआ है। ऐसा नहीं लगता कि मीर पर हमले से जुड़ा विवाद कभी सुलझ पाएगा।