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प्रियंका के आने का मतलब

Tue, 29 Apr 2014 07:57 PM IST
रशीद किदवई
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मंडराती हार के साये तले देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस ने अपनी हालत में सुधार के संकेत दिए हैं। प्रियंका गांधी की उपस्थिति 16 मई के बाद के घटनाक्रम को निर्धारित करने के लिहाज से अहम मानी जा सकती है। कांग्रेस नेतृत्व समझता है कि 2004 और 2009 के लोकसभा चुनावों में जीत की वजह से पार्टी का आम कार्यकर्ता नेहरू-गांधी परिवार के प्रति गहन निष्ठा रखता है। इसके अलावा पार्टी में ऐसा कोई नेता भी नहीं है, जिसकी सर्वस्वीकार्यता हो और जिसमें सोनिया या राहुल की तरह भीड़ खींचने और पार्टी की एकजुटता प्रदर्शित करने की क्षमता हो।
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मगर इस बार के हालात को देखते हुए 16 मई के बाद कांग्रेस के 'प्रियंका अभियान' में तेजी आने की उम्मीद है। कांग्रेसियों, खासकर वरिष्ठ कार्यकर्ताओं में भी यह सुगबुगाहट है कि एक युवा गांधी संसद में पार्टी की कमान (कहा जा सकता है कि विपक्ष के नेता के रूप में), और दूसरा, कांग्रेस के संगठनात्मक ढांचे को संभालने को बिल्कुल तैयार है। अगर यह देखना हो कि एक ही परिवार के दो या अधिक सदस्य किसी राजनीतिक पार्टी का महत्वपूर्ण चेहरा बनकर किस तरह उभरते हैं, तो बादल परिवार, मुलायम सिंह यादव, एम करुणानिधि और अजित सिंह जैसे तमाम उदाहरण दिए जा सकते हैं। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता भी कह रहे हैं कि अगर नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बन जाते हैं, तो प्रियंका पर सक्रिय राजनीति में शामिल होने के लिए दबाव बढ़ाया जाएगा, ताकि जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा और राजीव गांधी ने जिस 'अखंड भारत' के विचार के नाम पूरा जीवन समर्पित कर दिया, उसकी रक्षा की जा सके।

कांग्रेस के भीतर इस समय प्रियंका की करिश्माई शख्सियत, मोदी को उन्हीं की जुबान में जवाब देने की क्षमता और उनकी सहजता के ही चर्चे हैं। रॉबर्ट वाड्रा के मामले में जिस तरह का जवाबी रुख प्रियंका ने अपनाया है, उससे कांग्रेसी कार्यकर्ता अचंभित हैं। अभी तक रक्षात्मक रवैया अपनाए कांग्रेसियों को वाड्रा को लेकर किए जा रहे भाजपा और मोदी के हमलों का कोई जवाब नहीं सूझ रहा था। मगर जैसे ही प्रियंका ने रायबरेली में अपना मुंह खोला, कार्यकर्ताओं में उत्साह भर गया।
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दरअसल भारतीय राजनीति में नैतिकता जैसा कोई मुद्दा रहा नहीं। मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव, मायावती, जगन मोहन रेड्डी और जयललिता जैसे तमाम क्षेत्रीय नेताओं समेत पूरा राजनीतिक नेतृत्व अवैध संपत्ति के मामलों में कठघरे में खड़ा दिखता है। इसके अलावा अमित शाह, लालकृष्ण आडवाणी, शिबू सोरेन जैसे कई दूसरे नेताओं पर आपराधिक मामले दर्ज हैं। ऐसी राजनीतिक संस्कृति में कांग्रेसी कार्यकर्ताओं से भी यह उम्मीद की जाती है कि वह परिवार के प्रति वफादारी निभाएं।

दूसरी ओर, सोनिया गांधी के राहुल को प्रियंका पर तरजीह देने के फैसले पर भी सवाल खड़े होते रहे हैं। कई कांग्रेसी भी ऐसे सवालों को वाजिब मानते हैं। कुछ इसकी वजह इटली की कैथोलिक संस्कृति को मानते हैं, जहां भारत की तरह बेटी की तुलना में बेटे को ज्यादा महत्व मिलता है। मगर सोनिया के फैसले को एक मां की निगाह से देखा जाना चाहिए। वह जानती थीं कि प्रियंका के लिए अपने दोनों बच्चों का लालन-पालन कहीं ज्यादा जरूरी था। मगर अब जबकि उनके बच्चे बड़े हो गए हैं, प्रियंका अपने भविष्य के बारे में आसानी से फैसला ले सकती हैं।

इन चुनावों में हमें एक परिपक्व सोनिया के दर्शन हो रहे हैं। कांग्रेस की उम्मीदों को जिंदा रखने के लिए वह एक कुशल गृहिणी की तरह अपने संसाधनों का उपयोग कर रही हैं। सोनिया के नजदीकी सूत्रों की मानें, तो संजय बारू की किताब से उपजे विवाद के बाद से वह मनमोहन सिंह को अधिक महत्व दे रही हैं। दरअसल किताब में दावा किया गया है कि प्रधानमंत्री के पास राजनीतिक शक्ति ही नहीं है। यह महज संयोग नहीं कि जब प्रियंका से बारू की किताब एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर पर टिप्पणी करने को कहा गया, तो उन्होंने मनमोहन सिंह को 'सुपर प्राइम मिनिस्टर' कहने में तनिक भी देर नहीं लगाई। सूत्र यह भी बताते हैं कि सोनिया ने कांग्रेस के रणनीतिकारों से रोजाना फीडबैक लेना शुरू किया है। साथ ही, वह राहुल की टीम के भी संपर्क में हैं। यह स्थिति मार्च, 2014 और अप्रैल के पहले हफ्ते के ठीक उलट है, जबकि चुनाव की सारी बागडोर कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी, जयराम रमेश और कुछ चुनिंदा नेताओं के हाथों में थी।

कांग्रेसी नेता बताते हैं कि छह चरणों के चुनाव के बाद पार्टी ने दो तरह की रणनीति अपनाई है। पहला, कांग्रेस की संभावनाओं को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना, ताकि ज्यादा से ज्यादा सीटें हासिल की जा सकें। हालांकि पार्टी के अंदरूनी सूत्रों की मानें, तो कांग्रेस के कई पदाधिकारी मानते हैं कि देश को संबोधित करने की जिम्मेदारी राहुल की जगह सोनिया को संभालनी चाहिए।

रणनीति का दूसरा हिस्सा चुनाव के नतीजों की घोषणा के बाद होने वाले संभावित नुकसान के असर को सीमित करने से जुड़ा है। सोनिया और उनके नजदीकी पराजय का ठीकरा मनमोहन सिंह के सिर पर फोड़ने के खिलाफ हैं, क्योंकि इससे नेहरू-गांधी परिवार की बदनामी होगी। आखिर प्रधानमंत्री के तौर पर मनमोहन सिंह का चुनाव सोनिया ने ही किया था। सूत्र बताते हैं कि राहुल को पार्टी के भीतर से उठती शिकायतों का सामना करना पड़ सकता है।

कांग्रेस के इस बुरे समय में 'प्रियंका लाओ देश बचाओ' अभियान कांग्रेसी नेता और कार्यकर्ताओं के लिए मरहम साबित हो सकता है। मगर अपनी भूमिका के बारे में फैसला तो खुद प्रियंका को ही करना है।
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