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साबरमती के नए संत

Sun, 04 Oct 2015 07:22 PM IST
राजेंद्र शर्मा
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वह गांधी जी ही थे। वही घुटा सिर। वही गोल शीशोंवाला कमानीदार चश्मा। वही डेढ़-पसली की काया और वही अधनंगा बदन। फिर भी कुछ था, जो अपनी जगह नहीं था। न आंखों में वह चमक थी, न चाल में वह तेजी। शक हुआ, बापू ही हैं या कोई और...। उनसे पूछ ही लिया, बापू ही हैं या...?
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बुजुर्ग ने जवाब दिया, बहुरूपिया हूं! जवाब के साथ आंखों में चमक कौंध गई। झट पहचान लिया। पास जाकर बोला, आपने क्या हाल बना रखा है? मुंह से निकलते-निकलते रह गया-कुछ लेते क्यों नहीं! बुजुर्ग ने इसका खंडन करने की कोशिश नहीं की। उल्टे चिंता जताने के लिए शुक्रिया कहा और हाथ जोड़ दिए, अब मुझे चलना चाहिए।

महान बंदे का भी जन्मदिन साल में एक बार ही होता है। उसके बाद तो जाना ही होता है, खासकर उन्हें, जिनके बुत चौराहों पर लगते हैं। पर बुजुर्ग को ऐसी भी क्या जल्दी है? धीमी चाल से वह मुश्किल से बीस कदम दूर निकले होंगे, मैंने दौड़कर उन्हें पकड़ लिया और पूछा, इस बार ऐसी उतावली क्या है? क्या कोई नई बात है? बुजुर्ग ने कहा, नई बात का तो पता नहीं, पर हर साल आने का चक्कर अब खत्म हुआ।
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क्यों, किसी से कोई नाराजगी है क्या? जवाब आया, नाराजगी नहीं है। बात सिर्फ इतनी है कि अब मुझे जन्मदिन पर भी याद करने की जरूरत नहीं। जब नया गांधी आ गया है, तो पुराने गांधी की क्या जरूरत? मैंने चौंककर उनकी ओर देखा, तो उन्होंने पास में लगे एक होर्डिंग की ओर इशारा कर दिया। होर्डिंग में साबरमती के नए संत के अवतरण का एलान था।

मैंने कहा, यह रीमेक का जमाना है। हिट फिल्म के रीमेक का मौका कौन छोड़ता है! इस पर बुजुर्ग चिढ़ गए, मैं किसी से साबरमती की संतई मांगने नहीं गया था। यह नए संतों को ही मुबारक हो। मैं अपनी संतई के लिए नहीं, दादरी के इकलाख के लिए फिक्रमंद हूं। साबरमती के नए संत के दिल में उसके लिए पता नहीं, कितना दर्द होगा?
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मैं कुछ कहता, इससे पहले बुजुर्ग आगे बढ़ गए।
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