पृथ्वी पर किन्हीं दो देशों के बीच ऐसे सहज संबंध नहीं होंगे, जैसे भारत और नेपाल के बीच हैं। फिर भी सत्रह साल का फासला तय करने के लिए दिल्ली और काठमांडू को नरेंद्र मोदी की प्रतीक्षा करनी पड़ी। कैसी अद्भुत विदेश नीति हम अब तक चलाते रहे कि मित्रों के साथ प्रतीक्षा सूची, और जो हम पर युद्ध थोपते रहे, उनके साथ अमन की शामें।
नेपाल की संसद में नरेंद्र मोदी के उद्बोधन ने गजब का असर डाला। युद्ध से बुद्ध की ओर जाने वाला समाज, वीरता और पराक्रम का प्रतीक गोरखा युवा, नेपाल के लिए 'हिट' यानी हाइवेज, आइवेज और ट्रांसवेज जैसे शब्दों का प्रयोग नेपाल के सामूहिक मानस में सदा के लिए अंकित हो गए। नेपाल में भारत के प्रति वैमनस्य की दृष्टि रखने वाले गुट यही कहते रहे कि भारत बड़े दादा की दृष्टि से नेपाल को छोटा मानता रहा है। लेकिन मोदी ने नेपाल को अपने से भी ऊंचा सम्मान देने का जो ईमानदार प्रयास किया, उससे सामान्य नेपाली नागरिक भी गद्गद हो गया।
अद्भुत है भारत-नेपाल संबंध। देवनागरी लिपि में नेपाली भाषा लिखी जाती है। विक्रम संवत वहां का शासकीय एवं सामान्य जनता के मध्य व्यवहार में आने वाला कैलेंडर है। वहां जनवरी, फरवरी नहीं, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन माह चलते हैं। हम ही दो ऐसे देश हैं, जिनके नागरिकों को एक-दूसरे के देश में आने-जाने के लिए पासपोर्ट और वीजा की आवश्यकता नहीं होती। विश्व में केवल नेपाल के ही नागरिकों को भारत की फौज में भर्ती होने की अनुमति है। नेपाल के अधिकांश नेता काशी और कोलकाता से पढ़कर गए और यहीं उन्होंने नेपाल में लोकतंत्र की स्थापना के संघर्ष का बिगुल भी बजाया। लेकिन वह पीढ़ी अब बूढ़ी हो रही है और उसे यह चिंता है कि नई पीढ़ी पश्चिम और चीन की तरफ ज्यादा झुक रही है, इसलिए भविष्य में भारत-नेपाल संबंधों के मध्य आत्मीयता की ऊष्मा कौन बचाएगा?
इसका उत्तर नरेंद्र मोदी ने अपनी काठमांडू यात्रा में दिया कि जब तक परस्पर विश्वास, समानता के आधार पर भाईचारा और आर्थिक सहयोग का संपुट नहीं होगा, तब तक संबंध सत्रह-सत्रह साल के ठंडे बस्ते में पड़े रहेंगे। सबसे पहली आवश्यकता है कि नेपाल में संविधान का निर्माण हो। संसदीय चुनावों से चुनकर आने वाली सरकार ही दीर्घकालिक परिणाम देने वाली होगी।
मोदी ने पंचेश्वर सहित कई योजनाओं को जल्दी पूरा करने का भी भरोसा दिलाया है। इससे नेपाल में उद्योग-धंधे बढ़ेंगे और उत्पादन होने वाली अतिरिक्त बिजली खरीद कर भारत अपने यहां का अंधेरा भी दूर कर सकता है। दस हजार करोड़ नेपाली रुपयों की क्रेडिट लाइन देकर भारत ने नेपाल की क्रय क्षमता को महत्वपूर्ण समय में मदद दी है।
यह सच है कि भारत-नेपाल सरकारों के बीच हुए अनेक समझौतों को क्रियान्वित करने में कठिनाई इसलिए पेश आती रही, क्योंकि नेपाल एक त्रासद दौर से गुजरा है और उसने अराजकता वाले आंदोलनों का सामना किया है। पर मोदी ने नेपाल की मूल चेतना को प्रणाम कर संबंधों की ऊंचाई का नया सागरमाथा पूजित किया है। द्विपक्षीय संबंध बेशक आर्थिक और कूटनीतिक आधार पर बनते हों, पर पारस्परिक विश्वास और आत्मीयता ही उसका आधार हो सकता है।
(लेखक भाजपा के राज्यसभा सदस्य हैं)