फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

सपने में टमाटर

Tue, 05 Aug 2014 06:34 PM IST
राजेंद्र शर्मा
विज्ञापन
विज्ञापन
केंद्र में सरकार क्या बदल गई है, लोग मामूली बात पर भी शोर मचाने लगे हैं। आखिरकार पब्लिक को भी तो कुछ एडजस्ट करना चाहिए। यह क्या बात हुई कि लोग टमाटर खाने की जिद पर अड़े हुए हैं? टमाटर के भाव क्या चढ़ गए, वे शोर मचाने लगे हैं कि क्या यही अच्छे दिन हैं? सरकारी पार्टी के नेता समझा-समझाकर हार गए कि भैया, कुछ और खा लो। आलू ले लो, इतने भी महंगे नहीं हैं। अभी तो तुम्हारी औकात प्याज खाने की भी है। लेकिन लोगों को तो बस टमाटर ही चाहिए। रसोई में टमाटर नहीं हैं, तो अच्छे दिनों के गायब होने की थाने में एफआईआर दर्ज कराने की धमकी दे रहे हैं।
विज्ञापन


सरकारी पार्टी के एक नेता ने यह समझाने की जरा-सी कोशिश क्या की कि टमाटर गरीबों की सब्जी नहीं है, लोग उसी बेचारे के पीछे पड़ गए। नेता ने क्या गलत कहा? हमने यह तो सुना है कि गरीब लोग नमक-मिर्च से रोटी खा लेते हैं, वे प्याज से रोटी खा लेते हैं। पर यह कभी नहीं सुना कि वे टमाटर से रोटी खा लेते हैं। तो टमाटर गरीबों के लिए हुआ या अमीरों के लिए? हां, कभी-कभी गरीबों की थाली में टमाटर की चटनी आ जाती होगी। कभी-कभी यह सस्ता हो जाता है, तो गरीबों के घर में भी किलो-आधा किलो पहुंच जाता है। लेकिन इससे यह गरीबों की सब्जी तो नहीं हो जाएगी। यह ठीक है कि टमाटर उगाने वाले किसानों में गरीब भी हैं। पर हर अच्छी चीज गरीबों तक पहुंचे, यह जरूरी तो नहीं है।

लोग यह क्यों नहीं समझ रहे कि टमाटर सिर्फ पेट भरने वाली चीज नहीं है। टमाटर वह सब्जी है, जो लोगों को आगे बढ़ने के लिए, ज्यादा मेहनत करने के लिए प्रेरित करती है। टमाटर लोगों के सपनों में आता है और उन्हें कर्मठ बनाता है। गरीब यह सोचकर मेहनत करता है कि एक दिन मैं भी टमाटर खाऊंगा, और मेहनत के बल पर टमाटर तक ही नहीं पहुंचता, गरीबी की रेखा भी पार कर जाता है। लक्ष्य ऐसे हों, तभी तो तरक्की आएगी। तरक्की आएगी, तो अपने साथ अच्छे दिन लाएगी और लाल-लाल टमाटर भी लाएगी।
विज्ञापन
विज्ञापन
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें