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कांग्रेस यानी गांधी परिवार, चिट्ठी लिखने वालों ने उठाया जोखिम

नीरजा चौधरी Published by: नीरजा चौधरी Updated Wed, 26 Aug 2020 07:56 AM IST
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सोनिया गांधी और राहुल गांधी - फोटो : पीटीआई

सोमवार को कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक के बाद जो संदेश बाहर आया, वह दर्शाता है कि कांग्रेस यथास्थिति बनाए रखना चाहती है और यही उसकी समस्या है। सब कुछ बिल्कुल प्रत्याशित था। उसी पुराने फॉर्मूले के तहत कार्यकारी अध्यक्ष सोनिया गांधी ने इस्तीफे की पेशकश की। फिर कांग्रेसियों ने उसे मानने से इनकार कर दिया तथा उन्हें पद पर बने रहने के लिए मनाया। पूरी पार्टी ने गांधी परिवार के प्रति अपनी निष्ठा जताई और एक कमेटी बनाने की बात की गई। यह कहा गया कि पार्टी अध्यक्ष पर विचार कांग्रेस कार्यसमिति के अधिवेशन में किया जाएगा।



सच्चाई यह है कि जब भी कांग्रेस के सामने सवाल उठे हैं, तब ऐसा ही किया गया है। जिन लोगों ने चिट्ठी लिखकर सवाल उठाए हैं, उन्होंने बड़ा जोखिम उठाया है, क्योंकि वे हाशिये पर डाले जा सकते हैं। कांग्रेस में ऐसा होता नहीं है, लेकिन इस बार ऐसा हुआ है, तो इससे समझना चाहिए कि पार्टी नेताओं में कितनी हताशा है। कायदे से पार्टी को इसका स्वागत करना चाहिए था, पर सारा विमर्श गांधी परिवार के इर्द-गिर्द सिमटकर रह गया। चिट्ठी लिखने वालों का इरादा पार्टी पर कब्जा करना या पार्टी तोड़ना नहीं है, ये पार्टी में सुधार चाहते हैं।


पर कार्यसमिति की बैठक से यही संदेश निकला है कि अभी यथास्थिति बनी रहेगी। हालांकि इस चिट्ठी से एक फर्क यह पड़ा है कि कांग्रेस पूर्णकालिक अध्यक्ष की तरफ बढ़ रही है। पर ऐसा कब होगा, इसकी कोई समय-सीमा निर्धारित नहीं की गई है। कांग्रेस देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी है। देश के सामने फिलहाल बड़ी चुनौतियां हैं।


कांग्रेस के सामने नरेंद्र मोदी जैसे कद्दावर नेता की चुनौती है। आगे कई राज्यों में विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं। कोरोना महामारी का प्रकोप देश में कहर ढा रहा है और अर्थव्यवस्था की स्थिति बदतर है। असंख्य लोगों की नौकरियां चली गई हैं। लॉकडाउन के दौरान हमने आजादी के बाद सबसे बड़ा विस्थापन देखा। चीन ने सीमा पर हमारी जमीन हड़प ली है। इतनी तरह की चुनौतियों के बीच देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के पास पूर्णकालिक अध्यक्ष नहीं है।


ऐसे में अगर पार्टी के अंदर से आवाज उठती है कि हमें पूर्णकालिक अध्यक्ष चाहिए, तो आवाज उठाने वालों को खलनायक बना दिया जाता है कि वे भाजपा की मदद कर रहे हैं। जबकि पार्टी की हालत क्या है, यह सभी जानते हैं। कार्यसमिति की बैठक में सोनिया गांधी को एक कमेटी बनाने के लिए अधिकृत किया गया है, जो उन्हें मदद करेगी और इन सवालों से जूझेगी।


वह कमेटी कब बनेगी, उसमें कौन होंगे, इसके बारे में अभी कुछ तय नहीं है। यह भी स्पष्ट नहीं है कि चिट्ठी पर हस्ताक्षर करने वाले इन 23 लोगों के खिलाफ पार्टी क्या सलूक करेगी। होना तो यह चाहिए था कि पार्टी नेतृत्व वरिष्ठ, युवा और चिट्ठी लिखने वाले नेताओं के एक समूह को बुलाकर कहता कि आपने अच्छे सुझाव दिए हैं। आइए, बैठकर बातें करते हैं कि आगे कैसे, क्या करना है।


छह महीने का जो समय दिया गया है, दरअसल उस दौरान राहुल गांधी को मनाने की कोशिश की जाएगी। और जिस तरह से आवाजें उठीं कि सोनिया नहीं तो राहुल, तो यह राहुल को मनाने का समय है। सोनिया गांधी चाहेंगी कि कांग्रेस अधिवेशन के जरिये राहुल की फिर से अध्यक्ष के रूप में ताजपोशी हो, क्योंकि अगर वह ऐसा नहीं चाहतीं, तो पिछले साल ही कोई और अध्यक्ष बन जाता। और अगर गांधी परिवार से बाहर का कोई आता है तथा उसे गांधी परिवार का समर्थन मिलता है, तो पार्टी को उसे स्वीकारने में कोई दिक्कत नहीं होगी।
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पार्टी तब स्वीकार नहीं करेगी और दो धड़ों में बंटेगी, जब किसी को गांधी परिवार का समर्थन नहीं मिलेगा। पार्टी में अनुभवी और प्रतिभाशाली नेताओं की कोई कमी नहीं है। सोनिया चाहती हैं कि राहुल बागडोर संभालें, लेकिन राहुल नहीं चाहते। वह कहते हैं कि उन्हें स्वतंत्र रूप से काम करने दिया जाए। इसका मतलब है कि वह वरिष्ठ लोगों से अलग अपनी टीम चाहते हैं। ऐसा तीन तरीके से हो सकता है।


एक तो जैसा कि इंदिरा गांधी ने किया था। दूसरा तरीका है कि आप नए लोगों की टीम बनाइए। और तीसरा तरीका है कि आप सबको साथ लेकर चलिए। कांग्रेस 135 साल पुरानी पार्टी है, जिसमें तरह-तरह के लोग हैं और सबको साथ लेकर चलना ही पड़ेगा। जो संकेत मिल रहे हैं, वह यही बताता है कि फिर से राहुल की ताजपोशी होगी। आज देश के जो हालात हैं, उसमें राहुल बहुत हिम्मत और मजबूती के साथ बोल रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को आड़े हाथों ले रहे हैं। वैसी हिम्मत विपक्ष का और कोई नेता नहीं दिखा रहा।


लेकिन वह देश की जनता को भरोसे में नहीं ले पा रहे। देश क्यों मोदी की तरफ झुका हुआ है, यह तो देखना ही पड़ेगा। उसके लिए क्या बदलाव करने की जरूरत है, इस पर कांग्रेस और राहुल को विचार करना चाहिए। आज देश के लोग परिवारवाद की राजनीति के हिमायती नहीं है। युवाओं को राहुल के पास आना चाहिए था, लेकिन वे मोदी के पास जा रहे हैं। स्पष्ट है कि राहुल देश की नब्ज पकड़ पाने में विफल रहे हैं। इन सब पर पार्टी को मंथन करना पड़ेगा।


भाजपा तो चाहती ही है कि मोदी बनाम राहुल की बहस चलती रहे। कांग्रेस के कई लोगों को इसका आभास है, भले ही कोई न बोल रहा हो। इस चिट्ठी का अंतर्निहित संदेश भी यही है। जब वे सामूहिक नेतृत्व की बात करते हैं, तो उनका आशय यही है कि राहुल के नेतृत्व के बारे में लोगों को शुबहा है। राहुल अगर अध्यक्ष बनते हैं, तो उन्हें सबको साथ लेकर चलना पड़ेगा।


राहुल फैसले तो सभी ले रहे हैं, लेकिन सामने से नहीं, पर्दे के पीछे से। जबकि लोग चाहते हैं कि वह जवाबदेही के साथ फैसले लें। राहुल अगर करना चाहें, तो ऐसा कर सकते हैं। पार्टी के भीतर हर मुद्दे पर खुली चर्चा करने की जरूरत है कि हमें क्या करना है, जिसमें सभी बिन लाग-लपेट के अपनी बात कह सकें।


देश अभी अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य और रोजगार के बड़े संकट से जूझ रहा है। उन्हें एक सुविचारित रोडमैप के साथ लोगों के पास जाना होगा और लोगों का भरोसा जीतना होगा। भाजपा से अलग आपका नैरेटिव क्या होगा, इसे सामने लाने की जरूरत है।

 

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