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महामारी के साथ टिड्डियों की मार

नरेंद्र सिंह राठौड़ Published by: संजीव कुमार झा Updated Tue, 26 May 2020 12:21 AM IST
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टिड्डी दल का हमला(फाइल फोटो) - फोटो : पीटीआई

ऐसे वक्त में जब पूरा देश कोरोना वायरस की महामारी से जूझ रहा है, देश के कुछ हिस्सों में एक और समस्या किसानों की परेशानी का सबब बनी हुई है। राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश जैसे राज्य इन दिनों टिड्डियों के आक्रमण से जूझ रहे हैं। आम तौर पर भारत में टिड्डियों के हमले नवंबर तक होते हैं, परंतु इस वर्ष टिड्डियों के झुंड अब भी देश में तबाही मचा रहे हैं।



वैज्ञानिकों का मानना है कि यह जलवायु संकट के कारण हुआ है। पिछले वर्ष मानसून पश्चिम भारत में छह हफ्ते पूर्व जुलाई में शुरू हुआ था और नवंबर तक सक्रिय था, जिसके चलते प्राकृतिक वनस्पति का उत्पादन हुआ, जो कि टिड्डियों के प्रजनन की आदर्श दशा थी। टिड्डियों का यह हमला भारत, पाकिस्तान के साथ ही ईरान की अर्थव्यवस्था के लिए भी चुनौती बन गया है, जो कि पहले ही कोविड-19 से उपजे हालात से जूझ रही हैं।


वास्तव में अफ्रीकी-एशियाई क्षेत्र में टिड्डियों का यह हमला खाद्य सुरक्षा को नुकसान पहुंचा सकता है, जहां कोविड-19 के कारण आर्थिक तबाही की स्थिति है। संयुक्त राष्ट्र खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम के कार्यकारी निदेशक डेविड बीसले ने आगाह किया है कि महामारी, 'भूख की महामारी' में भी बदल सकती है। हालात की गंभीरता को देखते हुए भारत ने टिड्डियों के हमले को नियंत्रित करने के लिए ईरानऔर पाकिस्तान के साथ समन्वित प्रयास का प्रस्ताव भी दिया है।


पाकिस्तान के पंजाब में बड़े पैमाने पर टिड्डियों द्वारा फसलों को नष्ट करने पर पाकिस्तान ने उसे राष्ट्रीय आपदा घोषित किया है। हमारे पंजाब में भी टिड्डियों के हमले की चेतावनी दी गई है। ईरान एवं पाकिस्तान के बलूचिस्तान में प्रजनन कर परिपक्व होने वाली टिड्डियां राजस्थान पहुंच गई हैं। यह दिसंबर-जनवरी की अवधि के उपरांत टिड्डियों के हमले का दूसरा दौर है, जब टिड्डियों को मारने के लिए आर्गेना फास्फेट का छिड़काव करने के लिए टीमों को तैनात किया गया था।


वैज्ञानिकों ने अरब सागर प्रायद्वीप में रेगिस्तानी क्षेत्र में मार करने वाले हिंद महासागर में कई चक्रवातों को दूसरे दौर के लिए जिम्मेदार ठहराया है, जिसने टिड्डियों के प्रजनन की स्थिति पैदा की। राजस्थान में जहां इससे 16 जिले प्रभावित हैं, वहीं उत्तर प्रदेश में 17 जिले और मध्य प्रदेश के कई जिले इससे प्रभावित हैं। 27 वर्षों में यह सबसे खराब हमला है।


टिड्डी दल राजस्थान से हरियाणा सीमा में प्रवेश कर दिल्ली में भी प्रवेश कर सकते हैं। केंद्र सरकार की चार टीमों एवं राज्य कृषि विकास की टीमों ने टिड्डियों को रोकने के लिए ट्रैक्टर एवं फायर ब्रिगेड के वाहनों की मदद से रासायनिक छिड़काव किया है। पहली बार राजस्थान में 30 अप्रैल को एक से चार किलोमीटर तक के फैलाव वाला टिड्डी दल पहुंचा, जो दस किलोमीटर क्षेत्र में फैल गया और तीन हफ्ते में 33 जिलों में पहुंच गया।


पिछले वर्ष मई के दूसरे पखवाड़े में पीली टिड्डी के दल ने पाकिस्तान से भारत में प्रवेश किया था। टिड्डी हमला यमन से शुरू हुआ था, जो पश्चिम एशिया, पाकिस्तान, भारत समेत 17 देशों में तबाही मचा रहा है। जैसलमेर के पास पाकिस्तान की सीमा से होकर उड़ते हुए, अजमेर जिले के किशनगढ़ में टिड्डी दल ने घुसपैठ की थी।
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पिछले एक सप्ताह में टिड्डी दल जैसलमेर, बाड़मेर, सिरोही, जालौर, भीलवाड़ा, उदयपुर, प्रतापगढ़, श्रीगंगानगर, बीकानेर, अजमेर, नागौर एवं जोधपुर के हिस्सों में देखा गया है। टिड्डियां एक दिन में 200-250 किलोमीटर की दूरी तय कर सकती हैं, यदि उन्हें हवा का सहारा मिल जाए। राजस्थान की धूल भरी आंधी-तूफान वाले हिस्से भी उनकी उड़ान तय करते हैं।


राजस्थान में गेहूं की फसल की कटाई लगभग पूरी हो गई है, लेकिन मई में बोई गई कपास की फसल, सब्जियों एवं चारे की फसलों पर टिड्डी दल हमला कर रहे हैं। राज्य के अधिकारियों को डर है कि टिड्डियों के कारण जुलाई-अगस्त में बाजरा, मूंग तथा मूंगफली  की फसल को नुकसान पहुंच सकता है। टिड्डी के प्रजनन पर वर्षा का प्रभाव सबसे ज्यादा होता है।


यदि गर्मी और सर्दी के मौसम में वर्षा होती है, तो टिड्डी के बच्चे का निकलना और झुंड में आक्रमण करना स्वाभाविक है। इस वर्ष जो टिड्डी का आक्रमण हुआ है, उसकी सबसे बड़ी वजह जलवायु परिवर्तन है, क्योंकि इस वर्ष पाकिस्तान एवं अरब देशों में सर्दी के मौसम में वर्षा हुई है। साथ ही अप्रैल और मई में वर्षा होने से भी टिड्डियों का प्रजनन प्रभावित हुआ और टिड्डी के असामयिक झुंड भारत आए।


राजस्थान में टिड्डी के झुंड अधिकतर खरीफ के मौसम में आते हैं, परंतु यदि मौसम अनुकूल हो, तो वे वसंत से पहले भी आकर रबी की फसल को नुकसान पहुंचाते हैं। टिड्डी का जीवन-चक्र मौसम की अनुकूलता के अनुसार वर्षभर रहता है।टिड्डी  नियंत्रण के लिए अंतरराष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय स्तर पर टिड्डी निगरानी दल बने हुए हैं, जिनके माध्यम से टिड्डियों के प्रजनन स्थान एवं पलायन के बारे में जानकारी दी जाती है।


अंडे देने के स्थनों पर कीटनाशकों का समय पर उपयोग कर नियंत्रण करना आवश्यक है। विभिन्न देशों के समन्वित प्रयास से ही टिड्डियों के सीमा पलायन को रोका जा सकता है। स्थानीय स्तर पर टिड्डी दलों की खोज, उनकी पहचान के आधार पर कारगर नियंत्रण, झुंड की स्थिति, जलवायु की दशा तथा सामुदायिक सहयोग पर निर्भर करता है।


किसानों को चाहिए कि वे टिड्डी दल नजर आते ही कृषि विभाग के अधिकारियों को सूचित करें। तीव्र ध्वनि यंत्रों जैसे डीजे, माइक, ढोल, थाली आदि बजाएं और इस दौरान सामाजिक दूरी का पूरा ध्यान रखें। टिड्डी दल रात में पेड़ों पर पड़ाव डालते हैं। ऐसे में उन्हें आसानी से नष्ट किया जा सकता है। टिड्डी के प्रकोप से बचाव के लिए साइपरमेथ्रिन या क्लोरपाइरीफॉस एक मिलीलीटर प्रति लीटर के हिसाब से घोल बनाकर छिड़काव करना भी कारगर हो सकता है।


-लेखक महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर के कुलपति हैं।

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