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उस्ताद अलाउद्दीन खान: बाबा का संगीत घराना...और हमारी समकालीन संवेदनशीलता

रामचंद्र गुहा
Updated Sun, 29 Dec 2024 06:56 AM IST

सार

जब बात हिंदुस्तानी वादकों की हो तो बाबा अलाउद्दीन खान का संगीत परिवार मेरे लिए दशकों तक सर्वाधिक आनंद का स्रोत रहा है। हालांकि दूसरे गुरुओं द्वारा सिखाए गए महान वादक भी मुझे उतना ही आनंद देते हैं।
 
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बाबा अलाउद्दीन खान। - फोटो : wikipedia


दिल्ली के संगीत समारोह में बिताई उस रात से पहले तक मेरे संगीत के शौक मुख्य रूप से ‘बॉब डायलन’ और ‘बीटल्स’ तक सीमित थे। हालांकि मैं कभी-कभी मोहम्मद रफी और लता मंगेशकर को भी सुनता था। धीरे-धीरे अपने से बड़े दो बंगाली दोस्तों का साथ मिलने के बाद मैंने शास्त्रीय संगीत को अधिक सुनना शुरू किया। मैं नाश्ते और लंच के बीच कक्षाएं छोड़कर ऑल इंडिया रेडियो सुनता था, क्योंकि उस समय दिल्ली रेडियो स्टेशन पर शास्त्रीय संगीत के कार्यक्रम प्रसारित होते थे। क्रिकेट प्रैक्टिस और डिनर के बाद मैं और अधिक संगीत सुनने के लिए रेडियो लेकर बैठ जाता था।


आजकल मैं ज्यादातर संगीत यूट्यूब पर सुनता हूं। हालांकि जब भी मौका मिलता है, मैं बंगलूरू में आयोजित होने वाले संगीत समारोहों में जाता हूं। मैं लंबी उड़ानों के दौरान अपने साथ आई पॉड रखता हूं। दिल्ली के मॉडर्न स्कूल में पचास साल पहले उस बदलती रात की यादें मुझे पिछले हफ्ते उस छोटे, लेकिन पूरी तरह से जादुई रिकॉर्डिंग के दौरान आईं, जिनमें अन्नपूर्णा देवी सुरबहार पर मंज खमाज बजा रही थीं। मैंने पहले भी उस रचना को सुना था, लेकिन अब किसी तरह इसने मुझे सोचने पर मजबूर किया कि मैं न केवल हमारे संगीत धरोहर का, बल्कि एक विशेष संगीत घराने का भी कितना ऋणी हूं। अन्नपूर्णा, अली अकबर की बहन थीं और रवि शंकर की पहली पत्नी। वह भी अपने पिता अलाउद्दीन खान से सीखी हुई थीं और उनका पसंदीदा वाद्य था सुरबहार। दुर्भाग्यवश उनका सार्वजनिक कॅरिअर एक दुखद शादी के कारण छोटा हो गया। इसके बाद वह एकांत में रहने लगीं। हालांकि उन्होंने छात्रों को प्रशिक्षण देना जारी रखा, जिनमें महान बांसुरी वादक हरिप्रसाद चौरसिया भी शामिल थे।


अन्नपूर्णा को सुनते हुए और 1974 में दिल्ली में अली अकबर और रवि शंकर को बजाए गए राग के बारे में सोचते हुए मुझे वेद मेहता द्वारा अलाउद्दीन खान पर लिखे एक निबंध की याद आ गई, जिसे मैंने सालों पहले पढ़ा था। इस निबंध में अलाउद्दीन के बांग्लादेश में स्थित एक दूरदराज गांव से लेकर गुरु की तलाश में कोलकाता पहुंचने और उनके संघर्षों की दास्तान है। कोलकाता से रामपुर पहुंचकर उन्होंने एक प्रसिद्ध बीनकार को गुरु बन जाने के लिए विनती की और अंत में नवाब के कहने पर उस शिक्षक ने उन्हें शिष्य स्वीकार कर लिया।


अलाउद्दीन बाद में मध्य भारत के छोटे राज्य मैहर चले गए, जहां उन्होंने अपना जीवन बिताया, संगीत बजाया और सिखाया। उनके शिष्यों में अली अकबर, रवि शंकर, सितार वादक निखिल बनर्जी और बांसुरी वादक पन्नालाल घोष और कुछ कम प्रतिभाशाली मैहर के महाराजा भी शामिल थे। जब वह नहीं सिखाते थे तो दिन में पांच बार नमाज अदा करते थे और नगर के हिंदू मंदिर में पूजा करते थे। इस दौरान वे ‘बाबा’ के नाम से प्रसिद्ध हो गए।


मेहता के लेख के अलावा मैंने अलाउद्दीन खान पर अंजना रॉय और सहाना गुप्ता की लिखी दो जीवनियां पढ़ीं। ये दोनों लेखक बाबा के शिष्यों के बच्चों के रूप में बड़े हुए थे, इसलिए संगीत पर लिखी उनकी किताबें मेहता की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण थीं। वे किताबें अल्लाउद्दीन की व्यक्तिगत और पेशेवर यात्रा, उनकी विभिन्न वाद्ययंत्रों में निपुणता, उनके भारतीय संगीत के लिए एक ऑर्केस्ट्रा बनाने और नए जोड़ रागों के निर्माण का वर्णन करती हैं। हालांकि इनमें से कोई भी लेखक बाबाजी के प्रमुख शिक्षण सूत्र के बारे में नहीं बताता है, जो मेहता द्वारा इंग्लिश में अनुवादित रूप में इस प्रकार है- ‘मैं पुरानी सोच से सहमत हूं कि शिक्षा और पिटाई एक साथ जाती हैं’। अली अकबर, रवि शंकर और कभी-कभी मैहर के महाराजा को भी अपने गुरु के धैर्य के अभाव के कारण डांट-फटकार का सामना करना पड़ा था।


हमारी समकालीन संवेदनशीलता अलाउद्दीन खान के इस पहलू को शायद अप्रिय मानती है। मुझे भी ऐसा ही लगता है। हालांकि मुझे उनकी बेटी अन्नपूर्णा देवी द्वारा सहाना गुप्ता की किताब के प्रस्तावना के तौर पर लिखी गई आखिरी चिट्ठी से थोड़ी तसल्ली मिली। इसमें लिखा था कि ‘बाबा ने चार दशकों से अधिक समय मैहर में बजाते, सिखाते और संगीत के अपने दिव्य उपहार को साझा करते हुए बिताया। उनके शिष्यों में 20वीं शताब्दी के सबसे प्रमुख वादक अली अकबर, रवि शंकर, पन्नालाल घोष, निखिल बनर्जी शामिल हैं।’ अन्नपूर्णा भी उन शिष्यों में से एक थीं, जिन्होंने खुद को किसी भी अन्य के समान अपने वाद्य में निपुण किया। अन्नपूर्णा का आखिरी वाक्य भी बहुत महत्वपूर्ण है, जिसमें वह कहती हैं- “बाबा को मैं अपने जीवन के सबसे अधिक धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति के रूप में जानती हूं।”
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मैं पांच दशकों से अधिक समय से अलाउद्दीन खान के शिष्यों द्वारा बजाए गए संगीत को सुन रहा हूं। धार्मिक कट्टरपंथियों और क्रिकेट के कट्टर समर्थकों के विपरीत संगीत प्रेमी संकीर्ण नहीं होते। इसलिए दूसरे गुरुओं द्वारा सिखाए गए महान वादक जैसे बिस्मिल्ला खान, विलायत खान, अब्दुल हलीम जाफर खान, एन. राजम, बुद्धदेव दासगुप्ता और राधिका मोहन मोइत्रा भी मुझे उतना ही आनंद देते हैं। फिर भी जब बात हिंदुस्तानी वादकों की हो तो बाबा का संगीत परिवार मेरे लिए दशकों तक सर्वाधिक आनंद का स्रोत रहा है। मैं अक्सर उनके सबसे प्रसिद्ध शिष्यों और घराने के अन्य शिष्यों को भी सुनता हूं, जिन्होंने भले ही उतनी प्रसिद्धि नहीं पाई हो, लेकिन वे अत्यधिक कुशल हैं, जैसे सरोद वादक शरण रानी, बहादुर खान और राजीव तारानाथ, इन सभी की सामाजिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि बिल्कुल अलग थी। इनमें से पहले दो को तो बाबा ने खुद शिक्षा दी थी, तीसरे को उनके बेटे अली अकबर ने प्रशिक्षित किया था।


मैं न तो संगीत का विद्वान हूं, न ही संगीत का विश्लेषक हूं, मैं तो बस एक उत्साही शौकिया श्रोता हूं। इसी भावना के तहत मैं अल्लाउद्दीन खान और उनके संगीत वंशजों की कुछ व्यक्तिगत पसंदीदा रचनाओं को निष्कर्ष में प्रस्तुत करता हूं। इनमें अन्नपूर्णा देवी का मंज खमाज, रवि शंकर का पहाड़ी झिंझोटी, अली अकबर खान का छायानट, निखिल बनर्जी का एक घंटा तेरह मिनट लंबा रागेश्वरी, पन्नालाल घोष का हम्सध्वनि और बहादुर खान का नट बिलावल शामिल हैं। इसके अलावा मैहर घराने की कुछ अद्भुत जुगलबंदी ऑनलाइन भी उपलब्ध हैं, जैसे अली अकबर और निखिल बनर्जी, अली अकबर और रवि शंकर, यहां तक कि रवि शंकर और अन्नपूर्णा के 1950 के दशक की एक साथ बजाते हुए एक रिकॉर्डिंग भी है। बाद में अन्नपूर्णा ने स्टेज को छोड़ दिया या उन्हें छोड़ने के लिए मजबूर किया गया। मैं एक ऐसी कालातीत जुगलबंदी का उल्लेख करना चाहता हूं, जो बाबा और गैर-बाबा, उत्तर और दक्षिण, हिंदुस्तानी और कर्नाटक, मुस्लिम और हिंदू का मेल है। यह अली अकबर खान द्वारा सरोद पर और डोरेस्वामी अयंगर द्वारा वीणा पर बजाया गया एक यमन/कल्याणी है। तबले पर इसे चतुरलाल और मृदंगम पर रामैया एमएस ने बजाया है। यह लगभग साठ साल पहले बंगलूरू में ललिता और शिवराम उभयकर के घर पर रिकॉर्ड किया गया था।

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