संसद का मानसून सत्र बहुत कठिन समय में शुरू हुआ है। सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 24 फीसदी की गिरावट के साथ अर्थव्यवस्था अप्रत्याशित रूप से मंदी की चपेट में है, औपचारिक क्षेत्र में दो करोड़ लोगों की नौकरी चली गई है, जबकि अनौपचारिक क्षेत्र में आजीविका के नुकसान के बारे में कोई आंकड़ा नहीं है। हम एक ऐसे स्वास्थ्य संकट के बीच फंसे हैं, जिसका अंत नहीं दिखता। हम अपनी सीमा पर चीन के साथ विवाद की स्थिति का सामना कर रहे हैं, जिससे टकराव की वास्तविक आशंका है।
ये तीन प्रमुख मुद्दे हैं, जो सार्थक बहस की मांग करते हैं। इनमें से हर संकट इतना गंभीर है कि उस पर चर्चा के लिए सरकार अलग से संसद का सत्र बुला ले। जैसा कि अक्सर विपक्ष द्वारा बताया गया है कि चीन के साथ 1962 के युद्ध के दौरान संसद का सत्र बुलाया गया था और तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू बहस के दौरान यह सुनने के लिए बैठे रहे कि विपक्षी नेता क्या कहते हैं, जिसमें उनकी आलोचना भी शामिल थी।
प्रधानमंत्री मोदी ने सीमा पर लड़ रहे सैनिकों को संदेश देने के लिए संसद से एकजुट होने का आह्वान किया। कांग्रेस ने प्रतिक्रिया में यह कहा कि सरकार चीन पर चर्चा पर जोर नहीं देगी, बल्कि सरकार ने स्थिति पर बयान दिया। वास्तव में सरकार यदि प्रमुख विपक्षी नेताओं को बंद कमरे में बैठक के लिए आमंत्रित करे, तो यह अच्छी पहल होगी। इसके जरिये वह उन्हें भरोसे में ले सकती है कि लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चीन के साथ क्या हो रहा है। पहले भी इस तरह की बैठकें होती रही हैं।
कोरोना संकट के कारण यह एक मुश्किल स्थिति है, जिसमें सांसद संसद भवन में एकसाथ जमा हो रहे हैं। लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति ने शारीरिक दूरी और अन्य सुरक्षा उपायों को सुनिश्चित किया है। फिर भी पहले दिन 25 सांसदों को कोरोना संक्रमित पाया गया। वैसे भी लगभग दो सौ सांसद इस सत्र में नहीं आ रहे हैं। उनमें से ज्यादातर 65 वर्ष से ज्यादा उम्र के हैं और उनमें से बड़ी संख्या दक्षिणी राज्यों से हैं। वे लंबी दूरी की यात्रा करने को लेकर आशंकित हैं और दिल्ली आने के बारे में भी, जो फिर से मामले बढ़ने के साथ कोविड राजधानी के रूप में देखी जाती है।
यह हाल के अतीत की तुलना में एक ऐसा समय है, जब सरकार और विपक्ष, दोनों को अपने सभी मतभेदों और कड़वाहटों को भुलाकर एकजुट होने की ज्यादा जरूरत है। अपने अध्यादेशों को कानून में बदलने का सरकार का अपना एजेंडा है। विपक्ष ने अर्थव्यवस्था की स्थिति और रोजगार पैदा करने के बारे में सरकार की योजनाओं पर चर्चा करने का आह्वान किया है, जो कि एक ज्वलंत मुद्दा है और जो समय बीतने के साथ और भी ज्यादा गंभीर होता जाएगा। गैर सरकारी संगठनों के कुछ सर्वेक्षणों से पता चला है कि दस में से चार लोगों ने अपनी तात्कालिक खाद्य जरूरतों के लिए कर्ज लिया है।
एक और सवाल, जो कि उतना ही महत्वपूर्ण है और अब एक बड़ी चिंता पैदा कर रहा है, वह यह कि एक दिन में एक लाख के करीब कोरोना संक्रमण के मामले क्यों सामने आ रहे हैं। जाहिर है, इसका संबंध लॉकडाउन हटाने से है, जो कि आर्थिक गतिविधियों को बहाल करने के लिए जरूरी था। लेकिन स्पष्ट रूप से यह सही ढंग से नहीं किया गया। इस बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं है कि तीसरे और चौथे दर्जे के शहर और कस्बे (वास्तव में ग्रामीण क्षेत्र, जहां सक्रमण फैल गया है) कोरोना संक्रमण का मुकाबला कैसे कर रहे हैं। इस बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिए संसद से बेहतर जगह और कौन हो सकती है, जो पूरे देश के सांसदों को एकजुट करती है?
और अब प्रश्नकाल में कटौती, जिसे खत्म किया जा रहा है। यह बहुत ही नुकसानदेह होने वाला है। हाल के वर्षों में जब विपक्षी दलों ने किसी मुद्दे को लेकर विरोध शुरू किया, तो प्रश्नकाल को स्थगित करने की मांग हुई है। इसलिए पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने प्रश्नकाल का समय 11 बजे से बदलकर बारह बजे दोपहर कर दिया था।
एक ऐसा भी वक्त था, जब प्रश्नकाल को इतनी गंभीरता से लिया जाता था कि मंत्री पूर्वसंध्या पर किसी को मिलने का समय नहीं देते थे, क्योंकि वे अनुपूरक सवालों का सामना करने के लिए पूरी तरह से तैयार होना चाहते थे, जो तारांकित प्रश्नों के मद्देनजर पूछे जा सकते थे।
प्रश्नकाल संसदीय कामकाज का बहुत ही जरूरी हिस्सा है। आम तौर पर संसद में बड़े मुद्दों पर चर्चा होती है, जैसे इस सत्र में अर्थव्यवस्था, चीन, कोविड-19 जैसे मुद्दे उठाए जाएंगे, लेकिन लोगों की कथित छोटी-छोटी चिंताएं प्रश्नकाल में ही परिलक्षित होती हैं। यह सरकार को ज्यादा जवाबदेह बनाने का उपकरण है और दोतरफा प्रक्रिया भी है। सरकार को पूरे देश के सांसदों से फीडबैक भी मिलता है कि उनके निर्वाचन क्षेत्र में क्या हो रहा है।
इस मानसून सत्र में प्रश्नकाल ने और भी अधिक महत्व हासिल कर लिया है। श्रम और रोजगार मंत्री संतोष गंगवार ने पहले दिन लोकसभा को सूचित किया कि उनके मंत्रालय के पास उन प्रवासियों के बारे में कोई आंकड़ा नहीं है, जिन्होंने लॉकडाउन के दौरान अपनी नौकरी या अपना जीवन गंवा दिया।
लॉकडाउन के बाद लाखों प्रवासी मजदूरों के सैंकड़ों मील दूर अपने गांव-घर पैदल लौटने के बाद पहली बार संसद का सत्र शुरू हुआ है। लेकिन सरकार के पास इस बारे में कोई जानकारी नहीं है कि उनका क्या हुआ या कैसे वे नौकरी गंवाने के बाद रह रहे हैं या शहर से लौटकर उनमें से कितने कोरोना संक्रमित हुए।
यही जानकारी है, जिसे सांसदों को अपने क्षेत्रों से उपलब्ध कराने के लिए कहा गया होता और प्रश्नकाल वह मंच है, जहां इसे स्वाभाविक रूप से देश को बताया जाता। इससे सरकार को बहुमूल्य जानकारी मिलती, ताकि भविष्य की योजनाओं की देखभाल के लिए सुधारात्मक उपाय किए जा सकें।
निस्संदेह संसद का सत्र भारी बाधाओं के बीच बुलाया गया है-सांसदों की कम संख्या, एक-दूसरे से अलग बैठना, पहले की तरह स्वतंत्र रूप से चर्चा कर पाने में अक्षमता। इसे बस खानापूर्ति कहा जा सकता है। लेकिन सांसदों का एक छोटा समूह भी सार्थक चर्चा सुनिश्चित कर सकता है- बशर्ते विपक्ष में सवाल उठाने की इच्छाशक्ति हो और सरकार में विपक्ष को सुनने की इच्छा हो। निस्संदेह यह एक बहुत बड़ी शर्त है।