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मोदी कैबिनेट: प्रतीकात्मक रूप से मजबूत मंत्रिमंडल

नीरजा चौधरी Published by: नीरजा चौधरी Updated Fri, 09 Jul 2021 05:10 AM IST
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पीएम मोदी के 15 नए कैबिनेट मंत्री - फोटो : अमर उजाला

बुधवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मंत्रिमंडल में जो फेरबदल और विस्तार हुआ है, उसे दो तरीके से देखना चाहिए। एक तो यह कि जिन लोगों का प्रदर्शन बहुत बुरा रहा, उन्हें बाहर का रास्ता दिखाया गया। दूसरा यह कि राज्य, जाति आदि के आधार पर नए लोगों को मंत्रिमंडल में शामिल किया गया है। कुछ मंत्रियों को बाहर निकालने के पीछे जनता को यह संदेश देना है कि मोदी सरकार में सही ढंग से काम न करने वालों के लिए जगह नहीं है। अगले वर्ष उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, गोवा, मणिपुर आदि में विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं। इनमें उत्तर प्रदेश का चुनाव सबसे महत्वपूर्ण है, इसलिए मंत्रिमंडल विस्तार में उत्तर प्रदेश को सबसे ज्यादा प्रतिनिधित्व मिला है। पर किसी ने अनुमान नहीं लगाया था कि बारह मंत्रियों को निकाल दिया जाएगा।



नरेंद्र मोदी की राजनीति के बारे में कहा जाता है कि वह आगे क्या करने जा रहे हैं, इसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता। राजनीतिक टिप्पणीकारों का मानना था कि अगर वह किसी मंत्री को बाहर निकालते हैं, तो यह संदेश जाएगा कि वह सरकार की गलतियां मान रहे हैं। चूंकि गलतियां हुईं और उसका असर इतना ज्यादा था कि उन्हें कुछ मंत्रियों को निकालना पड़ा। कोविड की दूसरी लहर में ऑक्सीजन की कमी से बहुत लोग मारे गए, लोगों का रोजगार खत्म हो गया, पिछले साल प्रवासी मजदूरों को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, उस पर से भाजपा पश्चिम बंगाल का चुनाव जीत नहीं पाई-इन सबसे सरकार रक्षात्मक मुद्रा में आ गई थी। यही नहीं, लोगों का गुस्सा मोदी के प्रति बढ़ रहा था और उनकी लोकप्रियता घटती जा रही थी। ऐसे में, कुछ न कुछ कदम उठाना ही था। 


इसलिए यह फेरबदल दोबारा अपनी छवि बहाल करने के लिए की गई राजनीतिक पहल है, जो सिर्फ मंत्रिमंडल तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि पार्टी संगठन और उत्तर प्रदेश सरकार में भी दिखेगी। इस कवायद में घंटों का श्रम लगा है, हर विभाग के लोगों और भाजपा के भीतर के लोगों से बात की गई है कि पार्टी को फिर से कैसे संगठित और मंत्रालय को कैसे पुनर्गठित किया जाए, राज्यपालों को कैसे बदला जाए, ताकि सरकार के नेतृत्व पर सवाल न उठे।


बारह मंत्रियों को एक साथ मंत्रिमंडल से निकालना इस बात का स्वीकार तो है कि जो होना चाहिए था, वह नहीं हुआ, पर गलतियों की जिम्मेदारी मंत्रियों के मत्थे मढ़ दी गई है। स्वास्थ्य मंत्री की जवाबदेही तो समझ में आती है। कोविड के कारण शिक्षा के क्षेत्र में भी बहुत भ्रम फैला। श्रम मंत्री को हटाया गया, क्योंकि पिछले साल बड़े पैमाने पर प्रवासी श्रमिक बहुत कष्ट सहकर पैदल अपने गांव लौटे, जिसे देश आसानी से नहीं भूलने वाला। पर रविशंकर प्रसाद और प्रकाश जावड़ेकर के इस्तीफे सबसे हैरान करने वाले हैं। ये दोनों पार्टी और सरकार का चेहरा बन गए थे और पार्टी की सारी नीतियों का बचाव करते थे। इनके इस्तीफे का कारण यही समझ में आ रहा है कि ये अपने विभागों से संबंधित मुद्दों को ठीक से नहीं संभाल पा रहे थे। सभी मंत्रालयों को निर्देश हालांकि पीएमओ से ही मिलते हैं, लेकिन लगता है कि रविशंकर प्रसाद नए आईटी कानून लाने, ट्विटर विवाद, विदेशी मीडिया द्वारा उसकी खुलकर आलोचना आदि को ठीक से नहीं संभाल पाए, जिसका खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ा है। संभवतः वह प्रधानमंत्री के आइडिया का सटीक क्रियान्वयन नहीं कर पाए। 


इस फेरबदल के बाद स्थिति यह है कि मंत्रिमंडल में अनुभवी लोगों की कमी पड़ गई है। युवाओं को मंत्रिमंडल में शामिल किया गया है, महिलाओं को प्रतिनिधित्व दिया गया है, क्षेत्रीय स्तर पर लोगों को प्रतिनिधित्व दिया गया है, पर वे अनुभवी नहीं हैं। सरकार चलाने के लिए अनुभवी और युवाओं की जरूरत है। इस फेरबदल में यह दिखाया गया है कि हम सभी राज्यों को साथ लेकर चल रहे हैं। जैसे, उत्तर प्रदेश के विभिन्न अंचलों-पूर्वी, पश्चिमी और बुंदेलखंड से लोगों को सोच-समझकर शामिल किया गया है। उत्तर प्रदेश से सात नए लोग लिए गए हैं और मंत्रिमंडल में उत्तर प्रदेश के बीस फीसदी मंत्री हैं। जातिगत आधार को भी ध्यान में रखा गया है। दलितों, महिलाओं, आदिवासियों-सबका ख्याल रखा गया है, पर खास जोर गैर-यादव अति पिछड़ी जातियों पर है, क्योंकि मोदी पहले प्रधानमंत्री हैं, जो ओबीसी हैं। अब तक के चुनावों में ओबीसी को लुभाने की कोशिश जरूर हुई, पर प्रधानमंत्री ओबीसी हैं, यह उतना खुलकर सामने नहीं आता था। लगता है कि आगे के चुनाव में भाजपा ओबीसी कार्ड खेलेगी, क्योंकि मंत्रिमंडल में आज एक तिहाई से ज्यादा लोग ओबीसी हैं।


एक और चीज जो सामने आ रही है, वह यह कि अटल-आडवाणी युग तो 2014 में ही खत्म हो गया था। उसके बाद जब मोदी आए, तो अगली पीढ़ी का युग चला, जिसमें अरुण जेटली, सुषमा स्वराज आदि थे, लेकिन वह युग भी बुधवार को खत्म हो गया। अब टीम मोदी का दौर है। हालांकि राजनाथ सिंह जैसे लोग हैं, पर मोदी ने अब अपनी नई टीम बनाई है और वह इसी के अनुसार सरकार चलाएंगे। वह चाहते हैं कि उनके मंत्री नीतियों के क्रियान्वयन में प्रभावी हों, पर उनमें से कोई अनुभवी और कद्दावर चेहरा नहीं है, जिससे प्रधानमंत्री को आगे समस्याएं आ सकती हैं। मंत्रिमंडल में नई टीम लाने का मतलब है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नजर 2022, 2023 और 2024 के चुनावों पर भी है। मोदी चाहते हैं कि सिर्फ पेशेवर राजनेता नहीं, टेक्नोक्रेट, सेवानिवृत्त नौकरशाह और विभिन्न पेशों के लोग भी राजनीति में आएं। 


यह फेरबदल प्रतीकात्मक रूप से तो बहुत मजबूत है, पर जमीनी स्तर पर इसका क्या असर पड़ेगा, यह देखने वाली बात होगी, क्योंकि जमीनी स्तर पर लोग मोदी को ही जानते हैं। अगर नए मंत्रियों को पीएमओ के निर्देश पर ही काम करना होगा, तो वे नए आइडिया पर काम कैसे कर सकते हैं? मोदी ने गलतियां सुधारी है, योग्य व्यक्तियों को जिम्मेदारी सौंपी है, और लगता है कि वह अब तक के काम करने के अपने तरीके की भी समीक्षा करेंगे, तभी वांछित सफलता मिल पाएगी। देखने वाली बात होगी कि इन मंत्रियों को अपने ढंग से काम करने की छूट मिलेगी या नहीं। जबकि जनता तो महंगाई कम होने और रोजगार मिलने पर ही सरकार के बारे में कोई राय बनाएगी।

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