गौरतलब है कि 1987 से राज्य की सत्ता पर बारी-बारी से दो ही पार्टियों-कांग्रेस और एमएनएफ का कब्जा रहा है। इन्हीं दोनों पार्टियों के बीच दस-दस साल के अंतराल पर सत्ता का बंटवारा हुआ है। इन दोनों पार्टियों के यथास्थितिवादी नजरिये से जनता ऊब गई थी। ऐसे में जब जेडपीएम ने यह नारा दिया कि 'बदलाव के लिए वोट करें, हमारी नई पार्टी को मौका दें', तो मतदाताओं को उम्मीद दिखी और उन्होंने जेडपीएम पर भरोसा करके मतदान किया।
जोरम पीपुल्स मूवमेंट का गठन वर्ष 2018 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले हुआ था। शुरुआत में जोरम पीपुल्स मूवमेंट छह क्षेत्रीय दलों का गठबंधन था, जिसमें मिजोरम पीपुल्स कॉन्फ्रेंस, जोरम नेशनलिस्ट पार्टी, जोरम एक्सोडस मूवमेंट, जोरम डिसेंट्रलाइजेशन फ्रंट, जोरम रिफॉर्मेशन फ्रंट और मिजोरम पीपुल्स पार्टी शामिल थीं। लेकिन 2019 में सबसे बड़ी संस्थापक पार्टी मिजोरम पीपुल्स कॉन्फ्रेंस गठबंधन से अलग हो गई और अब यह पांच छोटे-छोटे दलों का गठबंधन है।
वर्ष 2018 में जब जेडपीएम ने विधानसभा चुनाव में पहली बार अपने उम्मीदवार खड़े किए, तो पार्टी चुनाव आयोग में पंजीकृत भी नहीं थी, इसलिए पार्टी के सभी उम्मीदवार निर्दलीय के रूप में चुनाव में उतरे और पार्टी ने आठ सीटें जीतकर कांग्रेस से मुख्य विपक्षी पार्टी का दर्जा छीन लिया। जेडपीएम नेता लालदुहोमा पूर्व आईपीएस अधिकारी हैं, जो पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सुरक्षा व्यवस्था संभालते थे। उन्होंने वर्ष 1984 में मिजोरम से कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा चुनाव जीता था। बाद में राज्य के स्थानीय कांग्रेसी नेताओं से मतभेद हो गया और उन्हें अयोग्य घोषित कर दिया गया। 1988 में दल-बदल विरोधी कानून के तहत अयोग्य घोषित होने वाले वह पहले लोकसभा सांसद बने। वर्ष 2018 में उन्होंने आइजोल पश्चिम-1 और सेरछिप से निर्दलीय के रूप चुनाव जीता।
हालांकि जोरमथंगा को चुनाव में हराना आसान नहीं था, क्योंकि जोरमथंगा ने खुद को जो-कूकी (स्थानीय जनजाति) लोगों के नेता के रूप में पेश करने की कोशिश की। जो जनजाति पड़ोसी राज्य मणिपुर और म्यांमार के जो समुदाय के साथ संबंध साझा करती हैं। खुद को जो लोगों का हितैषी साबित करने के लिए जोरमथंगा ने म्यांमार के शरणार्थियों का बायोमैट्रिक डेटा एकत्र करने के केंद्र के निर्देश का पालन करने से भी मना कर दिया। यही नहीं, उन्होंने मणिपुर में संघर्षरत जो-कुकी लोगों के हितों की वकालत की थी। अपने चुनाव प्रचार में एमएनएफ जातीय राष्ट्रवाद पर निर्भर रहा, जबकि जेडपीएम ने संरचनात्मक परिवर्तन के साथ भ्रष्टाचार मुक्त शासन, राज्य की आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ बनाने और युवाओं के लिए रोजगार का वादा किया।
चुनाव के नतीजे बताते हैं कि ज्यादातर मतदाताओं ने जातीय राष्ट्रवाद के बजाय संरचनात्मक परिवर्तन के साथ भ्रष्टाचार मुक्त शासन के जेडपीएम के वादे पर भरोसा किया। जेडपीएम के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार लालदुहोमा ने चुनाव के दौरान मीडिया को बताया था कि उनकी पार्टी प्रशासनिक, आर्थिक और भूमि सुधारों के जरिये संरचनात्मक परिवर्तन लाएगी। उन्होंने राज्य के कृषि उत्पाद अदरक, हल्दी, मिर्च एवं अन्य के लिए न्यूनतम समर्थन मू्ल्य घोषित करने का वादा किया। चुनाव के दौरान पार्टी के नेताओं ने भ्रष्टाचार को प्रमुख मुद्दा बनाया और कहा कि इसी वजह से राज्य को आर्थिक संकटों का सामना करना पड़ता है।
उन्होंने कहा कि इसी कारण पिछले पांच वर्षों में सरकारी अधिकारियों को वेतन एवं सेवानिवृत्ति लाभ मिलने में देरी हुई है। पार्टी ने जब अपने उम्मीदवारों के नामों की घोषणा की, तो उनमें से आधे से अधिक 50 वर्ष से कम उम्र के थे। इससे भी लोगों को पार्टी के बदलाव के वादे पर भरोसा हुआ। जेडपीएम ने सफलतापूर्वक राज्य के मतदाताओं के बीच खुद को बदलाव के वाहक के रूप में पेश किया, क्योंकि मिजोरम के सिविल सोसाइटी के अनेक लोकप्रिय लोगों ने पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ा। इससे पार्टी को आम लोगों में पैठ बढ़ाने में मदद मिली।
अब चूंकि जेडपीएम अपने बूते राज्य की सत्ता में आ गई है, तो अपने आंदोलन के आदर्शों पर टिके रहने में उसे आसानी होगी, लेकिन राज्य में दो सीटें जीतने वाली भाजपा चाहेगी कि जेडपीएम उसके गठबंधन एनडीए में शामिल हो जाए। उम्मीद करनी चाहिए कि जेडपीएम भ्रष्टाचार मुक्त एवं स्वतंत्र शासन के अपने वादे और केंद्र सरकार के साथ बेहतर रिश्ते के बीच संतुलन बनाकर राज्य की जनता की अपेक्षाओं पर खरा उतरेगी। छोटे राज्यों, खासकर पूर्वोत्तर के राज्यों को अपने विकास के लिए केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी के साथ बेहतर रिश्ते बनाकर रखने की मजबूरी होती है, क्योंकि केंद्र से बेहतर रिश्ते नहीं होने पर वित्तीय संसाधन और अनुदान मिलने में मुश्किल हो सकती है।
मिजोरम उन राज्यों में है, जिन्हें केंद्र से सबसे अधिक राजस्व मिलता है। जेडपीएम ने चुनाव अभियान के दौरान जनता से जो वादे किए हैं, उन्हें राज्य की बदहाल वित्तीय स्थिति के चलते पूरा करना आसान नहीं होगा, इसलिए नई सरकार के सामने चुनौतियां कम नहीं होंगी। मिजोरम में बेरोजगारी की दर राष्ट्रीय औसत से अधिक है। युवाओं में नशे की लत एक बड़ी समस्या है। इसके अलावा राज्य के सीमावर्ती इलाकों में जातीय मुद्दे लगातार चुनौती पैदा कर रहे हैं। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि जेडपीएन किस तरह से संरचनात्मक बदलाव लाने के अपने वादे को पूरा करती है।