दिन- 27 अप्रैल, 2011। गांव मेंढा, तहसील धानोरा, जिला गढ़चिरौली के बाहर का मैदान। समय दोपहर साढ़े बारह। चिलचिलाती धूप। तपी हुई जमीन। सभा चल रही है। मंच पर नेताओं और अफसरों का हुजूम। दिल्ली से केंद्रीय वन मंत्री भी आए हैं। साथ में योजना आयोग के सचिव भी।
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री के साथ वन मंत्री और आदिवासी विकास मंत्री भी मौजूद। क्यों इकट्ठा हुए ये सब? दिल्ली और मुंबई की सरकारें मेंढा-लेखा गांव में आईं, मेंढा की ग्रामसभा को उनके जंगल में पैदा होने वाले बांस की बिक्री का अधिकार सुपुर्द करने के लिए। इसके दो वर्ष पहले ही वन अधिकार कानून, 2006 ने मेंढा को उसके 1,800 हेक्टेयर वन जमीन पर स्वामित्व-अधिकार दिया था।
राज्यपाल ने खुद आकर उस अधिकार का कागज गांव को सौंपा था। पर हाथ में कागज आया था, अधिकार नहीं। जंगल से कोई भी चीज बाहर लानी हो, तो वन विभाग का अनुमतिपत्र जरूरी होता है, और विभाग यह अनुमतिपत्र नहीं दे रहा था। वह हठ पकड़े था, कि लोग बांस अपने उपयोग के लिए भले काटें, बेच नहीं सकते। दो साल से मेंढा के लोग इसके खिलाफ लड़ रहे थे।
उनकी लड़ाई सफल हुई। केंद्रीय वन मंत्री खुद उन्हें अनुमतिपत्र देने आए। वहां मौजूद तीन-चार हजार लोगों में आधी महिलाएं थीं। बड़े अतिथियों के अलावा सिर्फ देवाजी तोफा बोलते हैं। शुरुआत गोंडी में करते हैं। कहते हैं, 'दिल्ली-मुंबई में हमारी सरकार, हमारे गांव में हम ही सरकार।'
फिर कहते हैं, 'दिल्ली की सरकार आज गल्ली की सरकार से मिलने आई है। जैसी दिल्ली में एक सरकार है, वैसी गली में भी यानी गांव में भी एक सरकार है। दोनों को मिलकर काम करना चाहिए।' फिर खास कीर्तनकार की शैली में कहते हैं, 'बटन दबाकर शुरू होती है वह कार, और जिसे धक्का देकर सरकाना पड़ता है, वह सरकार।'
देवाजी का भाषण इतना प्रभावी रहा कि अन्य वक्ता उनका संदर्भ देते चलते हैं। महाराष्ट्र के गृह मंत्री, जो गढ़चिरौली के पालक मंत्री भी हैं, स्वीकार करते हैं कि जिले का प्रशासन तंत्र अपर्याप्त है। 40 फीसदी स्थान रिक्त पड़े हैं।
माओवादी विकास कार्य होने नहीं देते। उनके भाषण में माओवादियों का दबाव महसूस होता है। बाद में केंद्रीय वन मंत्री बोलते हैं, वर्ष 1927 का वन कानून ब्रिटिश शासकों ने बनाया था। उसने लोगों के अधिकार छीने थे। हम उन्हें वे अधिकार सौंप रहे हैं। वे स्वीकार करते हैं कि नौकरशाही के भरोसे वनों की रक्षा नहीं की जा सकती, लोगों को वन पर अधिकार सौंपना ही पड़ेगा।
यह दिन यकायक नहीं आया। इसके लिए लंबा संघर्ष करना पड़ा। एक दो नहीं, पूरे 25 वर्ष। कैसे शुरू हुआ यह सब?
वर्ष 1984 में चंद्रपुर-गढ़चिरौली में 'जंगल बचाव, मानव बचाव' आंदोलन शुरू हुआ। आंध्र प्रदेश में गोदावरी नदी पर इंचमपल्ली में तथा पास के बस्तर जिले में इंद्रावती नदी पर बांध बनाने की योजना थी। गढ़चिरौली जिले का काफी जंगल और आदिवासी क्षेत्र डूबने वाला था। इस क्षेत्र के आदिवासी गांवों में इन योजनाओं के खिलाफ आंदोलन खड़ा होना स्वाभाविक था। इस आंदोलन को लालश्याम शाह महाराज का नेतृत्व मिला।
लालश्याम शाह अनोखे नेता थे। वह गोंड जमींदार थे। पुराने मध्य प्रांत में गोंड समुदाय की 84 जमींदारियां थीं। ब्रिटिश राज में भू-राजस्व वसूलकर उसे सरकारी कोष में जमा कराना इन जमींदारों की जिम्मेदारी थी। लालश्याम शाह की जमींदारी थी, राजनांदगांव जिले के पानाबरस गांव में। जमींदार होने के बावजूद उनका रहन-सहन आम किसान जैसा था। वह गांव-गांव घूमते। किसी के घर नहीं, बल्कि पेड़ के नीचे ठहरते। उनका आंदोलन इतना जबर्दस्त रहा कि सरकार को झुकना पड़ा और बांध खारिज करने पड़े।
इस आंदोलन से जुड़े चंद्रपुर के एक युवा कार्यकर्ता थे, मोहन हीराबाई हीरालाल। वे जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में काम करने वाली छात्र-युवा संघर्ष वाहिनी में शामिल थे। ‘जंगल बचाव मानव बचाव’ आंदोलन के दौरान एक पदयात्रा में उनका देवाजी से परिचय हुआ था। देवाजी ने उन्हें बताया, हां, हमारा गांव ऐसा है, हम सर्वसहमति से निर्णय लेते हैं। गांव का नाम था, मेंढा लेखा।
गढ़चिरौली से राजनांदगांव की तरफ जो रास्ता जाता है, उस पर गढ़चिरौली से 30 किलोमीटर दूरी पर मेंढा गांव रास्ते से सटा हुआ है। आगे तीन किलोमीटर दूरी पर तहसील का गांव धानोरा है। सवा सौ-डेढ़ सौ वर्षों से आबाद इस गांव के लोग माडिया गोंड कहलाते हैं, यानी पहाड़ पर रहने वाले गोंड। देवाजी बताते हैं कि उनके पुरखे अबूझमाड़ में रहते थे, जो महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ की सीमा पर है।
मेंढा गांव की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है, उसका 1,800 हेक्टेयर का बड़ा जंगल, जिसे उसने प्रयत्न से संभाला है। इस गांव ने जैव विविधता कानून, 2002 के तहत अपना जैव विविधता रजिस्टर बनाया है, जिसमें दर्ज हैं, बांस, सागौन, महुआ, तेंदू, आंवला, हरड़ा, बेहड़ा, अर्जुन, ऐन, धावड़ा, खैर, चिरौंजी, और क्या क्या गिनाएं? स्वाभाविकतः जंगल उपजीविका का प्रमुख साधन बन गया है। वनोपज में बांस मुख्य है ही।
सरकार ने मेंढा के जंगल का बांस बल्लारपुर पेपर मिल को लीज पर दिया हुआ था। वर्ष 1991 से 2001 के दरम्यान मिल को बांस बेचा गया था, 400 रुपये प्रति टन की दर से। बांस की औसत कीमत हुई रुपये-सवा रुपये। जबकि तब बाजार में कीमत दस से बारह रुपये थी।
नवंबर, 1990 में मेंढा के लोगों को पता चला कि मिल के लोगों ने किसी और रास्ते से चुपचाप आकर उनके जंगल के बांस के पुंजों पर निशान किए हैं। यह कटाई की पूर्व तैयारी थी। इसे देखकर गांव वाले सतर्क हुए। ग्रामसभा बुलाई गई और तय किया गया कि मिल को इस साल बांस काटने नहीं देना है। बांस का महत्व केवल किसान ही नहीं, सभी लोगों के जीवन में है। बांस से टोकरियां, अनाज रखने के लिए कोठार, सूप जैसी अनेक उपयोगी वस्तुएं बनती हैं।
इस विरोध के बीच ही मेंढा अपने सामाजिक राजनीतिक संगठन की- हमारे गांव में हम ही सरकार, की प्रक्रिया भी आगे बढ़ा रहा था। किसी व्यवस्था को जब हम सरकार कहते हैं, तब उसका स्वरूप कैसा रहता है? सरकार व्यवस्था में मुख्यतः तीन प्रक्रियाएं होती हैं। पहली, निर्णय प्रक्रिया, दूसरी नियम और कानून की रचना और तीसरी निर्णयों को अमल में लाने वाली रचना। 'हमारे गांव में हम ही सरकार' की घोषणा से जो प्रक्रियाएं निकलीं, उनमें से एक के कारण ही मेंढा गांव को 2006 के वन अधिकार कानून द्वारा जंगल पर अधिकार मिल पाया।