साधो, मेरी आखिरी इच्छा पूरी हो गई। मैं हाफिज सईद से मिल आया। जिनके दर्शन के लिए बड़े-बड़े तरसते हैं, मैं उनके सामने कुर्सी पर बाइज्जत बैठा हुआ था। जब मैं उनके ठिकाने पर पहुंचा, तो वह मेरी कार का दरवाजा खोलने आगे बढ़े। इससे मुझे गर्व की अनुभूति हुई। होती भी क्यों न! जिनके इशारे पर हजारों लोग अपनी जान न्योछावर कर देते हों, वह मुझ जैसे फटीचर की कार का दरवाजा खोल रहे थे!
सईद और मैंने झुककर एक दूसरे को सलाम किया। थोड़ी देर पहले तक मेरे दिल में धुकुर-पुकुर मची थी। मन टूटी हुई एके. सैंतालिस जैसा हो रहा था। कहीं मैं मौके पर धोखा न खा जाऊं। आखिर मैं उसी मुल्क से तो हूं, जिसे खलास करने का ठेका उनके पास है। कुर्सी पर बैठने के बाद मैं उनका चेहरा देख रहा था। जिनके गुर्गे तक नकाब ओढ़े रहते हैं, वह खुद मेरे बगल में प्लास्टिक की कुर्सी पर बैठे थे।
उनके चेहरे पर शांति थी। सुकून से भरा चेहरा। लग रहा था, जैसे अभी-अभी गुसल करके निकले हों। देखकर लगता ही नहीं कि वह आतंकवादियों के सरगना हैं। उनकी उंगलियां कितनी कोमल हैं। इन्हें ऊपर वाले ने हथियार चलाने के लिए नहीं बनाया है। तभी उनके आदमी मेरे लिए चाय लेकर आए। खून-खराबा करने वाले आदमी भी बिल्कुल हमारे ही जैसे लग रहे थे।
मैं तो उनसे यह पूछने गया था कि वह भारत में खून-खराबे का खेल बंद क्यों नहीं कर देते। उन्होंने बेहद शांत मुद्रा में जवाब दिया कि वह हिंसा में यकीन नहीं करते। हालांकि उन्होंने यह नहीं कहा कि वह अहिंसा के सिद्धांत में विश्वास करते हैं या नहीं। मैं उनसे उनके दोस्त दाऊद इब्राहिम के बारे में पूछना चाहता था। पर यह सोचकर रुक गया कि कहीं वह उन्हें भी अपनी तरह शांति का पुजारी बता देंगे, तो मेरे दिल को ठेस लगेगी।
आखिर में उठते हुए मैंने उन्हें भारत आने का निमंत्रण दिया। वह खुद भी भारत आने की इच्छा रखते थे। लेकिन विदा होते-होते मैं उनसे यह नहीं पूछ पाया कि भारत में आने के लिए वह कौन-सा रास्ता चुनेंगे।