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बगदादी से मुलाकात

Thu, 24 Jul 2014 08:53 PM IST
अशोक मिश्र
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उस्ताद गुनहगार घबराए हुए से मेरे घर में घुसे और मेरे प्रणाम को नजरंदाज करते हुए बोले, यह बताओ, सीआईए वाले जब किसी को पकड़ते हैं, तो क्या बहुत मारते हैं? पहले टॉर्चर करते हैं, उसके बाद गोली मारते हैं या फिर सीधे गोली मार देते हैं? मारने से पहले कुछ खिलाते-पिलाते हैं या खाली पेट ही इस दुनिया-ए-फानी से विदा कर देते हैं?
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मैंने कहा, उस्ताद! सीआईए वाले मारते कम और घसीटते ज्यादा हैं। वैसे बात क्या है? दुआ न सलाम, आते ही बंदूक तान दी।

उस्ताद गुनहगार ने इधर-उधर देखते हुए कहा, क्या बताएं, मेरी मति ही मारी गई थी, जो दुनिया के मोस्ट वांटेड अबू बकर अल बगदादी से यों ही टहलते हुए मुलाकात करने जा पहुंचा। खुदा झूठ न बुलवाए, उसने खातिरदारी भी बहुत की। उसके एक चेले ने तो बड़े अदब से हम दोनों की एक तस्वीर भी खींची। लेकिन जब से मालूम हुआ है कि उसे अमेरिका वाले खोज रहे हैं, तब से मुझे दस्त आ रहे हैं। कई तरह की आशंकाएं घेरे हुए हैं। मेरी पत्नी तो अपनी सहेलियों और मोहल्ले की औरतों को भी मुलाकात गाथा सुना आई हैं। अब समझ में नहीं आ रहा है कि क्या करूं? जब सीआईए पूरी दुनिया में बगदादी को खोजते घूम रहे हैं, तो फिर वे मुझे भी खोज सकते हैं।

उस्ताद की बात सुनते ही मेरे दिमाग का एंटीना खड़ा हो गया। मैंने तुरंत कहा, उस्ताद! आप भी न, बैठे-बिठाए मधुमक्खी के छत्ते में हाथ डाल देते हैं। आपको क्या पड़ी थी बगदादी से मिलने की? अब जो किया है, भुगतिए। मैं आपको कोई सलाह नहीं दे सकता, बल्कि आपसे अपना रिश्ता अभी से खत्म करने की घोषणा करता हूं। मुझे अपने बाल-बच्चों को अनाथ नहीं करना है।
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इतना कहकर मैं बाहर आया और मोहल्ले वालों को सुनाकर उन्हें जोर से कहने लगा, मैं आपको जब जानता नहीं, पहचानता नहीं, तो आप क्यों खामख्वाह बेटा-बेटा कहकर घर में घुसे आ रहे हैं?
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मेरे इतना कहने पर उस्ताद पहले तो अकबकाए, फिर लड़खड़ाते कदमों से अपने घर की ओर चले गए।
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