भाजपा ने चुनाव अभियान के दौरान महंगाई पर रोक लगाने के वायदे के साथ महिलाओं से यह भी कहा था कि वह उनकी सुरक्षा के साथ किसी प्रकार का समझौता नहीं करेगी। दो महीने का समय तो बहुत कम है, पर चूंकि सरकार बनाने के बाद इस दौरान उसने पहला बजट भी पेश कर दिया है, इसलिए महिलाओं को उनकी दिशा के बारे में विचार करने के लिए बहुत कुछ मिल गया है।
हाल ही में घटी कई घटनाओं में, जिनमें उत्तर प्रदेश के बदायूं में दो बहनों को मारकर पेड़ पर लटका दिए जाने की घटना सर्वाधिक दिल दहलाने वाली थी, यह पाया गया है कि उत्तर भारत के ग्रामीण इलाकों में गरीब घर की लड़कियों और महिलाओं पर सबसे ज्यादा हमले तब होते हैं, जब वे रात के अंधेरे में शौच के लिए घर से निकलती हैं। घरों के अंदर शौचालय का होना, न होना महिलाओं और लड़कियों की सुरक्षा, सेहत और सम्मान से जुड़ा हुआ बहुत अहम मामला है। लेकिन सरकारें इसके प्रति पहले भी उदासीन थीं और आज भी उदासीन हैं। देश भर के केवल 30 फीसदी लोग शौचालय का प्रयोग करते हैं। बाकी 70 फीसदी लोग खुले में शौच करने को मजबूर हैं।
शौचालय उपलब्ध कराने के लिए केंद्र सरकार की निर्मल भारत अभियान प्रमुख है। इस साल उस पर होनेवाला खर्च 5,000 करोड़ रुपये से कम है। नए वित्त मंत्री अरुण जेटली ने पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम के पदचिह्नों पर चलने का काम किया है। पिछले 10 वर्षों से इस मद में इतना ही खर्च किया गया है। पानी की उपलब्धता का मुद्दा भी महिला सुरक्षा से जुड़ा है। सरकार का कहना है कि अब पीने लायक पानी 92 फीसदी जनता की पहुंच में है। लेकिन पहुंच में होने और पानी पीने लायक होने की परिभाषा पाठकों की कल्पनाशक्ति पर छोड़ दी गई है। सरकार के अपने विभाग बताते हैं कि पानी के स्रोत प्रदूषणयुक्त हो गए हैं और अक्सर पानी के पाइप सीवर लाइन में विलीन होने लगे हैं। सरकार की ही एक रिपोर्ट बताती है कि राजस्थान की ग्रामीण महिलाओं को पानी की खोज में हर साल औसतन 24,000 किलोमीटर चलना पड़ता है। इन महिलाओं का जोखिम शौच के लिए निकलने वाली महिलाओं से कम नहीं है। पर पेयजल उपलब्ध कराने के मद में बजट में एक पैसे की बढ़ोतरी नहीं की गई है।
कुछ दिन पहले लखनऊ के पास एक गांव में स्कूल में एक विधवा महिला के साथ बर्बर हिंसा की घटना घटी थी। उसे पहले पीटा गया, फिर मरने के लिए छोड़ दिया गया। उसका पति शहर के सबसे आला दर्जे के सरकारी अस्पताल में ठेके पर काम करता था। उसकी मौत के बाद महिला को विरासत में उसकी 5,000 महीने की ठेकेदारी की नौकरी मिली थी। अगर उसकी नौकरी पक्की होती, तो वह जिंदा होती और अपने दोनों बच्चों के साथ सम्मानजनक जीवन बिता रही होती। पर सरकार ने तो पक्की नौकरियां खत्म करने की जैसे कसम खा रखी है। खासकर महिलाओं को कम पैसे देकर अधिक काम लेने का फैसला जारी है।
सरकारें कहती हैं, पेयजल, शौचालय और रोजगार के लिए पैसा कहां से आएगा? कोई उनसे पूछे कि बड़े घरानों को लाखों-करोड़ों की छूट देने के लिए पैसा कहां से आता है? या फिर उनसे यही पूछे कि अगर पैसा नहीं था, तो फिर वायदा क्यों किया था!