अखिल की कहानी में मुझे अपनी कहानी दिखी और मैं चिंतित हुआ कि चालीस साल पहले मैं जहां खड़ा था, अफसोस कि आज अखिल के रूप में मेरा प्रतिरूप वहीं खड़ा है। उनकी तो अभी शिक्षा भी आगे नहीं बढ़ पाई, तो शोहरत और सम्मान क्या उन्हें जीविका के साधन मुहैया करा पाएंगे?
बेबी हालदार ने कभी कहा था, लेखक बनकर नाम तो हुआ, पर काम मिलना बंद हो गया। साहित्य अकादेमी पुरस्कारों की वापसी से प्रेरित हो पिछले दिनों कई अन्य क्षेत्रों में सम्मान वापसी की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने का विचार चल रहा था। सुझाव आ रहा था कि पुरस्कार लेने वाले यह लिखकर दें कि वे सम्मान वापस नहीं करेंगे। सवाल उठता है अखिल जैसे जो लोग सच में सम्मान कमाते हैं, क्या वे किसी भी लहर में सम्मान लौटाते हैं। क्या किसी दलित आदिवासी से शपथपत्र लेने की कभी जरूरत पड़ी है?
अजीब यह हुआ कि कुलीनता और अभिजात प्रवृत्ति से आच्छादित साहित्य संसार मानव-संवेदना की कोई बड़ी मिसाल कायम नहीं कर पाया। भले ही उसने सारे सम्मान कब्जाए हों और फिर पुरस्कार वापसी के झंडे उठाए हों। जबकि उपेक्षितों की ओर से कालजयी कृतियों के सृजन सामने आए। डॉ. आंबेडकर ने कहा था, 'जब रामायण लिखनी थी, तो वाल्मीकि को लाया गया, जो निचले पायदान से थे। जब महाभारत लिखा जाना था, तो वेदव्यास को याद किया गया, जो मत्स्यगंधा सत्यवती की कोख से जन्मे थे। और जब संविधान निर्माण करने की जरूरत पड़ी, तो मुझ जैसे अस्पृश्य को यह काम सौंपा गया।' भाषा के आधार पर अकादेमी सम्मान पूरी तरह लोकतांत्रिक नहीं लगते, क्योंकि 60 करोड़ की हिंदी को एक सम्मान मिलता है और सात करोड़ की भाषा को भी एक। यहां आनुपातिक प्रतिनिधित्व नहीं हो पा रहा।
हाल ही में उत्तर-प्रदेश सरकार ने ‘भागीदारी साहित्य उत्सव‘ आयोजित किया तथा केंद्रीय साहित्य अकादेमी ने एशिया का सबसे बड़ा तीन से छह अगस्त तक भोपाल में ‘अंतरराष्ट्रीय साहित्य उन्मेष‘ संपन्न किया। इसके उद्घाटन उद्बोधन में महामहिम राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू ने कहा था, 'साहित्यकारों का सत्य इतिहासकारों के तथ्य से अधिक प्रामाणिक और विश्वसनीय होता है। साहित्य के आदान-प्रदान से ही दुनिया में बेहतर समझ का निर्माण होता है। साहित्य ने हमेशा मानवता को बचाने का काम किया है।'
राष्ट्रपति के वक्तव्य ने प्रेमचंद के कथन की याद दिला दी, जो कहते थे कि 'इतिहास में तिथियों के अलावा सब झूठ होता है, और साहित्य में तिथियों के अलावा सब कुछ सत्य।' पर समाज का सत्य उतना ही नहीं होता, जितना साहित्य रूपी दर्पण के सामने होता है। उसके पीछे, दाएं-बाएं भी बहुत कुछ होता है।
हिंदी साहित्य के संसार में सम्मान और पुरस्कार किस तरह दिए जाते रहे हैं, इस बारे में नई धारा के संपादकश्री ने इन पंक्तियों के लेखक को एक वाकया बताया। एक नामी आलोचक बिहार सरकार की सम्मान समिति के अध्यक्ष थे। उन्होंने सर्वोच्च ‘शिखर सम्मान‘ के लिए जब चयन किया, तब एक सदस्य ने कहा, 'यह तो आपके भाई हैं।' उस पर उन्होंने कहा, 'जब मेरा भाई ही सबसे बड़ा लेखक है, तो मैं क्या कर सकता हूं? मैं भाई को नहीं, लेखक को चुन रहा हूं।' सरकार की ओर से जो आयुक्त थे, उन्होंने नियम-कायदों की बात की और एक घोषणापत्र पर सभी से हस्ताक्षर मांगे कि 'सम्मान के लिए विचार किए गए व चुने गए प्रतिभागियों में मेरा कोई सगा-संबंधी नहीं है।'
अध्यक्ष महोदय हस्ताक्षर किए बगैर समय से पहले ही हवाई अड्डे पर पहुंच गए। मीडिया में खबर बनी कि 'अध्यक्ष ने अपने भाई को सर्वोच्च सम्मान के लिए चुना।‘ फिर भी सरकार ने उस वर्ष का सम्मान रद्द करने के बजाय सार्वजनिक समारोह रद्द किया और सरकारी कार्यालय में बुलाकर लेखकों को घोषित धनराशि के चेक पकड़ा दिए।
आगे चलकर उन्हीं पुरस्कृत साहित्यकार को साहित्य अकादेमी भी दिया गया और वह व्यक्ति पुरस्कार वापसी अभियान में शामिल हुए। जिन्हें आसानी से और गैर साहित्यिक कारणों से पुरस्कार मिलते हैं, उन्हें पुरस्कार वापसी में दर्द नहीं होता। साहित्य अकादेमी के संस्थापक जवाहरलाल नेहरू थे। वह वाम रुझानों के व्यक्ति थे। लेकिन उन्होंने पुरस्कार की व्यवस्था में पिछड़े लोगों को शामिल करने का कोई प्रयास नहीं किया। इसलिए नेहरू और इंदिरा गांधी के समय में दलितों को सम्मान नहीं मिला।
कांग्रेस के राज में पुरस्कारों पर सवर्ण वामपंथियों का कब्जा हुआ करता था और उस व्यवस्था में सुधार संभव नहीं था। परंतु अब हाशिये के लोगों को सम्मान मिलता है। समावेशी दृष्टि ने पहले के मूल्यांकनों को गलत साबित कर दिया है। इसलिए हाशिये के समाज का साहित्य अब वाम दौर की भांति साहित्य के दबंग राजा-बाबू साहब की ठसक के नीचे दम नहीं तोड़ेगा।