रबी लास एलामोज में क्यों नहीं थे? वह विश्वयुद्ध से जुड़ी एक दूसरी गोपनीय और महत्वपूर्ण वैज्ञानिक परियोजना का हिस्सा थे। वह दरअसल एमआईटी की रेडिएशन लेबोरेटरी में एडवांस्ड रडार पर काम कर रहे थे। उस युद्ध में मैनहटन प्रोजेक्ट की तुलना में रेडिएशन लेबोरेटरी का प्रभाव कहीं ज्यादा था, क्योंकि उसने ब्रिटेन में विकसित माइक्रोवेब टेक्नोलॉजी को एक ऐसे रडार सिस्टम में बदला, जिसे जर्मन पनडुब्बियां भी ताड़ नहीं पाई। वर्ष 1943 में अटलांटिक के युद्ध में मित्र राष्ट्रों की विजय में इसकी बड़ी भूमिका थी। उस दौरान और भी कई महत्वपूर्ण वैज्ञानिक खोजें हुईं। जैसे कि जॉन हॉपकिन्स ग्रुप ने प्रॉक्सिमिटी फ्यूज की खोज की, जिससे एंटी एयरक्राफ्ट गन ज्यादा प्रभावी साबित हुए, जो सीधा निशाना बनाए बगैर भी युद्धक विमानों को गिरा सकते थे।
तब यह सब कुछ सिर्फ अमेरिका की आर्थिक ताकत के कारण नहीं, बल्कि अमेरिका के सांस्कृतिक और सामाजिक खुलेपन के कारण भी संभव हो पाया था। फिल्म में एक जगह ओपेनहाइमर कहते हैं कि बम के मामले में हम जर्मनों को उनकी यहूदी-विरोधी सोच के कारण ही मात दे पाए। शरणार्थियों की वैज्ञानिक प्रतिभा ने ही जर्मनी के खिलाफ अमेरिका को इतना ताकतवर बनाया।
अगर आप इतिहास के प्रेमी हैं, तो ये चीजें आपको आकर्षित करेंगी। पर ये चीजें आज की अमेरिकी राजनीति और यूक्रेन युद्ध के लिए भी उतनी ही प्रासंगिक हैं। अनेक दक्षिणपंथी अमेरिकी राष्ट्रीय गौरव को सैन्य ताकत से जोड़ते हैं और मानते हैं कि सैन्य शक्ति देहभाषा से आती है। रिपब्लिकन सीनेटर टेड क्रुज की कुख्यात टिप्पणी से भी इस सोच को बल मिला था, जिसमें उन्होंने रूसी सेना की आक्रामकता का जिक्र करते हुए अमेरिका सेना को उससे कमतर बताने की कोशिश की थी। वह यह तक कह गए थे कि कमजोर सेना के कारण ही अमेरिका आज कमजोर है। हैरानी की बात यह है कि यूक्रेन युद्ध में रूसी सेना की कमजोरी सार्वजनिक हो चुकने के बावजूद उसकी कथित आक्रामकता का जिक्र किया जाता है।
युद्ध सिर्फ सैन्य शक्ति से नहीं जीते जाते। बल्कि मोर्चे पर लड़ने की क्षमता के अलावा युद्ध उत्पादन क्षमता और बौद्धिक सर्जना शक्ति के आधार पर जीते जाते हैं। मैंने द्वितीय विश्वयुद्ध से संबंधित अनेक किताबें पढ़ी हैं। लेकिन जिस किताब ने मुझे सबसे अधिक प्रभावित किया, वह सैन्य इतिहासकार फिलिप्स पीओ ब्रायन की पुस्तक है, हाउ द वॉर वाज वोन, जिसकी शुरुआत ही इस यादगार पंक्ति से होती है, 'द्वितीय विश्वयुद्ध में कोई भी युद्ध निर्णायक नहीं था।' द्वितीय विश्वयुद्ध में मित्र राष्ट्रों ने पहले समुद्र, और फिर आकाश में अपना वर्चस्व जिस तरह साबित किया, उसी से युद्ध का नतीजा तय हो गया था।
मित्र राष्ट्रों की उस सफलता के पीछे रबी और एलेन ट्युरिंग जैसे बौद्धिकों का योगदान सर्वाधिक था। रबी किसी भी दृष्टि से सैनिक नहीं थे। ऐसे ही ट्युरिंग ब्लेस्ली ने धुरी राष्ट्रों के गोपनीय कोड तोड़ने का जो काम किया, उससे मित्र राष्ट्रों की जीत आसान हो गई। ओ ब्रायन उन कुछ प्रसिद्ध सैन्य विश्लेषकों में से हैं, जो शुरू से यह मानने से इन्कार करते रहे हैं कि यूक्रेन के खिलाफ रूस आसानी से युद्ध जीत जाएगा। बल्कि उनका मानना है कि यूक्रेन के जवाबी हमले ही आखिरकार निर्णायक साबित होंगे। इस क्षेत्र में मेरा ज्ञान इतना नहीं है कि उनके निष्कर्ष पर टीका-टिप्पणी कर सकूं। लेकिन मैं यह जरूर समझ सकता हूं कि उन्होंने जो यह निष्कर्ष दिया है, उसके कारण क्या हैं।
दरअसल यूक्रेन ने बिल्कुल शुरू में ही समझ लिया था कि रूस पर ताबड़तोड़ जवाबी हमले से वह युद्ध जीत नहीं पाएगा। इसलिए उसने द्वितीय विश्वयुद्ध में मित्र राष्ट्रों की रणनीति अपनाई। उसने पैदल रूसी सैनिकों पर छोटे स्तर के हमले शुरू किए। रूस ने उन हमलों का जवाब देना शुरू किया, लेकिन यूक्रेन को पश्चिमी देशों से मिले उन्नत तकनीकों से युक्त हथियारों के मुकाबले रूसी तोप और हथियार कमतर साबित हुए। अगर यह रणनीति कारगर होती है, तो यूक्रेन को सफलता मिलेगी। आशावादियों का कहना भी है कि युद्ध के मोर्चे पर रूस हर तरह से कमजोर साबित हो रहे हैं। हालांकि मेरा मानना है कि जमीनी स्तर पर यूक्रेन को अभी तक मामूली लाभ ही मिला है।
द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान अटलांटिक के युद्ध में मित्र राष्ट्रों के पक्ष में चीजें एकाएक बदलने लगी थीं। क्या यूक्रेन युद्ध में भी ऐसा होगा? मैं नहीं जानता। लेकिन जो बात हम सब जानते हैं, वह यह है कि आधुनिक युद्ध सैन्य आक्रामकता के बजाय दिमाग और विचारों के खुलेपन से जीते जाते हैं।