लेकिन व्यवहार में हो सब इसके विपरीत रहा है। यह प्रदेश देश के सर्वाधिक विद्रोही-उग्रवादी संगठनों से ग्रस्त है। राज्य में हाल में मुख्य विवाद मणिपुरी ईसाई जनजातियों के प्रभावी कुकी संगठनों द्वारा हिंदू मैतेई समुदाय को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने की कोशिशों के विरुद्ध प्रारंभ किया गया, क्योंकि अभी तक 42 प्रतिशत ईसाई जनजातीय लोग मणिपुर की 90 प्रतिशत भूमि (पर्वतीय एवं जनजातीय लोगों के लिए आरक्षित) के स्वामी थे और ईसाई अल्पसंख्यक एवं जनजातीय दर्जा, इन दोनों का वे दोहरा लाभ उठाते थे। वे तो मणिपुर घाटी की 10 फीसदी मैतेई बहुल भूमि पर बस सकते थे, लेकिन मैतेई पर्वतीय भूमि में जाने के अधिकारी नहीं थे।
अब मणिपुर उच्च न्यायालय के आदेशानुसार सरकार से हिंदू मैतेई समाज को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने की व्यवस्था करने को कहा गया, जिसके परिणामस्वरूप मैतेई लोगों के साथ हो रहा अन्याय समाप्त होता और उनको पर्वतीय क्षेत्रों में बसने का अधिकार मिलता। इस पर कुकी ईसाई भड़क उठे। उनके समर्थन में प्रतिबंधित कुकी विद्रोही आतंकवादी संगठन सड़कों पर उतर आए। मणिपुर की वास्तविकता यह है कि ईसाई कुकी समाज वहां प्रशासनिक असर रखता है। पिछले एक दशक से लगातार कुकी समाज के अधिकारी राज्य पुलिस प्रमुख, सह प्रमुख, मुख्य सचिव आदि पदों पर रहते आए हैं। सब लाभ ईसाई कुकी व अन्य समाज को मिले तथा मैतेई सामान्य वर्ग में बना रहे, यही इस हिंसा का उद्देश्य है। मैतेई वैष्णव हैं। उनकी संख्या में लगातार कमी आ रही है। वर्ष 1901 में मैतेई 96 प्रतिशत थे, जो आज 49 फीसदी रह गए हैं। लेकिन 1901 में प्रायः शून्य प्रतिशत ईसाई आज 42 प्रतिशत से अधिक हैं।
केवल 32 लाख की आबादी वाले इस प्रदेश में भारत और भारतीय सेना के विरुद्ध सक्रिय 18 बड़े और 12 छोटे-छोटे विद्रोही-उग्रवादी समूह हैं, जिनमें 10 कम्युनिस्ट विचारधारा के अनुगामी और शेष कुकी चर्च समर्थित हैं। इनमें से कुछ उग्रवादी संगठनों के नाम देखिए-पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (जो चीन की सेना का भी नाम है), कांगलीपक कम्युनिस्ट पार्टी, रेवोल्यूशनरी पीपुल्स पार्टी, रेवोल्यूशनरी पीपुल्स फ्रंट, कुकी नेशनल आर्मी, कुकी लिबरेशन आर्मी आदि-आदि।
मणिपुर देश का एकमात्र ऐसा प्रदेश है, जहां प्रभावी रूप से विद्रोही संगठनों द्वारा पिछले तीन दशकों से हिंदी प्रतिबंधित है-हिंदी में पोस्टर, बैनर, सूचनाएं कुछ नहीं लग सकतीं। मणिपुर की बेटी मैरीकॉम पर हिंदी में फिल्म बनी, दुनिया में दिखाई गई, सिवाय मणिपुर के। मोदी सरकार आने के बाद पहली बार एक लंबी कालावधि अपेक्षया कम हिंसा वाली बीती। वर्ना विद्रोही संगठनों द्वारा घोषित एवं प्रभावी 190, 170, 185 और 50 दिनों के लगातार बंद मणिपुर की सामान्य नियति बन गए थे। स्कूल नहीं, दफ्तर नहीं, न्यायालय तक बंद। घर के राशन और गैस ब्लैक में खरीदने पड़ते थे। समर्थ और कम समर्थ लोग ऋण लेकर भी अपने बच्चों को कोलकाता, दिल्ली, बंगलूरू, देहरादून और चंडीगढ़ पढ़ने के लिए भेजने पर विवश होते थे।
18 विद्रोही संगठनों के प्रतिनिधि गठबंधन यूनाइटेड पीपुल्स फ्रंट और कुकी नेशनल ऑर्गेनाइजेशन ने केंद्र सरकार के साथ 22 अगस्त, 2008 को एक अभियान स्थगन समझौता (सस्पेंशन ऑफ ऑपरेशन) पर हस्ताक्षर किए, जिसके अंतर्गत केंद्र सरकार ने उनके विरुद्ध कार्रवाइयों पर रोक लगाई, इनके सशस्त्र संगठनों के शिविर बने रहने और उनकी रक्षा की गारंटी दी, तथा आतंकी-विद्रोही संगठनों ने हिंसक गतिविधियों, धन उगाही (विद्रोही रंगदारी) और भारत विरोधी गतिविधियों को रोकने का आश्वासन दिया। लेकिन वास्तविकता में इस समझौते का पालन उल्लंघन में ही ज्यादा हुआ। यह तथ्य है कि किसी भी कुकी उग्रवादी संगठन ने इस समझौते का पालन नहीं किया और अंततः लंबी प्रतीक्षा के बाद इस वर्ष मार्च में मणिपुर की भाजपा सरकार ने स्वयं को इस समझौते से बाहर निकाल लिया।
मणिपुर शांत न रहे, वहां लगातार विद्रोही संगठन सक्रिय रहें, मोदी सरकार के शांति स्थापित करने के प्रयास सफल न हों, इसमें किनकी रुचि हो सकती है? भारत के दोनों शत्रु देश चीन तथा पाकिस्तान और इन पश्चिमी कट्टर ईसाई संगठन, जो यहां पृथक ईसाई बहुल स्वायत्तशासी राज्य बनाने के ब्रिटिशकालीन स्वप्न पर कार्य कर रहे हैं, उन विद्रोही संगठनों को पोषित करते हैं। वहां करोड़ों रुपये भेजकर विकास करने की योजनाएं तब तक इच्छित फल नहीं दे सकतीं, जब तक वैचारिक व हिंसक विदेशी षड्यंत्रों और मणिपुर के प्रति हमारी सामाजिक- सांस्कृतिक उपेक्षा का अंत नहीं होता।
कुकी संगठनों के तीव्र और हिंसक विरोध का एक अन्य कारण अफीम की खेती पर सरकारी रोक एवं प्रतिबंधात्मक कार्रवाई है। म्यांमार के कुकी लोगों का स्थानीय कुकी जनजातियों के साथ प्रगाढ़ व्यापारिक संबंध अफीम एवं नशीले पदार्थों की बिक्री पर टिका है। सरकार ने जब उन पर नकेल कसी, तो उनके भीतर का गुस्सा अनेक रूपों में फूट पड़ा।
कितने भारतीय जानते हैं कि देश में सर्वाधिक सुंदर, पांच दिवसीय लंबी, अत्यंत गरिमाममय और खेलों से भरपूर होली केवल मणिपुर में होती है? दिल्ली में मणिपुरी किशोरों को चीनी या चिंकी कहने वाले मिल जाएंगे, लेकिन मणिपुर से हम कुछ सीख सकते हैं, यह कितने विद्वान अपने लेखों, भाषणों और शैक्षिक पाठ्यक्रमों का हिस्सा बनाते हैं?
देश की एकता हजारों करोड़ रुपये खर्च करने से नहीं, हजारों हृदयों की आत्मीयता के छंद से सुदृढ़ होती है। विदेशी आक्रमणों से ग्रस्त हमारे ही एक अविभाज्य मणिपुर के बारे में कुछ और जानने-समझने की आवश्यकता है। हिंसा का यह दौर तो खत्म हो जाएगा, लेकिन हमारा जोड़ने का काम अभी शुरू होना चाहिए।
-भाजपा के पूर्व राज्यसभा सांसद।