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पर्यावरण: हिंदुकुश हिमालय की हलचलों के साथ बढ़ती हिमस्खलन की घटनाएं और हादसे

सार

पारिस्थितिकीय रूप से संवेदनशील हिंदुकुश हिमालय पर जलवायु बदलाव के कारण हिमस्खलनों का खतरा बढ़ा है।
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हिमस्खलन - फोटो : Agency (File Photo)


हिमस्खलन या ऐवालांच 30 से 45 डिग्री के पर्वतीय ढलानों से नीचे मैदानों, घाटियों की ओर ठोस बर्फ और उनके साथ पत्थर, चटटानें, मिटटी, पानी का तेज बहाव होता है। हिमस्खलन जटिल प्रक्रियाओं व कारकों से पैदा होते हैं। भू-आकृतिकीय कारण भी नियामक होते हैं। किसी खास दिन की तेज धूप या हिमस्खलनों के पहले की बरसात भी इसका कारण बन जाती है। फिसलते-गिरते हुए हिमखंडों का आंतरिक ताप स्वाभाविक रूप से बढ़ने लगता है और उनसे भारी मात्रा में जल प्रवाह भी हो सकता है।


हिमस्खलन व भूस्खलन एक जैसी ही प्रक्रिया होती है। ढलानों पर आए भूखंड या हिमखंड गुरुत्वाकर्षण शक्ति के वशीभूत होकर नीचे गिरने लगते हैं।  अपने वजन व आधार में पानी के बहाव, आंतरिक तनावों के कारण तेजी से ग्लेशियर जब प्राकृतिक रूप से किसी पहाड़ के किनारे पहुंचकर झूलते रहते हैं। फिर टूटकर गुरुत्वाकर्षण शक्ति के कारण गिर जाते हैं। जब चटटानें गिरनें लग जाती हैं, तो वही भूस्खलन भी हो जाता है।


पारिस्थितिकीय रूप से संवेदनशील हिंदुकुश हिमालय पर जलवायु बदलाव के कारण हिमस्खलनों का खतरा बढ़ा है। भारत में उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर में हिमस्खलन ज्यादा ही होते हैं। कार्बन गैसें हिमनदों में ऊष्मीय ऊर्जा को भी बढ़ा रही हैं। बढ़ते तापक्रम व बरसातों में भी हिमपातों के दौरान गिरने वाली बर्फ को जमने का पर्याप्त समय व वातावरण नहीं मिलता है। इससे भी हिमस्खलन बढ़ रहे हैं। ताजे हिमपात की दशा में मशीनों के कंपन, निर्माण गतिविधियों, स्कीइंग गतिविधियों व तेज धूप से भी लूज स्नो एवलांच हो सकते हैं।


जून, 2013 की केदारनाथ आपदा के पीछे, जिसमें पांच हजार से ज्यादा लोग हताहत हुए थे, हिमस्खलन के पहलू को नकारा नहीं जा सकता। हिमस्खलन सड़कों पर राहगीरों व वाहनों को दबा जाते हैं, तो नदी घाटियों में फ्लैश फ्लड ले आते हैं। बस्तियों या शिविरों पर हुए हिमस्खलन जान माल का भारी नुकसान करते हैं। ग्लेशियर्स अक्सर सुदूर पहाड़ों में होते हैं। सैनिक शिविरों की बात छोड़ दें, तो वहां बस्तियां कम ही होती हैं। ग्लेशियरों के पास रहना खतरनाक होता है। किंतु विभिन्न परियोजनाओं, पर्यटन या स्कींइंग के नाम पर ही हिमस्खलन जनित खतरों के मुंह तक जाने का विकल्प हम स्वतः चुनते हैं।


वर्ष 2013 की केदारधाम व अन्य आपदाओं के बाद जल विद्युतीय बांधों की उनमें भूमिका के आरोपों के बीच सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड में बने और बनते बांधों से पर्यावरणीय क्षति के आकलन के लिए जो समिति बनाई थी, उसने भी पैराग्लेशियरों के दायरे में बनती योजनाओं को जोखिम भरा बताया था। किंतु विवशता है कि चीन सीमा पर भारत को सामरिक महत्व के सड़कों का निर्माण करना ही होगा। चिंताजनक तो यह है कि गरम होती पहाड़ी चोटियों व निरंतर बनती बर्फानी झीलों के बीच हिमस्खलन अनायास कभी भी हो सकते हैं। जिन चटटानों पर ग्लेशियर टिके हों, वहां छेड़छाड़ नहीं होनी चाहिए। ऐसी स्थितियों में निर्माण कार्यों के विस्फोट भी हिमस्खलनों को उत्प्रेरित कर सकते हैं।

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