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महाराष्ट्रः सभी ने कहा अभी रात है लेकिन यह तो सुबह सुबह की बात है

यशवंत व्यास Published by: संजीव कुमार झा Updated Sun, 24 Nov 2019 05:12 AM IST
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महाराष्ट्र की राजनीति - फोटो : अमर उजाला

शनिवार की सुबह जब सब उठे तो मेज पर आए तमाम अखबार बेकार हो चुके थे। यह नाटकीयता का चरम था और कुछ के लिए एक थ्रिलर का ट्रेजिक क्लाइमेक्स। नौ बजे तक दो टिप्पणीकार इस बात पर दो-दो हाथ करने बैठ गए कि शरद पवार को सब पता था और दूसरा कहता था, बिल्कुल नहीं पता था।

किसी को सुप्रिया सुले के आंसू दिखाई दे रहे थे, किसी को अजित पवार का धोखा! संजय राउत जो कुछ हफ्तों से रोजाना गली में गुर्राते हुए रंगदार की तरह घूमते दिख रहे थे कहने लगे, ये तो सरकार की डकैती है। झुकी आंखें देखते ही उन्हें खटका हो गया था कि अजित ने पाप किया है।



कहना बेकार है कि शिवाजी महाराज और महाराष्ट्र की जनता के नाम दुहाई दे-देकर हर नैतिकता की चिंदी उड़ा देने वाले लाज-लज्जा के पोस्टर और लोकतंत्र की चालीसाएं बेचने में लग गए हैं।

दिलचस्प यह है कि हाल के वर्षों का सर्वाधिक महत्वपूर्ण और केंद्रीय विमर्श ‘सांप्रदायिकता’ अचानक एक प्रहसन में बदल दिया गया है।

‘भ्रष्टाचार’ सामूहिक भोज की अवधारणा का केंद्रीय तत्व बन गया है। सच है कि सत्ता और महत्वाकांक्षा एक दूसरे के लिए बने हैं लेकिन बेशर्म लोगों में शर्म पर व्याख्यान देने की आकुलता ने जो नए शिखर छुए हैं, उनका कहना ही क्या? दिलचस्प यह है कि सारे लोग अपना कुछ नहीं, महाराष्ट्र की जनता का भला करना चाहते हैं।

क्या यह सच नहीं है कि जिस महायुति को लेकर भाजपा-शिवसेना, महाराष्ट्र की जनता के पास गए थे, उसने उन्हें वांछित बहुमत से भी पंद्रह सीटें ज्यादा दी थी।

उनकी सरकार ही वैध सरकार होती। इस तथाकथित उग्र-हिंदुत्व और नव -हिंदुत्व की साझेदारी के विरुद्ध ही तो बाकी पार्टियां खड़ी थीं। यही वह केंद्रीय नैरेटिव है, जिसके भरोसे भाजपा और मोदी के विरुद्ध लड़ाई लड़ी जा रही है। माहौल देखकर तीन तलाक, तीन सौ सत्तर और अब अयोध्या तक में जनता के मूड के हिसाब से बीच का रास्ता निकाल लिया गया है।


तभी तीन सौ सत्तर पर हुड्डा, केजरीवाल, सिंधिया - सब फैसले के साथ दिखकर मुक्त हुए। तीन तलाक में प्रगतिशीलता के दर्शन हो गए। अयोध्या के फैसले में सुप्रीम कोर्ट की जय-जय से मामला किनारे किया गया, ताकि श्रेय की हर सूची को खारिज किया जा सके। राष्ट्रवाद, जनेऊ, डुबकी, गोशाला वगैरह अब उतने कड़वे नहीं रहे और तमाम लोग इस या उस रास्ते से खुद को उस लाइन में लगा लेने को तैयार हैं।
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इसके बावजूद सत्ता का समीकरण यदि उलट नहीं पा रहा है, तो इसकी वजह भीतर की खोट में ही खोजी जानी चाहिए।

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महाराष्ट्र की राजनीति - फोटो : अमर उजाला
शनिवार की सुबह जब सब उठे तो मेज पर आए तमाम अखबार बेकार हो चुके थे। यह नाटकीयता का चरम था और कुछ के लिए एक थ्रिलर का ट्रेजिक क्लाइमेक्स। नौ बजे तक दो टिप्पणीकार इस बात पर दो-दो हाथ करने बैठ गए कि शरद पवार को सब पता था और दूसरा कहता था, बिल्कुल नहीं पता था।

किसी को सुप्रिया सुले के आंसू दिखाई दे रहे थे, किसी को अजित पवार का धोखा! संजय राउत जो कुछ हफ्तों से रोजाना गली में गुर्राते हुए रंगदार की तरह घूमते दिख रहे थे कहने लगे, ये तो सरकार की डकैती है। झुकी आंखें देखते ही उन्हें खटका हो गया था कि अजित ने पाप किया है।

कहना बेकार है कि शिवाजी महाराज और महाराष्ट्र की जनता के नाम दुहाई दे-देकर हर नैतिकता की चिंदी उड़ा देने वाले लाज-लज्जा के पोस्टर और लोकतंत्र की चालीसाएं बेचने में लग गए हैं।

दिलचस्प यह है कि हाल के वर्षों का सर्वाधिक महत्वपूर्ण और केंद्रीय विमर्श ‘सांप्रदायिकता’ अचानक एक प्रहसन में बदल दिया गया है।

‘भ्रष्टाचार’ सामूहिक भोज की अवधारणा का केंद्रीय तत्व बन गया है। सच है कि सत्ता और महत्वाकांक्षा एक दूसरे के लिए बने हैं लेकिन बेशर्म लोगों में शर्म पर व्याख्यान देने की आकुलता ने जो नए शिखर छुए हैं, उनका कहना ही क्या? दिलचस्प यह है कि सारे लोग अपना कुछ नहीं, महाराष्ट्र की जनता का भला करना चाहते हैं।

क्या यह सच नहीं है कि जिस महायुति को लेकर भाजपा-शिवसेना, महाराष्ट्र की जनता के पास गए थे, उसने उन्हें वांछित बहुमत से भी पंद्रह सीटें ज्यादा दी थी।

उनकी सरकार ही वैध सरकार होती। इस तथाकथित उग्र-हिंदुत्व और नव -हिंदुत्व की साझेदारी के विरुद्ध ही तो बाकी पार्टियां खड़ी थीं। यही वह केंद्रीय नैरेटिव है, जिसके भरोसे भाजपा और मोदी के विरुद्ध लड़ाई लड़ी जा रही है। माहौल देखकर तीन तलाक, तीन सौ सत्तर और अब अयोध्या तक में जनता के मूड के हिसाब से बीच का रास्ता निकाल लिया गया है।


तभी तीन सौ सत्तर पर हुड्डा, केजरीवाल, सिंधिया - सब फैसले के साथ दिखकर मुक्त हुए। तीन तलाक में प्रगतिशीलता के दर्शन हो गए। अयोध्या के फैसले में सुप्रीम कोर्ट की जय-जय से मामला किनारे किया गया, ताकि श्रेय की हर सूची को खारिज किया जा सके। राष्ट्रवाद, जनेऊ, डुबकी, गोशाला वगैरह अब उतने कड़वे नहीं रहे और तमाम लोग इस या उस रास्ते से खुद को उस लाइन में लगा लेने को तैयार हैं।

इसके बावजूद सत्ता का समीकरण यदि उलट नहीं पा रहा है, तो इसकी वजह भीतर की खोट में ही खोजी जानी चाहिए।

दरअसल अंतर्विरोधों की एक कड़ी है, जिसने विराट संभ्रम खड़ा कर दिया है। नतीजतन शिवसेना की आतंकवादियों से तुलना करने की हद तक जाने वाली कांग्रेस आज अपना मोक्ष उसी के घाट पर ढूंढ़ रही है। पुरानी टेक पर चलती कांग्रेस को दर्द यही है कि भाजपा पहले वाली भाजपा नहीं रही इसलिए वह चाल-चरित्र-चेहरा और नैतिकता का पर्चा निकालकर दिखाती है, तो सोचती है कि भाजपा शर्म में पड़ जाएगी। लेकिन,

भाजपा ने कांग्रेस का खेल अच्छी तरह सीख लिया है और उसकी ही शैली में प्रत्युत्तर देने की कला का पुनराविष्कार भी कर लिया है। महाराष्ट्र के ‘चिट्ठी ले लो, मीटिंग कर लो, कुर्सी दे दो’ ने टीवी पर जितने घंटे खींचे उसमें भाजपा का प्रतिशत बहुत कम था। सबसे ज्यादा फुटेज पहले शिवसेना, फिर एनसीपी और फिर कांग्रेस के हिस्से में आई थी। लेकिन सुबह की ‘स्तब्धकारी’ सूचना ने साबित कर दिया कि खामोशी की सियासत क्या होती है। हफ्ते भर में एक तरफ शिवसेना का हिंदुत्व और दूसरी तरफ कांग्रेस की धर्मनिरपेक्षता-दोनों की लोई उतर गई।

फोकस सीधे शरद पवार के बेटी-भतीजे संवाद पर जा टिका। अब बहस यह चल रही है कि तेज-तर्रार शरद पवार को खबर क्यों नहीं लगी? क्या उन्हें अजित पवार और सुप्रिया सुले में से चुनना था? शिवसेना को उद्धव-आदित्य की ताजपोशी करना थी, उन्हें अपने विधायकों की तो कोई चिंता ही नहीं थी।

कांग्रेस के विधायक बेचैन थे कि सरकार बनवाओ - मामला आगे बढ़ाओ। तो अब क्या होगा? विशेषज्ञ यह लेख लिखे जाने तक गप्पाष्टक चला रहे थे कि शरद पवार का गणित अभी खत्म नहीं हुआ है। अभी उनका ‘माइंड गेम’ शुरू हुआ है। आखिरकार दबते हुए अजित पवार मान जाएंगे या तीनों पार्टियों - शिवसेना, कांग्रेस, एनसीपी के कुछ-कुछ विधायक टूटेंगे। खेल फिर बदल जाएगा।

यानी कुछ को अजित पवार को ईडी से लग रहे डर की चिंता है, कुछ को भाजपा के ‘चालाक’ खेल की। लेकिन, किसी को मूल्यों की बात में रस नहीं रहा है। सबका मजा शरद पार के ‘माइंड गेम’ में है।

यही इस समय की सबसे बड़ी त्रासदी है। इसी का उत्तर चाहिए। क्या देश ईडी के डर, मलाईदार मंत्रालय, सीएम की कुर्सी, चाचा की चाल और पैकेज के खाते में ही चल रहा है?

शिवसेना ने कहा, रात है

एनसीपी ने कहा, रात है

कांग्रेस ने कहा, रात है

भाजपा ने कहा, रात है

यह सुबह-सुबह की बात है!


(गोरख पांडे से क्षमा याचना सहित)
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