शनिवार की सुबह जब सब उठे तो मेज पर आए तमाम अखबार बेकार हो चुके थे। यह नाटकीयता का चरम था और कुछ के लिए एक थ्रिलर का ट्रेजिक क्लाइमेक्स। नौ बजे तक दो टिप्पणीकार इस बात पर दो-दो हाथ करने बैठ गए कि शरद पवार को सब पता था और दूसरा कहता था, बिल्कुल नहीं पता था।
किसी को सुप्रिया सुले के आंसू दिखाई दे रहे थे, किसी को अजित पवार का धोखा! संजय राउत जो कुछ हफ्तों से रोजाना गली में गुर्राते हुए रंगदार की तरह घूमते दिख रहे थे कहने लगे, ये तो सरकार की डकैती है। झुकी आंखें देखते ही उन्हें खटका हो गया था कि अजित ने पाप किया है।
कहना बेकार है कि शिवाजी महाराज और महाराष्ट्र की जनता के नाम दुहाई दे-देकर हर नैतिकता की चिंदी उड़ा देने वाले लाज-लज्जा के पोस्टर और लोकतंत्र की चालीसाएं बेचने में लग गए हैं।
दिलचस्प यह है कि हाल के वर्षों का सर्वाधिक महत्वपूर्ण और केंद्रीय विमर्श ‘सांप्रदायिकता’ अचानक एक प्रहसन में बदल दिया गया है।
‘भ्रष्टाचार’ सामूहिक भोज की अवधारणा का केंद्रीय तत्व बन गया है। सच है कि सत्ता और महत्वाकांक्षा एक दूसरे के लिए बने हैं लेकिन बेशर्म लोगों में शर्म पर व्याख्यान देने की आकुलता ने जो नए शिखर छुए हैं, उनका कहना ही क्या? दिलचस्प यह है कि सारे लोग अपना कुछ नहीं, महाराष्ट्र की जनता का भला करना चाहते हैं।
क्या यह सच नहीं है कि जिस महायुति को लेकर भाजपा-शिवसेना, महाराष्ट्र की जनता के पास गए थे, उसने उन्हें वांछित बहुमत से भी पंद्रह सीटें ज्यादा दी थी।
उनकी सरकार ही वैध सरकार होती। इस तथाकथित उग्र-हिंदुत्व और नव -हिंदुत्व की साझेदारी के विरुद्ध ही तो बाकी पार्टियां खड़ी थीं। यही वह केंद्रीय नैरेटिव है, जिसके भरोसे भाजपा और मोदी के विरुद्ध लड़ाई लड़ी जा रही है। माहौल देखकर तीन तलाक, तीन सौ सत्तर और अब अयोध्या तक में जनता के मूड के हिसाब से बीच का रास्ता निकाल लिया गया है।
तभी तीन सौ सत्तर पर हुड्डा, केजरीवाल, सिंधिया - सब फैसले के साथ दिखकर मुक्त हुए। तीन तलाक में प्रगतिशीलता के दर्शन हो गए। अयोध्या के फैसले में सुप्रीम कोर्ट की जय-जय से मामला किनारे किया गया, ताकि श्रेय की हर सूची को खारिज किया जा सके। राष्ट्रवाद, जनेऊ, डुबकी, गोशाला वगैरह अब उतने कड़वे नहीं रहे और तमाम लोग इस या उस रास्ते से खुद को उस लाइन में लगा लेने को तैयार हैं।
इसके बावजूद सत्ता का समीकरण यदि उलट नहीं पा रहा है, तो इसकी वजह भीतर की खोट में ही खोजी जानी चाहिए।