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महाकुंभ के पाठ : आधारभूत ढांचे का जरूरी है विकास, ताकि बना रहे तीर्थ नगरों का आध्यात्मिक और सांस्कृतिक सत्व

बलबीर पुंज
Updated Wed, 26 Feb 2025 06:41 AM IST

सार

प्रयागराज, काशी या अयोध्या कोई सामान्य शहर नहीं रहे हैं, लिहाजा इन क्षेत्रों में आधारभूत ढांचे का विकास इस प्रकार किया जाना चाहिए कि इन नगरों का कालजयी आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक सत्व भी अक्षुण्ण रहे और ये आगंतुकों का दबाव भी अपने में समा सकें।
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महाकुंभ 2025। - फोटो : पीटीआई


इस बार महाकुंभ में श्रद्धालु इतनी बड़ी संख्या में क्यों आए? इसके मुख्यत: तीन कारण हैं-आर्थिक समृद्धि, अपनी आस्थागत पहचान के प्रति जागृति और सुरक्षा का भाव। आजादी के 60 साल तक एक साधारण हिंदू, सिर्फ ‘हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ’ सुनता रहा। आठवीं शताब्दी से इस्लामी आक्रांताओं के सतत मजहबी हमले, तलवार के बल पर धर्मांतरण, मान-बिंदुओं और मंदिरों का जमींदोज किया जाना, उसके जीवन का स्थायी भाव जैसा हो गया। इस दौरान, पवित्र नगरियां ध्वस्त या अपवित्र होती रहीं। इसके बाद आए यूरोपीय आक्रांताओं ने अपने अनेक षड्यंत्रों में से एक-‘मैकाले शिक्षा प्रणाली’ से उनमें स्वयं की आस्था-पहचान के प्रति हीन-भावना भरनी शुरू कर दी।


वर्ष 1947 में इस्लाम के नाम पर रक्तरंजित विभाजन और अंग्रेजों से स्वतंत्रता के बाद खंडित भारत में उम्मीद थी कि जैसे गांधी-पटेल के नेतृत्व में सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण शुरू हुआ, वैसे ही अन्य ऐतिहासिक अन्यायों का परिमार्जन के साथ सभ्यतागत पुनरोद्धार का चक्र पूरा होगा। ऐसा नहीं हुआ, क्योंकि संस्कृति, परंपराओं और मानबिंदुओं पर गौरवान्वित होना ‘सांप्रदायिक’ करार दे दिया गया। बदली परिस्थितियों में बीते एक दशक से अपनी पहचान के प्रति पहले से कहीं अधिक जागरूकता और मुखरता दिखाई दी है। संचार संसाधन हैं, निजी आर्थिक समृद्धि भी है और पहचान के प्रति सार्वजनिक संकोच नहीं है। ऐसे में 144 साल बाद आया प्रयाग महाकुंभ सांस्कृतिक गर्व के अवसर में भी दिखाई दिया।


कुंभ मात्र आध्यात्मिक आस्था पर्व नहीं, यह मानव को सनातन के विराट और समग्र स्वरूप, जिसमें बहुलतावाद-समावेश और प्रकृति-ब्रह्मांड के कल्याण की भावना है-उससे जोड़ने का संगम भी है। त्रिवेणी सबके लिए है। इसमें जाति-वर्ग की कोई जगह नहीं। कुंभ दैवीय ऊर्जा का एक पवित्र योग है, जिसमें सूर्य के मकर राशि और बृहस्पति के कुंभ राशि में प्रवेश करने पर एक दिव्य शक्ति का अद्भुत संयोग बनता है। मुझे अपने प्रयागराज प्रवास में जूना अखाड़े के आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरी महाराज के शिविर में रहने का अवसर मिला। जब स्वामी जी से एक उच्च-मध्यवर्ग के जिज्ञासु सज्जन ने पूछा कि वे किस ईश्वर की उपासना करें, तब उनका उत्तर था कि ग्रामदेवता, कुलदेवी और पूर्वजों के बाद वे किसी भी ईश्वर की आराधना कर सकते हैं। उन्होंने अपने इष्टदेव को उन पर थोपने का प्रयास नहीं किया। यह सनातन संस्कृति का ही मौलिक चरित्र है, जिसमें विचारों-असहमति की स्वतंत्रता है, जो ‘मैं ही सच्चा, तू झूठा’ की संकीर्ण अवधारणा से मुक्त है।


समाज में बदलते चिंतन का संज्ञान लेकर केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार ने महाकुंभ के लिए मिलकर 12,000 करोड़ रुपये से अधिक का बजटीय प्रावधान और विभिन्न स्तर पर अभूतपूर्व व्यवस्थाओं का प्रबंध किया। लेकिन, दूसरी तरफ प्रशासनिक तंत्र इस चेतना और ज्वार का सही आकलन नहीं कर पाया। कई अधिकारियों-कर्मचारियों ने इस अपेक्षित भावना के प्रतिकूल इसे नियमित दायित्व की तरह लिया। साथ ही, उत्साही जन इस बात को नहीं समझ पाए कि उत्साह-उमंग के साथ अनुशासन और नागरिक-कर्तव्यबोध भी आवश्यक है। आवश्यक यह है कि वे महाकुंभ या फिर अपने अन्य पवित्र स्थलों पर अनियंत्रित भीड़ के बजाय आस्थावान तीर्थयात्री बनकर जाएं। ऐसा नहीं है कि तीर्थस्थलों में दुर्घटनाएं केवल भारत में होती हैं। हज यात्रा के दौरान मक्का में पर्याप्त प्रबंध होने के बावजूद आठ से अधिक भगदड़ की घटनाएं हो चुकी हैं। इनमें सबसे भीषण हादसा वर्ष 2015 का था, जिसमें 2,400 से अधिक लोगों की जान गई थी। इसी तरह वर्ष 2016-24 के बीच नाइजीरियाई चर्चों में भगदड़ की कई घटनाओं में 100 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है। स्वाभाविक ही, जहां भी अतिरेक होगा, व्यवस्थागत चुनौतियां बढ़ जाती हैं। जरूरत व्यवस्था के स्तर पर सही अनुमान और जन के स्तर पर जवाबदेही की है।


कुछ स्वयंभू कटाक्ष करते हुए पूछते हैं-‘क्या गंगा में डुबकी लगाने से गरीबी दूर होगी, भूख मिटेगी?’ जाहिर है, कोई भी आस्था से जुड़ा आयोजन गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम का भाग नहीं होता। रही बात भूख की, तो महाकुंभ में 500 से अधिक छोटे-बड़े भंडारे चलते रहे हैं। वर्ष 2013 और 2019 में क्रमशः 12 करोड़ और 24 करोड़ श्रद्धालु कुंभ आए थे। भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) के अनुसार, 2019 के प्रयागराज अर्धकुंभ आयोजन से सरकार को 1.2 लाख करोड़ रुपये का राजस्व प्राप्त हुआ और इससे छह लाख से अधिक रोजगार के अवसर सृजित हुए। इस महाकुंभ में 60 करोड़ से अधिक श्रद्धालु स्नान कर चुके हैं। इनमें अति-गरीब से लेकर संपन्न व्यक्ति शामिल है, जिसमें मध्यवर्ग के परिवारों की संख्या सर्वाधिक है। इनमें से लाखों ने अयोध्या-काशी में भी पवित्र दर्शन किए।


यदि प्रत्येक मध्यवर्ग तीर्थयात्री औसतन चार-पांच हजार रुपये व्यय कर रहा है, तो स्वाभाविक रूप से स्थानीय अर्थव्यवस्था और उससे जुड़े लोगों को कितना लाभ होगा, इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है। पर्यटन की दृष्टि से दिल्ली, जयपुर और आगरा को पारंपरिक रूप से ‘स्वर्णिम त्रिकोण’ माना जाता है। बदलते परिप्रेक्ष्य में प्रयागराज, काशी और अयोध्या भारत के ‘अध्यात्म त्रिकोण’ के रूप में बनते जा रहे हैं।  प्रयागराज, काशी या अयोध्या सहित अन्य तीर्थस्थल कोई सामान्य शहर नहीं हैं और न ही वे अपने स्तर पर आवास, पर्यटन या रोजगार का साधन हैं। लिहाजा इन क्षेत्रों में आधारभूत ढांचे का विकास इस प्रकार किया जाना चाहिए कि इन नगरों का कालजयी आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक सत्व भी अक्षुण्ण रहे और ये आगंतुकों का दबाव भी अपने में समा सकें। 

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