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मुद्दा: महंगाई की मार और मरम्मत का अधिकार, पोर्टल की स्थापना और कमेटी गठित करने से आगे नहीं बढ़ पाए कदम

विवेक एस अग्रवाल
Updated Tue, 25 Feb 2025 06:39 AM IST

सार

मरम्मत के अधिकार के बिना उपभोक्ता आर्थिक बोझ उठाता है, तो पुराने उपकरणों को कबाड़ में डालने से पर्यावरण पर भी असर पड़ता है।
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सांकेतिक तस्वीर। - फोटो : अमर उजाला


वर्तमान युग में, जहां हर वस्तु त्वरित बदलाव के सांचे में ढल रही है, वहीं निर्माताओं की भी अपेक्षा रहती है कि मॉडल में बदलाव या उन्नयन के नाम पर उपभोक्ता उसके नए उत्पाद को खरीदते रहें। इससे निर्माता का स्वार्थ तो सध जाता है, पर उपभोक्ता आर्थिक मायाजाल में फंस जाता है। जब मरम्मत के अधिकार संबंधी चर्चाएं चल रही थीं, तो उसमें ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक और कृषि उपकरणों को ही तरजीह दी गई, जबकि आमजन को प्रभावित करने वाले मेडिकल उपकरणों और मशीनरी को इस चर्चा से बाहर ही रखा गया। यह अलग बात है कि अभी सम्मिलित उपकरण व मशीनरी भी अपनी पूर्णता हासिल नहीं कर पाई। प्रचार-प्रसार के अभाव में उपभोक्ता मामलों के विभाग द्वारा विकसित ‘राइट टू रिपेयर’ पोर्टल भी आमजन के चलन में नहीं आया है।


मरम्मत के अधिकार के बिना निर्माता के एकाधिकार के चंगुल में उपभोक्ता कहीं मशीन या उपकरण स्वयं क्रय करके फंस रहा है, तो मेडिकल जैसे क्षेत्र में निदान एवं उपचार हेतु मशीनों एवं उपकरण के बढ़ते उपयोग के कारण अनचाहे भी एकाधिकार वाली व्यवस्था का भार ढोता है। इसका एक पहलू यह भी है कि प्रथमतया तो संबंधित मशीनों के कलपुर्जे कहीं उपलब्ध ही नहीं होते और यदि हो भी जाएं, तो दूसरे से मरम्मत कराने पर उनसे जुड़ी हुई गारंटी-वारंटी भी समाप्त हो जाती है। यह कहना भी अनुचित नहीं होगा कि मशीन की बाहर मरम्मत का दंड भी क्रेता अस्पताल या निदान केंद्र को परोक्ष तौर पर चुकाना ही पड़ता है। यह ऐसा गंभीर विषय है, जिस पर न सिर्फ व्यापक चर्चा होनी चाहिए, बल्कि कानून के जरिये चिकित्सकीय उपकरणों को भी अन्यत्र मरम्मत के अधिकार के दायरे में लाया जाना चाहिए।


विडंबना यह है कि हर निर्माता नवीनता के नाम पर आंशिक, क्षणिक एवं कलात्मक बदलाव कर निरंतर नए उत्पाद को बाजार में ले आता है और आधुनिकतम इलाज के नाम पर उसे स्वीकार करना और अपनाना इस क्षेत्र में कार्यरत संस्थानों के लिए जरूरी हो जाता है। अन्यथा, वे स्वयं को बाजार की दौड़ से पीछे पाने लगते हैं। उदाहरण के लिए, वर्तमान में 3 टेस्ला एमआरआइ मशीन का प्रचलन है, जो  15 से 20 करोड़ रुपये की लागत की होती है और निर्माता कंपनी उसके रखरखाव हेतु लगभग 50 लाख रुपये प्रतिवर्ष का 10 वर्ष के लिए अनुबंध करती है। लेकिन इस बीच में ही इसके आंशिक उन्नयन का नया मॉडल आ जाता है और बाजार की दौड़ में रहने के लिए संस्थान को उसे खरीदना पड़ता है।


मरीज की भी अपेक्षा रहती है कि उसका निदान एवं उपचार आधुनिकतम मशीन से ही हो। वर्तमान युग में शनैः शनैः मरम्मत का स्थान परिवर्तन या नवीनता ने ले ली है। निर्माता नए मशीन-उपकरण को बाजार में लाने के साथ-साथ अपने ही पुराने उत्पाद को अप्रचलित करार देने लगता है तथा उसके कल पुर्जों को भी चलन से बाहर बता देता है। नतीजतन, चिकित्सकीय संस्थान कलपुर्जों की आपूर्ति के लिए लंबी प्रतीक्षा के बजाय बदलाव करना पसंद करते हैं और पुरानी मशीन को कबाड़ में डाल देते हैं। यह न तो पर्यावरण सम्मत है और न ही मरीज के हित में, क्योंकि नई मशीन की लागत इलाज और निदान पर अतिरिक्त बोझ के रूप में दिखती है। इससे अनजान मरीज आधुनिकतम निदान एवं इलाज की प्रत्याशा में बढ़े हुए खर्च को चुपचाप सहन करता है। बीमित व्यक्ति के लिए तो यह प्रत्यक्ष बोझ नहीं होता, पर सामान्य लोग इसकी चपेट में आए बिना भी नहीं रहते।


बढ़ते चिकित्सा व्यय में मशीन और उपकरण पर हो रहे अनियंत्रित, निरंकुश तथा निरंतर खर्च की भी भूमिका है। इसके बहुत बड़े हिस्से पर नीतिगत रूप से मरम्मत के अधिकार को कायम करके तथा आमजन में जागृति पैदा कर अंकुश लगाया जा सकता है। मरम्मत का अधिकार लागू होने से खरीदारों को भी कम लागत पर बिना गारंटी खत्म किए ठीक कराने का विकल्प मिल जाएगा। इससे निर्माता कंपनियों को भी लाभ होगा, क्योंकि उनके द्वारा शिक्षित-प्रशिक्षित कुशल कारीगर जब कोने-कोने में कायम हो जाएंगे, तो उन्हें भी बड़ा बाजार मिलेगा। अधिक परिमाण में कारोबार होने से लागत में कमी आएगी और सामान्य नागरिक को सुलभ उपचार उचित दर पर मिल पाएगा।

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