इन दिनों उत्तर प्रदेश में बोर्ड की परीक्षाएं चल रही हैं। लेकिन प्रदेश में नकल का धंधा इतने जोर-शोर से चल रहा है कि पिछले दिनों राज्यपाल ने भी एक कार्यक्रम में कहा कि नकल के कारण बाजार में उत्तर प्रदेश की डिग्रियों की कीमत कम है। दरअसल आज के दौर में शिक्षा का दृष्टिकोण व्यापक नहीं रह गया है, बल्कि परीक्षा ही ज्ञान की कसौटी रह गई है। लेकिन नकल के आधार पर प्राप्त डिग्रियां छात्रों के ज्ञान में इजाफा नहीं कर पातीं। ऐसी शिक्षा पात्रता और योग्यता पर केंद्रित न होकर असंख्य अयोग्य शिक्षितों की फौज तैयार कर देती है। समय के साथ नकल पर अंकुश तो दूर, इसका धंधा और आधुनिक होता चला गया है। शुरू में लोग उत्तर पुस्तिकाओं में नंबर बढ़वाने की कोशिश में कॉपी जांचने वाले शिक्षकों के घर तक पहुंच जाते थे। लेकिन अब न केवल इसके लिए उत्तर पुस्तिकाओं को बदल दिया जाता है, बल्कि नकल के लिए आधुनिक तकनीक का भी इस्तेमाल होने लगा है।
माध्यमिक परीक्षा में ही सबसे ज्यादा नकल होती है। इसकी वजह यह है कि विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में इसके उच्च अंक के आधार पर ही शामिल होने का मौका मिलता है। नकल पर अंकुश लगाने के लिए शासन की ओर से तमाम तरह की व्यवस्थाएं की जाती हैं, इसके बावजूद नकल माफियाओं से बोर्ड परीक्षा को बचाना मुश्किल साबित हो रहा है।
परीक्षा में नकल के लिए सबसे पहले छात्रों और अभिभावकों को जिम्मेदार ठहराया जाता है। यह कुछ हद तक यह तर्कसंगत भी है। अगर छात्रों का आत्मबल दृढ़ हो और वे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की चाहत रखते हों, तो वे अनुचित साधनों का उपयोग करने से परहेज करेंगे। लेकिन ज्यादा अंक पाने की अंधी दौड़ में अभिभावक अपने बच्चों के भविष्य और उसकी शिक्षा को ही ताक पर रख देते हैं। पर इसके लिए वे अकेले दोषी नहीं। नकल का तंत्र बना हुआ है, तो इसके लिए शिक्षक, कक्ष निरीक्षक, प्रबंधक, केंद्र व्यवस्थापक, नकल माफिया और सरकार भी उतनी ही जिम्मेदार है। धन उगाही के लालच में जिम्मेदार लोग भी नकल के दुश्चक्र में लिप्त पाए जाते हैं। वित्तरहित विद्यालय की शिक्षा व्यवस्था ने नकल का प्रचलन बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। शत-प्रतिशत सफलता जैसे लोकलुभावन नारों के जरिये छात्रों को आकर्षित किया जाता है और उनसे पैसे उगाहे जाते हैं। स्वार्थ व असुरक्षा की भावना के चलते कोई भी न तो इन शिक्षा माफियाओं का विरोध करता है और न नकल समाप्त करने हेतु ठोस कदम उठाती है।
वर्ष 1992 में नकल विरोधी अध्यादेश लागू होने से इस पर काफी हद तक अंकुश लगा था। हालांकि उस वर्ष छात्रों की सफलता का प्रतिशत काफी कम रह गया था। पर उसके बाद सत्ता में आई सरकार ने अपना चुनावी वायदा पूरा करने के लिए उस अध्यादेश को निरस्त कर दिया, जिसके कारण शिक्षा की गुणवत्ता बदतर होती चली गई। वर्ष 1998 में नकल रोधी अध्यादेश पुनः लागू किया गया, पर कुछ संशोधनों के साथ। नतीजतन वह नकल पर अंकुश लगाने में प्रभावी नहीं हुआ।
नकल के आधार पर शिक्षित युवा राष्ट्र पर बोझ बन जाते हैं। अतः बोर्ड परीक्षाओं की विश्वसनीयता व गुणवत्ता बनाए रखने के लिए नकल को खत्म करना ही होगा। इसके लिए कठोर कानून बनाना पड़े, तो उससे भी पीछे नहीं हटना चाहिए।