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एक सदी से बैठी हूं...

Sat, 08 Jun 2013 10:12 PM IST
शैलजा गुप्ता
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एक तरह से कह सकते हैं कि मुझे क्रिएटिव आर्ट से बेहद प्यार है, लेकिन इसे मैंने खुद ही सीखा है। मैंने चाक पर पॉटरी की, फिर स्कल्पटिंग की और डिजिटल पेंटिंग भी की।
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डिजिटल पेंटिंग भी चीजों को लेकर कलाकार की अपनी व्याख्याओं को बयां करने का एक उभरता हुआ माध्यम है। जिस तरह हम पेन, पेंसिल और रंगों से कैनवास पर पेंटिंग बनाते हैं, वैसे ही डिजिटल संसार में फोटोशॉप, इमेज एनहैंसर और वेबसाइट डिजाइनिंग के टूल्स इस्तेमाल कर सकते हैं।

कंप्यूटर पर जब पेंटिंग होती है, तो उसके दो तरह के रूप सामने आते हैं। एक तो नई रचना, दूसरी किसी भी फोटो को सुधारने और उसमें कुछ जोड़कर नया रचने का काम।
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मैंने जब बॉलीवुड के सौ सालों पर अपनी पेंटिंग्स की रेंज बनाई, तो अधिकतर काम एडोब फोटोशॉप और एडोब इलस्ट्रेटर पर किया। जाहिर है कि डिजिटल पेंटिंग कर रहे हैं, तो इन प्रोग्राम्स और सॉफ्टवेयर्स की जानकारी अच्छी तरह होनी चाहिए। मैंने तो यह खुद ही सीखे।

क्योंकि बात सिर्फ तकनीक समझने की है। जैसे हम ब्रश, पेंट और कैनवास का उपयोग करने वाली पंेटिंग सीखने के लिए क्लासेज में जाते हैं, तो वहां हम कॉन्सेप्ट समझने के अलावा उसे अभिव्यक्त करने की तकनीक भी सीखते हैं। ऐसा ही कंप्यूटर पर भी जानना जरूरी है।

मैंने यह खुद किया। टाइम भी लगा। मैं 160 पेंटिंग्स आठ महीने में बना पाईं। अभी रीजनल इंडियन सिनेमा पर भी अगली साठ पेंटिंग्स बनानी हैं, जिसमें अंदाजन तीन महीने और लगेंगे। क्योंकि जब हम भारतीय सिनेमा की बात करते हैं, तो तमिल, कन्नड़, बांग्ला, मराठी जैसी भाषाओं की फिल्मों को शामिल करना अनिवार्य है। इनके योगदान को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता।

बॉलीवुड पर ही अपनी पेंटिंग्स बनानी हैं, ऐसी मेरी कोई योजना नहीं थी। एक संडे को नेट सर्फिंग के दौरान मैंने देखा कि बॉलीवुड शताब्दी पूरी होने पर इतना कुछ कर रहा है। बॉलीवुड से जुड़ा हर शख्स उसे अपनी तरह से सेलिब्रेट कर रहा है।

तो मैं क्यों नहीं! मैं न्यूयॉर्क में रहती हूं, पर बॉलीवुड से मेरा जुड़ाव तो है ही। मैं रेड चिलीज प्रोडक्शन के यूएस विंग की क्रिएटिव हेड हूं, मैंने एक अमेरिकन इंडियन फिल्म `वॉक अवे' लिखी और डायरेक्ट की है, बॉलीवुड की फिल्में देखते हुए ही बचपन बीता है।

तो मैं भी कुछ करना चाहती थी। मैंने शुरुआत की मेरी पसंदीदा शख्सियत से। मैं 70-80 के दशक से बहुत प्रभावित हूं। उस समय अमिताभ का बोलबाला रहा। वहां मेरे फेवरेट आज तक बने हुए हैं। डूडलिंग करते-करते मुझे अमिताभ बच्चन की एक फोटो मिली। मैंने उससे ही शुरू किया। छह घंटे की मेहनत के बाद जो पेंटिंग बनी, मैंने उस पर ओपिनियन लेने के लिए दोस्तों को भेज दिया और सबने तारीफ की। फिर इस प्रोजेक्ट का आइडिया आया। मैंने अपने कलेक्शन में अमिताभ जी से लेकर परेश रावल, रणबीर कपूर, नरगिस और दीपिका पादुकोण जैसे पुराने- नए, हर नामी सितारे को शामिल किया है। कलेक्शन को गोल्डन, रोमांटिक, एंग्री जैसे एराज यानी युगों में बांटकर भी पेश किया है।

इसमें कैरेक्टर आर्टिस्ट भी मिलेंगे और सुपरस्टार भी। मेरा यह प्रोजेक्ट भारतीय सिनेमा के कला से भरे सौ सालों को एक श्रद्धांजलि है। लोग कहते हैं कि डिजिटल पेंटिंग्स की कॉपी बहुत जल्दी होती है। इस तरह साइबरस्पेस में आर्टिस्ट को पैसों का झटका खूब लगता है। लेकिन मैं इन सब पर ध्यान नहीं देती। जिसे कॉपी करना है, कॉपी करे। कैनवास पर बनीं करोड़ों की पेंटिंग्स भी तो कॉपी हो जाती हैं। जिसे ओरिजनल खरीदना है, वह खरीदेगा ही। हरेक आर्टिस्ट का अपना इंटरप्रिटेशन होता है। ऐसे में अंतर तो मिलना तय ही है।  
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