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हाशिये पर हैं हिंदी पट्टी की महिलाएं

Sat, 08 Jun 2013 10:03 PM IST
पत्रलेखा चटर्जी
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विकराल आंकड़ों के इस युग में संख्याएं खबरों का रूप ले लेती हैं। लेकिन क्या वाकई में हम इन संख्याओं से कुछ सीखते हैं? और क्या ये आंकड़े वास्तव में पूरी कहानी को बयां करते हैं।
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उदाहरण के तौर पर महिला स्वास्थ्य को ही ले लीजिए। क्या राष्ट्रीय आंकड़ों से हमेशा हमें यह पता चल सकता है कि देश में कितनी महिलाएं स्वस्थ हैं या फिर कितनी बीमार? इसका उत्तर हां और न दोनों ही हंै। राष्ट्रीय स्तर के आंकड़े रुझानों का खुलासा करते हैं।

लेकिन अक्सर ये गांव और शहर, विभिन्न क्षेत्रों, सामाजिक-आर्थिक समूहों, विभिन्न जातियों, आदिवासियों और देश के अंदर देश, विभिन्नताओं के बीच मौजूद असमानताओं को स्पष्ट तौर पर सामने नहीं ला पाते। जब तक हम इन असमानताओं पर ध्यान नहीं देते, तब तक जमीनी तौर पर वास्तविक हकीकत को नहीं जान सकते जो अर्थपूर्ण कार्रवाई के लिए जरूरी है।
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आठ अधिकार प्राप्त कार्यकारी समूह राज्यों (बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, ओडिशा और राजस्थान) और असम के 2010-11 के वार्षिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एएचएस) के आंकड़ों से महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य पर असर डालने वाले अनेक तत्वों का पता चलता है।

शादियों के आंकड़ों पर नजर डालने से पता चलता है कि 2007 से 2009 के दौरान उत्तराखंड में हुईं कुल शादियों में तीन फीसदी कानूनी तौर पर विवाह के लिए तय आयु से कम थीं। उत्तर प्रदेश और राजस्थान में यह आंकड़ा क्रमश: 8.9  फीसदी और 21.9 फीसदी है।

इस तरह की असमानताएं सिर्फ राज्यों के बीच ही नहीं विभिन्न जिलों के बीच भी हंै। जैसे उत्तर प्रदेश के बलरामपुर जिले में संस्थागत प्रसव सबसे कम 16.8 फीसदी है, जबकि इंदौर में सबसे ज्यादा 92.5 फीसदी है। इसके अलावा विभिन्न राज्यों के शहरी और ग्रामीण इलाकों के बीच भी असमानताएं हैं।

एक अन्य आधिकारिक सर्वेक्षण एसआरएस (नमूना पंजीकरण प्रणाली) 2010 के मुताबिक राष्ट्रीय स्तर पर शिशु मृत्यु दर 2010 में 1000 जन्मे बच्चों पर 47 थी। 2008 में यह आंकड़ा 1000 जन्मे बच्चों पर 53 था। लेकिन अगर हर राज्य के वास्तविक आंकड़ों पर नजर डालेंगे, तो आने वाले वक्त की वास्तविक चुनौतियों का पता चल सकेगा।

मध्य प्रदेश में शिशु मृत्यु दर सबसे ज्यादा 62 और सबसे कम केरल में 13 है। असम में यह 58, बिहार में 48,  छत्तीसगढ़ में 51,  हरियाणा में 48, उड़ीसा में 61,  राजस्थान में 55, उत्तर प्रदेश में 61 है। इन राज्यों में शिशु मृत्यु दर राष्ट्रीय औसत से ज्यादा है। मलेशिया की राजधानी कुआलालम्पुर में पिछले महीने तीसरे वुमेन डिलीवर कांफ्रेंस के दौरान यह भी एक अहम मुद्दा रहा।

इस कांफ्रेंस में 149 देशों के तकरीबन 5,000 प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। एक अंतरराष्ट्रीय एनजीओ वुमेन डिलीवर द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में सबसे अहम बात उभरकर सामने यह आई कि महिलाओं के स्वास्थ्य में निवेश और परिवार नियोजन सुविधाओं की उपलब्धता महज एक नैतिक और मानवाधिकार का ही मुद्दा नहीं है।

इसके आर्थिक लाभ हैं, जो व्यक्ति विशेष से परे हैं और यह पूरी दुनिया में लागू होता है। कांफ्रेंस के मेजबान देश मलेशिया ने न सिर्फ आर्थिक मोर्चे पर अच्छा काम किया है, बल्कि इसने माताओं की मृत्यु दर में कमी लाने में काफी कामयाबी हासिल की है। मलेशिया में 1957 में माताओं की मृत्यु दर 1000 जन्म पर 540 थी, जो 2010 में घटकर केवल 28 रह गई।

कांफ्रेंस के दौरान सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़े विशेषज्ञों ने बेहद गरीब और संवेदनशील लोगों तक महत्वपूर्ण आवश्यकताओं की पहुंच पर जोर दिया। विश्व स्वास्थ्य संगठन और यूनीसेफ की एक नई रिपोर्ट में 75 देशों में स्वास्थ्य सुविधाओं की उपलब्धता में सामाजिक-आर्थिक असमानता पर एक विशेष खंड दिया गया है।

यही असमानता विश्व के 95 फीसदी मातृ और बाल मृत्यु का कारण है। भारत सहित इन 75 देशों में से ज्यादातर में पिछले दो दशकों के दौरान मातृ और बाल मृत्यु में गिरावट आई है, लेकिन रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि जब स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता की बात आती है तो हर देश में 20 फीसदी सबसे अमीर और 20 फीसदी सबसे गरीब जनसंख्या के बीच की असमानता काफी ज्यादा है। सौभाग्य से, इस असमानता को दूर करने की बात पर जोर दिया जा रहा है।

कांफ्रेंस के दौरान राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन की निदेशक और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय में अतिरिक्त सचिव अनुराधा गुप्ता ने कहा कि भारत में माताओं और बच्चों के स्वास्थ्य में सुधार हो रहा है और केंद्र सरकार की जननी सुरक्षा योजना से संस्थागत प्रसव के मामलों में काफी इजाफा हुआ है।

गुप्ता ने बताया कि अगले चरण में ज्यादा लक्षित दृष्टिकोण अपनाए जाने की बात है। सरकार ने उच्च प्राथमिकता वाले 184 जिलों (एचडीपीएस) का चयन किया है। इन जिलों से सबसे खराब सामाजिक और स्वास्थ्य संकेतक प्राप्त हुए हैं और इन्हें 30 फीसदी ज्यादा संसाधन मिलेंगे और इन्हें अलग तरह की योजना के दायरे में लाया जाएगा।
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