शायद ही हमने गौर किया हो कि हमारे आसपास मेंढकों ने टर्राना कम ही नहीं किया, बल्कि बंद कर दिया है। वर्ना कुछ साल पहले तक तो कुछ इलाकों में मेंढक साल भर टर्राते थे। केवल भारत में नहीं, पूरी दुनिया से मेंढक तेजी से लुप्त हो रहे हैं। इसके लिए जल भंडारों के नष्ट होने, जंगलों के कटने, जलवायु परिवर्तन और बीमारियां तो जिम्मेदार हैं ही, व्यावसायिक लाभ के लिए सामूहिक हत्या से भी उनकी संख्या घटती जा रही है। जीव विज्ञानी मेंढकों की नई प्रजातियों की खोज कर रहे हैं, पर विनाश की तुलना में उनकी नई खोज नगण्य है।
इस बीच सुखद रूप से मेंढक रहित अंडमान द्वीप समूह में मेंढकों की नई खेप भी देखने में आई है। मुख्य भूभाग से यात्रियों के साथ वहां पहुंचे वे मेंढक स्थानीय पारिस्थितिकी को नुकसान पहुंचा रहे हैं। लेकिन मेंढकों की संख्या में आई भारी कमी की तुलना में अंडमान में मेंढकों का उत्पात बहुत महत्व नहीं रखता।
भारत समेत अन्य गरीब देशों से मेंढकों की टांग पश्चिमी देशों में निर्यात की जाती रही है। फ्रांस और चीन मेंढकों के बड़े आयातक हैं। वैज्ञानिक प्रयोगों के लिए भी मेंढकों को बड़ी संख्या में मारा जाता रहा है। भारत में बीती सदी के अस्सी के दशक में मेंढक पर किए जाने वाले प्रयोग पर रोक लगाई गई, पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी। नतीजा है, मच्छरों की बढ़ती फौज, जिससे बीमारियां भी बढ़ने लगी हैं। मच्छर खाने वाले मेंढक घटे, तो मच्छरों की आबादी और उनका प्रकोप बढ़ने लगा। वैज्ञानिक अध्ययन बताता है कि दुनिया के कई देशों में मेंढकों की अनेक प्रजातियों का सफाया करने वाला 'बीडी फंगस' भारत के भी हर इलाके में पहुंच गया है। यह फंगस अब तक दुनिया भर में मेंढकों की दो सौ प्रजातियों का सफाया कर चुका है। वर्ष 2004 में इसके चलते पनामा के जंगलों में मृत मेंढकों की मीलों दूर तक कालीन बिछी देखी गई थी।
देश के जाने-माने विज्ञानी प्रो. एस डी विजू के मुताबिक, भारत में मेंढकों की विनाश दर 80 फीसदी है और अनेक प्रजातियां पूरी तरह लुप्त हो चुकी हैं। करीब पैंतीस करोड़ साल पहले अस्तित्व में आए मेंढकों ने बीच में आए तीन महाविनाशों को झेल लिया, पर अब जिस तेजी से उनकी संख्या घट रही है, वह चिंताजनक है-खासकर तब, जब उन्हें जल की गुणवत्ता और तापमान का बेहद संवेदनशील कारक माना जाता है। मेंढकों के बर्ताव और स्वास्थ्य को देखकर जलवायु परिवर्तन का आभास वैज्ञानिकों को किसी यंत्र की तुलना में आसानी से मिल जाता है।
प्रकृति में सभी जीवों का एक दूसरे के साथ रिश्ता इतने गहरे तौर पर जुड़ा हुआ है कि एक के साथ छेड़छाड़ होने का असर दूसरी जगह दिखाई देता है। पिछले कुछ साल से आंध्र प्रदेश के कृष्णा जिले में सांप कांटने से मरने वालों की संख्या में अप्रत्याशित बढ़ोतरी हुई है। वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि पिछले वर्षों में इस इलाके से बड़ी संख्या में मेढकों को पकड़ कर गैरकानूनी ढंग से चीन भेजा गया है, जिसका दुष्प्रभाव अब सर्पदंश की घटनाओं में वृद्धि के रूप में दिखाई दे रहा है। दरअसल सांपों के भोजन के रूप में प्राकृतिक तौर पर उपलब्ध मेंढकों के घटने से मामला गड़बड़ा गया। भारत सहित दुनिया की सभी संस्कृतियों में मेंढकों का मानव समाज के साथ गहरा संबंध रहा है। हमारे यहां सूखा पड़ने पर वर्षा के लिए उनकी शादी कराकर प्रसन्न तक करने की परंपरा रही है। मेंढकों के घटते जाने का जो नतीजा हम भोग रहे हैं, उसे देखते हुए स्पष्ट है कि मेंढकों का होना हमारे लिए बहुत जरूरी है।