फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स

अलग क्यों हैं मैरी कॉम

गुरुबख्श सिंह संधू Updated Tue, 27 Nov 2018 07:23 PM IST
विज्ञापन
विज्ञापन
मैरी कॉम

वे विरले होते हैं, जो बढ़ती उम्र के साथ सीखने की रफ्तार बरकरार रख पाते हैं। हम ज्यों-ज्यों बड़े होते हैं, हममें स्थायित्व आता जाता है। लेकिन एक नया बच्चा हर पल कुछ न कुछ सीखने का जतन करता है। पैंतीस साल की उम्र में मैरी कॉम बिल्कुल उसी नए बच्चे की तरह जिंदगी जी रही हैं। उन्होंने जो किया है, उसे करना तो दूर, सोचना भी मुश्किल है। मैरी कॉम अथाह मेहनत और समर्पण का पर्याय हैं।



हेड बॉक्सिंग कोच के तौर पर कई ट्रेनिंग कैंपों में मुझे लंबे समय तक मैरी कॉम के करीब रहने का मौका मिला। ढाई साल पहले राज्यसभा का सदस्य बनने के बाद मैरी दिल्ली में रहते हुए शायद ही किसी संसद सत्र में गैरहाजिर रही हों। खेल व अन्य क्षेत्रों के अनेक महान हस्तियों को संसद भेजा जाता रहा है, लेकिन मुझे याद नहीं आता कि अपनी इस लोकतांत्रिक जिम्मेदारी को संसद में जाने वाले किसी और खिलाड़ी ने इतनी शिद्दत से निभाया हो! दरअसल उन्हें पता है कि वह संसद में जितना ज्यादा उपस्थित रहेंगी, किसी न किसी तरह उनके क्षेत्र की समस्याएं उतनी ही ज्यादा राष्ट्रीय फलक पर सामने आएंगी।


आइबा समेत अनेक संस्थानों की ब्रांड एंबेसडर, पुलिस की उच्च अधिकारी, बॉलिवुड की एक सफल फिल्म और भी न जाने कितनी सफलताएं हासिल करने के बावजूद उनकी मेहनत व्यक्तिगत महत्वकांक्षाओं से कहीं ज्यादा है। वह जिस इलाके का प्रतिनिधित्व करती हैं, वहां से बार-बार मैरी कॉम नहीं पैदा होतीं। उन्हें पता है कि उनकी मेहनत से देश को जितनी खुशी हासिल होगी, उससे कहीं ज्यादा तरक्की हिंसाग्रस्त पूर्वोत्तर की होगी। नहीं तो पांच बार की विश्व चैंपियन और तीन बच्चों की मां बनने के बाद नए खून वाली विश्व स्तरीय मुक्केबाजों से भिड़ने का दुस्साहस करने की उन्हें जरूरत ही क्या थी? मैरी कॉम ने अपने कॅरिअर में जो मापदंड तय कर दिए हैं, किसी भी दूसरी महिला मुक्केबाज के लिए वहां तक पहुंचना नामुमकिन के करीब वाला मुश्किल होगा।


किसी अन्य शारीरिक खेल की तरह बॉक्सिंग में भी पुरुषों के मुकाबले महिलाओं के लिए ज्यादा चुनौतियां होती हैं। कई महिला खिलाड़ी अपने चेहरे को लेकर काफी संजीदा रहती हैं। उन्हें भय होता है कि कहीं दागदार चेहरा उनकी शादी में बाधा न पहुंचाए। जबकि बॉक्सिंग में इन दागों की आशंका सबसे ज्यादा होती है। पुरुषों की तुलना में महिलाओं की घरेलू जिम्मेदारियां भी ज्यादा होती हैं। और शादी व बच्चे करने के बाद तो महिलाओं का कॅरिअर तकरीबन खत्म ही मान लिया जाता है। मैरी कॉम ने अपनी उपलब्धियों से इन सारे बहानों को बौना साबित कर दिया है। हालांकि उनकी सफलता में उनके पति समेत पूरे परिवार का योगदान है, लेकिन उन्होंने पूरे देश को बता दिया है कि जुनून क्या चीज होती है। हैरत नहीं होनी चाहिए कि भविष्य में मैरी कॉम के पद चिह्नों पर चलते हुए कई अन्य लड़कियां भी अपना संघर्ष जारी रखें। कुछेक ने तो ऐसा शुरू भी कर दिया है। मैं सलाम करता हूं ऐसी साहसी महिलाओं को, जो बच्चे जनने के बावजूद ट्रेनिंग कर रही हैं।


मुझे अच्छी तरह याद है, जब भारत में बॉक्सिंग की शुरुआत हुई थी, तो हर कोई यही कह रहा था कि यह खेल इस देश के मुफीद नहीं है। शारीरिक फिटनेस के साथ तीन-तीन मिनट के राउंड में हर माइक्रो सेकंड खुद को किसी भी हमले या विपक्षी आक्रमण के लिए तैयार रख पाना वास्तव में आसान नहीं है। लेकिन इस खेल के प्रति यह मैरी की प्रतिबद्धता ही है कि उन्होंने बचपन से ही हारना नहीं सीखा। उन्होंने शुरू से ही अपने इलाके में अशांति देखी है, लेकिन ये दुश्वारियां ही उनकी ताकत बनती गईं। उन्हें पता था कि अगर वह आगे नहीं बढ़ेंगी, तो पीछे क्या है, जो उनका इंतजार कर रहा है। उन्होंने हैरतअंगेज तरीके से आगे बढ़कर पीछे की खामियां कम करने में अपना योगदान दिया है, बल्कि दे रही हैं। मैरी कॉम ने अपने गृह राज्य में अकादमी बनाई है। हाल ही में उसी अकादमी से एक अंतरराष्ट्रीय सितारा भी निकला है। मुझे यकीन है यदि आगामी ओलंपिक में मैरी को सही भार वर्ग मिला, तो वहां से भी वह पदक लेकर लौटेंगी। निस्संदेह यह मैरी की उपलब्धियों का ही नतीजा है कि देश के अनेक सुरक्षा संस्थानों ने अपनी महिला बॉक्सिंग टीमें बनाना शुरू कर दिया है।


न सिर्फ भारत, बल्कि वैश्विक स्तर पर पुरुष बॉक्सिंग के मुकाबले महिला बॉक्सिंग नई बात है। भारत की शीर्ष महिला बॉक्सरों को देखा जाए, तो लंबे समय से हमारी निर्भरता पुराने नामों पर ही है। इसकी एक बड़ी वजह यह भी हो सकती है कि पुरुष बॉक्सरों ने ठीक-ठाक शोहरत पाने के बाद इस खेल को वह अहमियत देनी बंद कर दी, जो महिलाएं लगातार दिए जा रही हैं।


हाल ही में दिल्ली में आयोजित महिला विश्व चैंपियनशिप अब तक का सबसे उम्दा आयोजन था। आने वाले वर्षों में भारतीय बॉक्सिंग फेडरेशन ऐसे ही काम करता रहा और दूसरे विश्व स्तरीय आयोजन अंजाम देता रहा, तो निश्चित तौर पर भारत की महिला बॉक्सिंग का भविष्य उज्ज्वल है। कई अन्य महिला बॉक्सर अपने-अपने भार वर्ग में किसी को भी हराने का माद्दा रखती हैं। लेकिन यह एक ऐसा खेल है, जिसमें किसी का नाम लेकर उसके भविष्य की संभावनाओं का आकलन करना सही नहीं है।
विज्ञापन


उदाहरण के लिए, भारत के पास एक वक्त 81 किलोग्राम वर्ग में गुरुनाम सिंह जैसा बॉक्सर था, जिसे लेकर कोचिंग स्टाफ का दावा था कि अगले दस वर्षों तक हिंदुस्तान को इस भार वर्ग में किसी दूसरे खिलाड़ी की जरूरत नहीं है। वह खिलाड़ी वाकई फिट व लाजवाब था। लेकिन ट्रेनिंग के दौरान सिर्फ एक भारी पंच ने उसका कॅरिअर खत्म कर दिया। जाहिर है, मैरी कॉम ने इस तरह के खतरनाक और बेहद चुनौतीपूर्ण खेल में सख्त जिगर के साथ एक ऐसा उदाहरण पेश किया है, जिसे भारत के साथ पूरी दुनिया आश्चर्य भरी आंखों से देख रही है। मैरी कॉम भारत रत्न सम्मान की सच्ची हकदार हैं।


-लेखक द्रोणाचार्य अवार्ड प्राप्त भारतीय बॉक्सिंग नेशनल टीम के पूर्व चीफ कोच हैं।

विज्ञापन
विज्ञापन
Next