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अभी दिल्ली दूर है: कांग्रेस की महत्वाकांक्षा ने विपक्षी एकता पर लगा दिया सवालिया निशान

केएस तोमर
Updated Fri, 24 Feb 2023 05:56 AM IST

सार

विपक्षी गठबंधन का नेतृत्व करने की कांग्रेस की महत्वाकांक्षा ने विपक्षी एकता पर सवालिया निशान लगा दिया है, इसलिए नरेंद्र मोदी के विरोध में दो मोर्चे हो सकते हैं, जिससे अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव में भाजपा का काम आसान हो जाएगा।
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Nitish Kumar-Mallikarjun Kharge - फोटो : ANI


दूसरा, यदि कांग्रेस नेतृत्व वाला गठबंधन अस्वीकार्य है, तो वह कांग्रेस को भूल जाएं और खुद को नए गठबंधन के प्रमुख के रूप में पेश करें, जिसमें ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल, के चंद्रशेखर राव, अखिलेश यादव जैसे गैर-कांग्रेसी सहयोगी शामिल होंगे। कांग्रेस ने नीतीश पर परोक्ष हमला तब किया, जब उसने कहा कि वह कुछ नेताओं की तरह भाजपा के साथ कभी नहीं गई, जो मोदी के खिलाफ समान विचारधारा वाले नेताओं के गठबंधन का नेतृत्व करने की उसकी महत्वाकांक्षा का संकेत था।


राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा की सफलता को देखते हुए कांग्रेस के प्रतिनिधि राहुल गांधी को गठबंधन का नेता बनाने के प्रस्ताव का विकल्प चुन सकते हैं, अगर वह इसे अस्वीकार नहीं करते हैं, पर अगर ऐसा नहीं होता है, तो वे अंतिम क्षण के रणनीतिक कदम के रूप में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में दलित नेता खरगे के नाम की घोषणा करके हैरान कर सकते हैं। आंकड़ों के अनुसार, 543 लोकसभा सीटों में से अनुसूचित जाति की सीटों की संख्या 84 है और दर्जनों सीटों के परिणाम इसी जाति के मतदाता तय कर सकते हैं, जो भाजपा के साथ-साथ अन्य दलों के गणित को उलट सकता है।


कांग्रेस ने अपने इरादे स्पष्ट कर दिए हैं, कि विपक्षी एकता न तो कांग्रेस के बिना संभव है और न सफल होगी, क्योंकि क्षेत्रीय दलों के विपरीत उसकी अखिल भारतीय उपस्थिति है। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (एआईसीसी) का सत्र 24 से 26 फरवरी के बीच होना है, जिसमें विपक्षी एकता के लिए कांग्रेस की भूमिका पर चर्चा की जाएगी। कांग्रेस का कहना है कि वह अपनी भूमिका अच्छी तरह जानती है और दोहरे चेहरे वाले लोगों को मान्यता नहीं देती है। कांग्रेस अध्यक्ष खरगे ने विपक्षी नेताओं के साथ बातचीत शुरू कर दी है।


जानकारों का कहना है कि विपक्षी एकता तभी संभव है, जब कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों के नेता सीटों के बंटवारे पर सहमत हों, जो राज्यों में संख्या बल के आधार पर होना चाहिए। राजस्थान, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश के अलावा मध्य प्रदेश, उत्तराखंड, हरियाणा, पंजाब जैसे राज्यों में विपक्षी नेताओं को कांग्रेस को बड़ा हिस्सा देना होगा, जहां भाजपा के साथ उसका सीधा मुकाबला है। इसी तरह कांग्रेस और अन्य दलों को पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी, दिल्ली में केजरीवाल, तमिलनाडु में स्टालिन, महाराष्ट्र में शिवसेना (उद्धव ठाकरे), उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव जैसे नेताओं के लिए मैदान खुला छोड़ना होगा, जहां उनका वर्चस्व है। नीतीश कुमार संयुक्त विपक्ष का चेहरा बन सकते हैं, क्योंकि वे क्षेत्रीय दलों को स्वीकार्य होंगे और सोनिया और राहुल सहित कांग्रेस नेताओं का उनके प्रति नरम रुख है, जो लालू प्रसाद यादव की पहल के कारण संभव हो सका। यदि वोटों के बंटवारे को टाला जा सकता है, तो अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव में भाजपा को पटखनी देने के लिए विपक्षी एकता की यह एक बड़ी ताकत होगी।


वर्ष 2014 के चुनाव में नरेंद्र मोदी राजग का चेहरा थे और भाजपा ने 282 सीटें जीतीं और राजग का कुल आंकड़ा 336 था, जिसमें 29 सहयोगी दल थे, हालांकि 13 छोटे दलों का स्ट्राइक रेट शून्य था। भाजपा ने 2019 में छोटे दलों के अलावा 11 राज्यों में गठबंधन किया और स्वतंत्र रूप से 303 सीटें जीतीं। विश्लेषकों का कहना है कि पंजाब में अकाली दल, महाराष्ट्र में शिवसेना, कश्मीर में पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी, असम में असम गण परिषद और अब बिहार में जद (यू) की राजग से विदाई ने 2024 के संसदीय चुनावों में स्ट्राइक रेट बनाए रखने की भाजपा की रणनीति पर सवालिया निशान लगा दिया है, इसलिए हाईकमान नई रणनीति अपना सकता है।


कई राज्यों, विशेष रूप से दक्षिण में भाजपा अपने बूते खड़ी नहीं हो सकती, इसलिए सहयोगी तलाशना जरूरी हो गया है, लेकिन अब वह इस मोर्चे पर कमजोर हो गई है, क्योंकि क्षेत्रीय दलों के सामने अपने राज्यों में अस्तित्व का सवाल प्राथमिकता में है। महाराष्ट्र में ऑपरेशन लोटस की सफलता के बाद बिहार की बारी थी, लेकिन नीतीश कुमार उद्धव ठाकरे नहीं थे, जो सत्ता गंवा बैठें। इसलिए नीतीश ने भाजपा का साथ छोड़कर अपने विरोधी राजद को गले लगा लिया और नई सरकार का गठन किया। विभिन्न कारणों से 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों के बीच 15 राजनीतिक दलों ने राजग छोड़ दिया। भाजपा राज्यों में नए प्रभावी साझेदार बनाने के लिए संघर्ष करेगी, हालांकि वह छोटे दलों पर ध्यान केंद्रित कर रही है। विपक्षी दलों को बढ़त मिली है, बशर्ते उनके नेता अपने अहंकार और अति महत्वाकांक्षा से बाहर आएं।
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नीतीश कुमार के सहयोगी और उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव निश्चित रूप से बड़ी भूमिका निभाएंगे। सिंगापुर से सफल इलाज कराकर लौटे लालू प्रसाद यादव इस कवायद को नया आयाम देंगे, क्योंकि वह तेजस्वी का मार्गदर्शन कर सकते हैं, जो पहले से ही कई मुख्यमंत्रियों और गैर-भाजपा पार्टी नेताओं से मिल चुके हैं। लालू यादव के सोनिया एवं राहुल गांधी से अच्छे रिश्ते हैं, जो भाजपा को चुनौती देने के लिए महत्वपूर्ण चेहरे होंगे। लेकिन क्षेत्रीय दलों के अहंकार और आंतरिक बाधाओं के चलते विपक्षी एकजुटता मृग मरीचिका लग सकती है, इसलिए विपक्ष के लिए दिल्ली अभी दूर है।


विपक्षी गठबंधन का नेतृत्व करने की कांग्रेस की महत्वाकांक्षा ने विपक्षी एकता पर सवालिया निशान लगा दिया है, इसलिए नरेंद्र मोदी के विरोध में दो मोर्चे हो सकते हैं, जिससे 2024 में भाजपा का काम आसान हो जाएगा।

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