जनता जब नेता चुनती है, तब स्वयं अपने को उससे जोड़ती है, उसके साथ अपना तादात्मीकरण करती है और आशा करती है कि वे उनका दुख-दर्द समझेंगे, उनकी बात सबके सामने रखेंगे, उपयोगी नीति बनाएंगे और जनहित के कार्य करेंगे। नेता वस्तुत: जनता का माध्यम होता है, जो स्वीकृत व्यवस्था में लोक-हित को सुरक्षित करने का प्रयास करता है। उसे जनता के हितों का पहरुआ होना चाहिए।
नेता से यह अपेक्षा होती है कि वह निजी स्वार्थों से आगे बढ़कर देश की चिंता करे। यही बात उसके सारे प्रयासों के केंद्र में होनी चाहिए। आज यह बात फिर से दोहराने की जरूरत इसलिए भी है, क्योंकि स्वतंत्रता मिलने के बाद देश में जो राजनीतिक दौर चला, उसकी परिणति घोटालों, नैतिक मूल्यों के क्षय और घोर अकर्मण्यता की संस्कृति में हुई, जो देशहित में कदापि नहीं हैं।
रसूखदार बड़े नेताओं, मंत्रियों और उच्चाधिकारियों की मिलीभगत से भ्रष्टाचार और कामचोरी की संस्कृति ही स्थापित होती गई। जो जरूरी राजनीतिक साक्षरता और परिपक्वता हमसे अपेक्षित थी, उनसे हम दूर भटक गए। राष्ट्रीय राजनीति के लिए निजी स्वार्थ से तटस्थ होकर सोचने की जरूरत थी, जिस ओर हमने कोई ध्यान नहीं दिया। इसके बजाय हमने राजनीति को अपने या अपने समुदाय के सीमित स्वार्थ को सिद्ध करने के साधन के रूप में काम में लाना शुरू कर दिया, जिसका खामियाजा आज हम सभी भुगत रहे हैं।
आज हम विलक्षण असंगतियों के बीच जीने को अभिशप्त हैं। सुरक्षित न रख पाने के कारण हर साल लाखों टन अनाज सड़ता है, तो गरीब भुखमरी के शिकार हैं। युवा हर साल महंगी फीस देकर विदेश पढ़ने जाते हैं और अपने यहां के विश्वविद्यालयों की फीस में थोड़ी भी वृद्धि का विरोध करते हैं। पीने का पानी घटता जा रहा है और सस्ते जल शोधन के अभाव में करोड़ों लीटर पानी नित्य व्यर्थ बहाया जा रहा है। हर तरह का प्रदूषण जीवन के लिए चुनौती बनता जा रहा है।
औपचारिक शिक्षा बुद्धि पर अतिशय केंद्रित है तथा हृदय और हाथ, श्रम और करुणा से उसका वास्ता घटता जा रहा है। सरकारी व्यवस्था के समानांतर प्रभावी निजी शिक्षा के संस्थान तेजी से खड़े हो रहे हैं। छात्रों और अध्यापकों समेत शैक्षिक परिसर अस्त-व्यस्त हो रहे हैं और गुणवत्ता के सवाल गौण हो रहे हैं। चूंकि शिक्षा के परिणाम तत्काल नहीं दिखते, इसलिए किसी को उनकी चिंता नहीं है।