जब पत्रकारिता और जनसंचार एक अकादमिक विषय के रूप में विकसित हो रहा था, उस दौर में हिंदी पत्रकारिता के प्रामाणिक एवं मौलिक शोधपरक संदर्भों को पुस्तक के रूप में प्रस्तुत कर उन्होंने एक बहुत बड़े अभाव की पूर्ति की। डॉ. कृष्ण बिहारी मिश्र ने अनेक विषयों पर अपनी रचनाओं के माध्यम से शोधवृत्ति का परिचय दिया। खासकर पत्रकारिता पर उनकी कई पुस्तकें प्रकाशित हुईं, तो ललित निबंध के क्षेत्र में उनकी गतिशीलता रही। उनके ललित निबंध संग्रहों में, बैह्या का जंगल, मकान उठ रहे हैं, आंगन की तलाश, अराजक उल्लास, गौरैया ससुराल चली, आदि प्रमुख हैं। उनके विचार प्रधान निबंध संग्रहों में सांझ की जम्हाई, सृजनशील उजास, मूल्य मीमांसा, सम्बुद्धि (राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय विचार गोष्ठी में पठित आलेखों का संकलन), आस्था और मूल्यों का संक्रमण; संस्मरण, नेह के नाते अनेक, शामिल हैं। जीवनी आधारित पुस्तक- कल्पतरू की उत्सव लीला (परमहंस रामकृष्ण देव के लीला-प्रसंग पर केंद्रित पुस्तक) ने उनकी रचनाधर्मिता को प्रतिष्ठित किया। इसके अलावा हिंदी साहित्य: बंगीय भूमिका का संपादन, कविता संग्रह-नवाग्रह, भगवान बुद्ध (चून की अंग्रेजी पुस्तक का अनुवाद, कलकत्ता विश्वविद्यालय से प्रकाशित) इत्यादि पुस्तकों के माध्यम से मिश्र जी की साहित्य मेधा का परिचय मिलता है।
हिंदीतर भाषी संपादकों से संबंधित मेरे शोधकार्य के संबंध में मिश्र जी से मेरी लंबी वार्ता और उनके सुगम व्यक्तित्व की स्मृतियां आज भी मेरे मस्तिष्क में कौंधती और प्रेरित करती है। शब्द क्रीड़ा में निमग्न विद्वान डॉ. कृष्ण बिहारी मिश्र जी से भेंट कोलकाता के 7 हरिमोहन लेन, बेलियाघाट स्थित उनके निवास स्थान पर हुई थी। उस समय उनका धोती-कुर्ता और मुंह में पान दबाए अत्यन्त विनम्र साहित्यिक स्वरूप नहीं भूलता। साहित्य के प्रति लोगों की उदासीनता को लेकर उनका मन खिन्न था। मैं उनके आवास पर साक्षात्कार हेतु गया था। उन्होंने हिंदीतर भाषी संपादकों के अवदान को रेखांकित किया और कहा, ऐसे संपादकों ने अपनी भाषा के शब्दों को हिंदी में प्रचलित करने का कार्य कर हिंदी की शब्द संपदा में वृद्धि की। वहीं उन्होंने कई बांग्लाभाषी संपादकों का उदाहरण देकर बताया कि हिंदी समाचार पत्रों की बंगाल में स्थिति मजबूत न होते हुए भी इन संपादकों ने बंगाल में हिंदी के समाचार पत्रों के संपादन और हिंदी पत्रकारिता को सजाने-संवारने के कार्य को नहीं छोड़ा।
मिश्र जी का व्यक्तित्व विराट एवं साहित्य सृजन में तल्लीन कृतिजीवी साधक के समान था, जिसने हिंदी साहित्य की श्रीवृद्धि के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। मिश्र जी कभी किसी सम्मान-पुरस्कार के लिए सक्रिय या प्रयत्नशील नहीं रहे। यद्यपि उन्हें भारत सरकार ने ‘पद्म श्री’ सम्मान से विभूषित किया, पर वे सम्मान लेने नहीं गए। भारत सरकार के गृहसचिव ने उन्हें उनके निवास पर जाकर यह राष्ट्रीय सम्मान प्रदान किया। स्वामी रामकृष्ण परमहंस के जीवन पर आधारित उनकी चर्चित कृति- कल्पतरू की उत्सवलीला, को प्रतिष्ठित मूर्ति देवी सम्मान, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का महात्मा गांधी सम्मान, साहित्यभूषण सम्मान के बाद भी उनका व्यक्तित्व किसी दंभ का नहीं, बल्कि विनम्रता-तृणादीपि सुनीचेन, तरोरपि सहिष्णुना- का प्रतीक था।
मिश्र जी मूलतः बलिया (उत्तर प्रदेश) की मिट्टी और आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की वैचारिक पृष्ठभूमि के प्रतीक पुरुष थे। उनकी रचनाएं सूक्ष्म निरीक्षण और अनुसंधान तथा शोध-अध्येतावृत्ति का जीवंत प्रमाण है। अपने समय-कालखंड (20वीं-21वीं सदी) के प्रायः सभी शीर्ष रचनाकारों के वह प्रिय रचनाकार थे। मिश्र जी जमीन से जुड़े आध्यात्मिक वृत्ति के रचनाकार थे। उनके कुरेदने वाले विचार आज प्रासंगिक हैं और उनकी प्रासंगिकता सर्वकालिक महत्व की हैः 'आधुनिकता यदि धरती से विलग करती हो, आत्मलीन बनाती हो, उसके स्पर्श से आदमी समाज के साथ हंसना-रोना भूल जाता हो, तो मुझे नहीं चाहिए आधुनिकता की ऐसी दुम। अपना भोजपुरी, देहाती रंग-रूप ही भला है, जो लोक कंठ में गूंजता है, फाग-राग में छलकता है, चैता की मादकता बिखेरता है।'
- लेखक, दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय, गया में सहायक प्राध्यापक हैं।