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दूसरों के चेहरे पर भी हो उजास

राजकुमार राव Updated Wed, 18 Oct 2017 04:16 PM IST
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राजकुमार राव
दिवाली मेरा पसंदीदा त्योहार है। मैं गुरुग्राम में संयुक्त परिवार में पला-बढ़ा हूं। हम भाई-बहन दशहरे के दिनों से ही दीवाली का इंतजार करते थे। इन दोनों त्योहारों के बीच संभवतः 20 दिनों का फर्क होता है और हम एक-एक दिन गिना करते थे। इसका अलग रोमांच था।दिवाली की सबसे खूबसूरत बात है कि यह पूरे परिवार को एक साथ ले आती है। सबके साथ बैठकर पूजा करना और उसके बाद मिठाइयां खाना! आई लव स्वीट्स!! घर में मिठाइयों के बहुत सारे डिब्बे आते थे, जो हफ्तों तक चलते थे। दिवाली में हम थोड़े-बहुत पटाखे भी चलाते थे। हालांकि तब दिल्ली-एनसीआर में आज की तरह प्रदूषण की समस्या नहीं थी। हालात इतने बुरे नहीं थे। फिर भी मैं आतिशबाजी में बहुत ज्यादा विश्वास नहीं करता था।


आज पटाखों और प्रदूषण को लेकर एक अलग तरह की विचार-प्रक्रिया है और हमें पता है कि दिल्ली-एनसीआर ही नहीं, पूरी दुनिया में प्रदूषण का क्या स्तर है। संसार भर में इस मुद्दे पर एक नई तरह की जागरूगता है। बड़े होते हुए मैंने बीते 10-15 साल में बहुत कुछ बदलते देखा है। अब हम बड़े हो चुके हैं और पता है कि क्या सही है और क्या गलत। जिम्मेदारी का भी एहसास है। हमें पता है कि दुनिया को प्रदूषण मुक्त और खूबसूरत बनाने के लिए हम कैसे योगदान कर सकते हैं। प्रकृति को बचाने की जरूरत है। हमें उसके लिए खड़े होना होगा। मुझे लगता है कि आज लोग इन बातों से वाकिफ हैं और वे अपने आस-पास के पर्यावरण के हक में खड़े हो रहे हैं। हालांकि ऐसे लोगों की संख्या अब भी कम है।


दिवाली हमारा सबसे बड़ा त्योहार है। यह अंधेरे पर प्रकाश की विजय की बात करता है। इसके साथ कई अच्छी विचार-प्रक्रियाएं जुड़ी हुई हैं। समाज में असमानता भी बहुत है। निश्चित ही ऐसे बहुत सारे लोग हैं, जिनकी जिंदगी में आर्थिक या अन्य कारणों से अंधेरा है। हम परिवार के साथ दिवाली मनाते हैं, तो यह कर सकते हैं कि अपने दायरे को बड़ा करें। आपको लगता है कि आपके आस-पास कोई ऐसा है, जो त्योहार को सेलिब्रेट करने में सक्षम नहीं है, तो आप अपनी खुशियों में उसे भी शामिल कर सकते हैं। आप जिस भी तरीके से उसकी मदद कर सकते हैं, करें। जिससे वह भी इस त्योहार में खुश हो सके। मुझे लगता है कि यह बात आपको पटाखे जलाने से कहीं ज्यादा खुशी देगी। हम दिवाली मनाने में दो अभावग्रस्त परिवारों की मदद कर सकते हैं, तो मेरे लिए यही दिवाली है।


मुंबई-दिल्ली जैसे महानगरों में कई बार समाज के वर्गों की खाई बहुत स्पष्ट नजर आती है। यों तो देश के हर हिस्से में विषमता देखने को मिलती है, परंतु हम चाहें तो जिम्मेदार नागरिक की भूमिका निभा सकते हैं। दिवाली इसके लिए हमें एक शानदार और मानवीय मौका प्रदान करती है।


जहां तक मेरी इस दिवाली की योजनाएं हैं, तो मैं मुंबई में ही हूं। यहीं अब मेरा काम और घर है। इन दिनों फिल्म ‘फन्ने खां‘ की शूटिंग कर रहा हूं और दिवाली पर भी काम होगा। मेरी सिर्फ यही योजना है कि शाम को घर लौट कर दोस्तों के साथ दिवाली की रोशनी करूंगा, पूजा होगी और इसी बहाने कुछ मिठाई खाएंगे। ऐक्टर बनने के बाद डायटिंग पर ज्यादा दिन गुजरते हैं, लेकिन दीवाली के बहाने थोड़ी छूट मिल जाएगी।


-लेखक राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त अभिनेता हैं।
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